Tuesday, 23 March 2021

“गार्ड ऑफ ऑनर” पर एक बार फिर इतिहास की पहली घटना का गवाह बना बागेश्वर



सत्ता के नशे में चूर भाजपा ने एक बार फिर नियम व वैधानिक मर्यादाओं को भी ताक पर रख दिया है।


आज़ाद भारत के इतिहास की यह प्रथम घटना है जब किसी राजनीतिक दल के अध्यक्ष को गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया हो। संवैधानिक मर्यादाओँ का खुलकर उलंघन करने पर आपका क्या कहना है?
आज बागेश्वर डिग्री कालेज हैलीपैड पर पहुंचे नवनियुक्त बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक को गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया जो चर्चा का विषय बन गया। नियमों के मुताबिक, किसी भी पार्टी के अध्यक्ष को गार्ड ऑफ ऑनर नहीं दिया जाता है। इसी बात पर आज बागेश्वर में दिन भर चर्चाओं का बाज़ार गर्म रहा। लोगों का कहना है कि पुलिस का पूरी तरह से राजनीतिकरण हो गया है और पुलिस सीधे-सीधे भाजपा के एजेंट के रूप में कार्य कर रही है। 


चौतरफ़ा आलोचनाओं में घिरी बागेश्वर पुलिस तत्काल बैकफुट में आ गई, बागेश्वर एसपी अमित श्रीवास्त ने इस पूरे प्रकरण को गलत बताते हुए जाँच करने की बात कही है। अब देखने वाली बात यह होगी कि सच में जाँच ही होगी या किसी को बली का बकरा बनाया जायेगा। वैसे देश में कोरोना की नई एसओपी जारी कर दी गई है जिसके तहत हड़ताल न करने के आदेश भी आनन-फ़ानन में जारी हो चुका हैं। वहीं उत्तराखंड भाजपा के मुखिया की बागेश्वर आगमन पर आयोजित स्वागत रैली जो पूरे शहर भर में घुमाई गई वह अपने आप में बहुत सारे सवाल खड़े करती है।


Saturday, 6 March 2021

वाह क्या ज़िन्दगी है

वाह क्या ज़िन्दगी है आज के दौर में शहरों से सुरु अब गाँव भी पहुँचने को है, कहीं-कहीं तो पहुँच भी चुकी है। अब जरा गौर फ़रमाए, आज मार्ट में कोई सब्जी सही नहीं थी। पार्किंग एरिया से गाड़ी निकालता महिपाल अपने बराबर की सीट पर बैठी पत्नी मधुलिका से चर्चा करने लगा।

हाँ!.
प्याज भी ढंग के नहीं मिले।
फिर भी लेकिन दाम कम नहीं थे।
दाम की तो बात मत करो!.
प्याज भी पचास से कम हुए कभी?

मार्ट के कैम्पस से बाहर निकलते ही वहीं बगल में सड़क किनारे जालीनुमा पैकेट का अंबार लगाए ग्राहकों के इंतजार में उदास खड़े उस नौजवान से महिपाल यूं पूछ बैठा 
क्या बेच रहे हो भाई?
प्याज है सर!
कैसे दिए?
डेढ़ सौ के पाँच किलो।
यानी तीस रुपए किलो!
हाँ सर!.
अपने खेत का एकदम फ्रेश प्याज है।


यहां बाहर प्याज लगभग आधी कीमत पर बिक रहा है फिर भी लोग मार्ट के भीतर उन सड़े हुए प्याज में क्यों उलझे हैं?
पत्नी मधुलिका आश्चर्य से उसका मुंह देखने लगी।
“भाग्यवान! इसे ट्रेंड कहते हैं!" 
मतलब?
"भेड़चाल!. जो एक करता है बिना सोचे समझे सब वही करते हैं।"
अच्छा जी!.
फिर चलो हम इस ट्रेंड को बदल देते हैं। यह कहते हुए मधुलिका प्याज विक्रेता से मुखातिब हुई।
भैया! पाँच किलो वाले दो पैकेट हमारे हमारी गाड़ी की डिक्की में डाल दीजिए।
अभी उसकी गाड़ी की डिक्की खुल ही रही थी कि मार्ट के भीतर प्रवेश करते एक और कार में बैठे दंपति उन्हें कुछ खरीदते देख रुक गए और फिर से वही सवाल.. 
पैकेट में क्या है?
सर प्याज हैं!
कैसे दिए?
डेढ़ सौ के पाँच किलो।
प्याज विक्रेता उनकी डिक्की में पैकेट डाल उस गाड़ी के करीब पहुंचा।

दो पैकेट हमारी डिक्की में भी डलवा दो!
देखते ही देखते प्याज के सारे पैकेट एक-एक कर मार्ट में आती गाड़ियों के डिक्की में समा गए। कुछ देर यह तमाशा देख दोनों पति-पत्नी अपनी गाड़ी स्टार्ट कर वहां से चलने को हुए। तभी हाथ हिला उन्हें रुकने का इशारा कर वह प्याज विक्रेता लगभग दौड़ता हुआ उनकी गाड़ी के करीब आया और उसे आता देख वह भी रुक गया।

"भाई तुम्हारे सारे प्याज तो बिक गए!" 

वह मुस्कुराया लेकिन प्याज विक्रेता ने उसके प्रति कृतज्ञता से दोनों हाथ जोड़ लिए 
"थैंक यू सर!"

#भेड़चाल

Tuesday, 19 January 2021

दिल सा कोई कमीना नहीं



कैसे हो? मौसम सर्द है तो उम्मीद करता हूँ आप सब गुलाबी ही होंगे।दिल और दिमाग का आपसी ताल मेल ना है ना कभी होगा, क्या चाहिए क्या करना है? कौन सा रास्ता सही है? इसमें हमेशा ही दिल और दिमाग बेहस करते हैं और इस बहस में मरते हैं हम यानी इंसान।घुटते हैं हम तड़पते हैं हम....

वैसे scientificly ये prove हो चुका है की सोचने समझने का काम हमारा brain करता है पर लोगों ने दिमाग और दिल की category बनाई जो अपनी जगह बिलकुल सही है। हम जो कुछ महसूस करते हैं हमारी हंसी हमारा दर्द हमारी उलझने दिल से जुडी होती है और हमारे मज़बूत फैसले, mature decisions दिमाग की देन होते हैं। मतलब जो बेसाख्ता हो वो दिल और जो चालाक हो वो दिमाग। यानी हमारे अन्दर ही दो शख्स। 


दिल ओ दिमाग की जंग में पल पल मरते हैं,
अब तो खुद ही से डरते हैं खुद ही से लड़ते हैं
ख्वाहिशें अब करते नहीं हम,
जो की थी हसरतें उन्ही से डरते हैं
खुद कलामी कर लिया करते थे हम,
अब तो हाल ये हैं आईने से डरते हैं
ना पूछो मेरी शरारतें मेरी शोखी कहाँ गयी,
सच कहें तो अब हम कहकहों से डरते हैं। 

दिल हमेशा ऐसे रास्ते पर चलने को कहता है जो खतरनाक होता है, रिस्की होता है और दिमाग हमेशा सुरक्षित रास्तों की तलाश में रहता है, इसी उधेड़ बुन को दिल और दिमाग की जंग कहा जाता है। मतलब फैसला कोई भी हो बेबस इंसान ही होगा। क्यूकि दिल सा वाकई कोई कमीना नहीं...

तुम्हारा राष्ट्र

सुनो ऐ हुक्मरानों, 
मुझे नहीं चाहिये तुम्हारा देश,
तुम्हारा राष्ट्र 


और ये तुम्हारा राष्ट्रवाद 
जहाँ चलती हो गोलियाँ, बहता हो लहू 
पहचाना जाता हो आदमी 
दाढ़ी, टोपी, तिलक और जातियों से
जहाँ जलाई जाती हो औरते 
और बनाई जाती हो जाति और धर्म की मर्यादा 
औरतों की जलती हुई चिता पर बना दिये जाते है धर्म के मंदिर 
मुझे नही चाहिये ऐसा देश
मुझे तो थोड़ी सी जमीन चाहिये
जहाँ ऊगा सकू थोड़ा सा अन्न
थोड़ी सी सब्जियां पेट भरने को
मेरा, तुम्हारा, उनका सबका पेट भर सके जो भूखे है
मुझे बंदूक नही बोना है, ना ही बारूद, क्योंकि इनसे पेट नही भरता।

#FarmersProtest

Saturday, 19 December 2020

"इश्क़ का डिजिटलाइज़ेशन"

आज हम आधुनिकतावाद के उस चरम पर हैं, जिसके बारे में हीर-राझे, राजुला-मालुशाही ने कभी सपने में भी इस तरह के इश्क की कल्पना नही की होगी। तो आप इसका भी अंदाज़ा लगाते चलें की ये नई पीढ़ी के लोग आपको कितना याद और कितना यादों में सम्भाल कर रखेंगे........


डिजिटल इंडिया के दौर में 'लिखे जो खत तुझे' और 'फूल तुम्हे भेजा है खत में' जैसे गीत अब सिर्फ गीत बनकर रह गए है,जबकि कभी इनमे एहसासों की सुगंध हुआ करती थी। अब हमैं इन अहसासों को कहानियों क़िस्सों के माध्यम से ही ज़िन्दा रखना होगा। चिट्ठी लिखना, महबूबा की गली से गुजरना व किताबो में गुलाब देना,जैसे क्रियाकलाप कम ही नज़र आते है।कारण मोहल्ले,समाज व सोसाइटी के साथ साथ इश्क़ का भी डिजिटल हो जाना है।

वर्तमान जमाने का इश्क़ इन्टरनेट के रहमो करम पर पल रहा है। इश्क़ उन्ही का परवान चढ़ रहा है जिनके पास तेज़ इन्टरनेट कनेक्शन है,धीमे कनेक्शन वालों के पास तो जब तक महबूबा का रिप्लाई आता,बड़ी देर हो चुकी होती है।जहां आपका इन्टरनेट से कनेक्शन टूटा वही इश्क़ की दीवारों से पपड़ी उखड़ने लग जाती है।क्योंकि कभी आँखें मिलती थी,लब मुस्कुराते हैं पर आज उंगलियाँ चलती हैं फ़ोन के कीपैड पर।

नयी पीढ़ी का इश्क़ फेसबुक,ट्विटर,व्हाट्सअप पर ही पनपता है और एक अंतराल के बाद वही कहीं खो जाता है।कभी इश्क़ में महबूबा के छत पर आने का इंतज़ार होता था आज उसके मैसेंजर पर ऑनलाइन आने का इंतज़ार होता है। कभी अपने हाथ से बनाए कार्ड दिए जाते थे और आज तरह तरह के स्टिकर कमेंट से रिझाया जाता है। गौर करने वाली बात ये हैं कि जितने ज्यादा बातचीत के जरिए बढ़ते जा रहे हैं रिश्ते उतने ही धीमी मौत मरते जा रहे हैं!


वैसे इसके फायदे भी कई है...पहले प्यार में नाकामी पर युवा प्रेमी हाथ की नस काट लेते थे पर अब विरोध में सिर्फ अपनी आईडी बंद कर दिया करते है। पहले इश्क़ के चर्चे मोहल्ले में न हो जाए इसका खतरा होता था वही आज आप फेसबुक/व्हाट्सअप पर दर्जनों के साथ इश्क़ लड़ा सकते बिना किसी को कानोकान खबर हुए।

वैसे इश्क़,इश्क़ होता है,डिजिटल हो या पौराणिक। कभी सिर्फ  गली मोहल्ले में प्यार तलाशने वाले आज सात समंदर पार महबूबा की खोज कर रहे,इसे भी विकास का ही एक भाग माना जाना चाहिए और वैसे भी अगर ज़ज़्बात सच्चे हो तो इश्क़ मुकम्मल होना ही है फिर चाहे वो मैसेंजर पर जन्मा डिजिटल इश्क़ ही क्यों ना हो।अब तो बस ये देखते जाना है कि डिजिटलाइज़ेशन की अंधाधुंध दौड़ में इश्क़ रफ़्तार बनाए रखने में कामयाब हो पाता है या लड़खड़ा जाएगा।इश्क़ करते रहिए साहब, दौर तो यूँ ही बदलते रहेंगे।❤️

Friday, 11 December 2020

आगे रहने की होड़ में प्यार छोड़, नफरत सीख ली...


आज पूरे विश्व के साथ-साथ भले ही हमारे देश के लोग अब तक की सबसे बड़ी तालाबंदी का सामना कर रहे हों और इसकी तकलीफें अपार हों, लेकिन भारत में कोरोना संक्रमण के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। कोरोना संक्रमण के मामले में भारत अब दुनिया भर में अपना एक विशेष स्थान बना रहा है। 
चौबीस मार्च को जब पूरे भारत को ताले में बंद करने की घोषणा की गई थी, उस समय भारत सबसे ज्यादा प्रभावित बीस देशों की सूची में शामिल नहीं था। कोरोना वायरस संक्रमण के आंकड़े लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। 
जाहिर है कि कोरोना संकट के बहाने बहुत सारे पुराने बदले भी चुकाए जा रहे हैं। दुश्मनी निकाली जा रही है। लेकिन, इन सबके बीच मेरी निगाह इकोनामिक्स टाइम्स में 27 अप्रैल को छपी एक खबर की तरफ जाती है। भारत हथियारों की खरीद करने वाले देशों की सूची में तीसरे नंबर पर पहुंच गया है। 


स्टाकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के हवाले से खबर बताती है कि भारत ने वर्ष 2019 में अपनी सैन्य संरचनाओं पर 71.1 बिलियन डॉलर रुपये का खर्च किया है। पिछले साल की तुलना में इसमें 6.8 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इसके साथ ही सैन्य खर्च के मामले में भारत तीसरे स्थान पर पहुंच गया है। पहले स्थान पर अमेरिका, दूसरे पर चीन है। जबकि, चौथे पर रूस और पांचवें पर सऊदी अरेबिया है। दुनिया भर में हथियारों या सैन्यसंरचनाओं पर कुल जितना पैसा खर्च होता है उसका 62 फीसदी खर्च केवल ये पांच देश ही कर देते हैं। 
अमेरिका वह देश है जो दुनिया में हथियारों पर सबसे ज्यादा पैसा खर्च करता है। संस्थान का अनुमान है कि दुनियाभर में सैन्य संरचना पर वर्ष 2019 में कुल 1917 अरब डॉलर का खर्च किया गया है। इसमें से 38 फीसदी रकम अकेले अमेरिका ने खर्च की है। जबकि, चीन ने 14 फीसदी रकम खर्च की है। 
भारत में पिछले तीस सालों में सैन्य संरचनाओं पर होने वाले खर्च में 259 फीसदी का इजाफा हुआ है। सिर्फ 2010 से 2019 के बीच ही इसमें 37 फीसदी का इजाफा हुआ है। 
हैरानी की बात देखिए कि ये सारा खर्च ये सारे देश सिर्फ अपनी रक्षा के नाम पर कर रहे हैं। वे रक्षा के नाम पर ज्यादा से ज्यादा घातक हथियारों को विकसित करते हैं। उनकी खरीद करते हैं। सभी के यहां विभाग का नाम रक्षा ही है। लेकिन, काम उनका धौंसपट्टी और आक्रमण है। जानते ही हैं कि अमेरिका का रक्षा विभाग जाने कितने देशों पर हमला कर चुका है। लेकिन, उसका नाम अभी तक नहीं बदला है। 

वहीं, अपने देश की स्थिति देखिए तो बीते तीस सालों में सैन्य संरचनाओं पर तेजी से खर्च बढ़ा है। ये वही तीस साल हैं जब सरकार ने अपनी जिम्मेदारियों से पीछा छुड़ाना शुरू किया। शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन से लेकर जनता की तमाम जरूरतों को निजी क्षेत्रों में ज्यादा से बेचा जाने लगा। उदारीकरण के नाम पर बर्बादीकरण हुआ। सरकार अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हट गई। वह टैक्स तो वसूलती है। लेकिन, सेवाएं नहीं देती। सेवाओं के लिए आपको अलग से रकम खर्च करनी होगी और उसे पूंजीपतियों से खरीदना होगा।  
तमाम निजी स्कूल-कॉलेज, अस्पताल, प्राइवेट ट्रांसपोर्ट से लेकर प्राइवेट सुरक्षा तक सभी इसी तीस साल की देन है। 
हम सभी अपने समाज से सुनते आए है अच्छी सेहत ही सबसे बड़ा धन है सोचिए, दुनिया के देशों ने यह पैसा हथियारों को जमा करने की बजाय अगर लोगों की सेहत सुधारने में लगाई होती तो क्या हुआ होता। 

क्या इस दुनिया से अलग दूसरे तरह की दुनिया संभव नहीं है !!!

Saturday, 28 November 2020

ज़िंदगी ऐसी ही बेसबब है!



अक्सर लोगों को कहते सुना है ज़िन्दगी इम्तिहान लेती है, हर पल, हर मोड़ पर, फिर कौन जाने ये दिन भी एक परीक्षा हों, कि देखें कौन पहले टूटता है। किसके अंदर की सजावट और तरतीब पहले तितर-बितर होती है। किसका ज़ेहन पहले कुंद होता है। क्या पता कि ये एक आज़माइश हो!

तब ईश्वर ने जिनको दुलार से पाला, जिनके मन का ही हरदम हुआ, वो इससे फ़ौरन हताश होंगे। हारकर पूछ बैठेंगे कि यह सब क्यूँ हो रहा है, जैसे कि ज़िंदगी एक आरामगाह थी, जिसमें मेज़ पर हमेशा उनकी पसंद के फूलों ने रहना था! 



पर ईश्वर के सौतेले इसमें देर तक टिकेंगे, शायद वो आख़िर तलक अडोल रहें!

वो जिनको बुरी ख़बरों ने पोसा, अकेलेपन ने अंगुली पकड़ चलना सिखाया, जिनकी बुद्धि ने उनमें निस्संगता भर दी। पतंग के काग़ज़ जैसे पारदर्शी जिनके लिए जीवन के सारे प्रतिमान हो गए। किंतु वो ऐसे नाशुक्रे हैं कि इस बढ़त पर छाती न फुलाएंगे, जीत का कोई दावा पेश ना करेंगे। 

जब सब पहले जैसा हो जाएगा और लोग अपनी पुरानी आदतों में लौट जाएंगे तो ज़रूर वो मन ही मन सोचेंगे कि ये फिर वही भूल दोहराते हैं, इन्होंने अभी सबक़ सीखा नहीं! कि यहाँ कोई संगी नहीं है, सब अकेले हैं। ये जलसा झूठ है, भरम है। इन बेपता दिनों ने जिस सच को उघाड़ दिया था, उसको अब गांठ बांधकर रखना। इस खोखलेपन को भूलना नहीं, ये ज़िंदगी ऐसी ही बेसबब है!

पर आदत के बतौर वो तब भी चुप रहेंगे, यह बात भी किसी से बांटेंगे नहीं! बस दौरे-जहाँ की फ़ितरत को देख मुँह ही मुँह मुस्काएंगे! खैर जैसी भी हो ज़िन्दगी उसे खुल के आज़ाद तरीक़े से बिन्दास जीयो, यही हाल-ए-ख़ुशी का नायाब तरीका है।