Monday, 22 June 2020

फीस नही तो बच्चों को तो माफ कर दीजिए सरकार —
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बच्चे देश का भविष्य है...प्रिय बापू ,चाचा नेहरू से लेकर काका कलाम के मुँह से यह बात सुनता था तो लगता था कि इस देश के नेता इतने संवेदनशील तो है कि कम से कम वो बच्चों को लेकर किसी प्रकार राजनीति नहीँ करेंगे लेकिन पिछले तीन महीने मैं यह धारणा भी टूट गई है

पूरे देश मे नर्सरी से लेकर प्रायमरी क्लास तक बच्चों ऑनलाइन क्लासेस शुरू हो गई है स्कूल किसी भी नीति के अभाव में अपने अपने नियम बना रहे है जिन माता पिता ने अपनो बच्चों को कोरोना के डर से दूर रखा वो भी मजबूरी में उन्हें इंटरनेट के सामने बिठा कर सारी नकरात्मक खबरों से रूबरू करवा रहे है
अगर ऐसा नही करेंगे तो बच्चों का भविष्य बिगड़ जाएगा

सायबर हेल्थ सेफ्टी नॉर्म्स की तहत 10 साल तक के बच्चों को स्माल और मीडियम स्क्रीन से दूर रहना चाहिए स्क्रीन टाइम बच्चों के मस्तिष्क के विकास को भी प्रभावित करता है।यह एक ऐसा समय है जब उनका दिमाग विकसित होता है । मोबाइल और कम्यूटर उपकरणों की स्क्रीन ओवरस्टीमुलेशन का कारण बनती हैं, जिससे मस्तिष्क में डोपामाइन और एड्रेनालाईन का उत्पादन होता है।

यह सब इस उम्र में इंटरनेट के नशे की लत बनाता है। यह उम्र सामजिक गतिविधियों को समझेने की होती है जिसे स्क्रीन पर नहीं बल्कि व्यक्तिगत सिखाया जाना चाहिए।इस उम्र में इंटरनेट का उपयोग करने का विरोध तो स्वयं यूनेस्को और WHO कर चुका है लेकिन सरकार की क्या मजबूरी है वो मुझे समझ नही आ रहा है

जिस देश मैं आज भी 40 % से ज्यादा फीचर फोन औऱ बेसिक फोन है वँहा ऑनलाइन क्लासेस का विचार हास्यास्पद है यूनेस्को की रिपोर्ट के हिसाब से पूरे विश्व के 83 करोड़ छात्रों में से 70 करोड़ छात्रों के पास इंटरनेट नही है और 13 करोड़ छात्रों में से आधे को सायबर सिक्योरिटी का कखग भी नही पता है तब छोटे छोटे बच्चों के भविष्य को क्यो दाँव पर लगाया जा रहा है

सरकार पर शिक्षा माफिया का दबाव है लेकिन मध्यम वर्ग क्यों चुप है दिनभर में 70 साल को 70 बार कोसने वाला मध्यम वर्ग इतना डरपोक हो गया कि वो अपने बच्चों के लिए भी अपना मुँह खोलेगा यह एक असाधारण स्थिति है इसलिए सरकार से सवाल पूछिये अगर आपने आज सवाल नही पूछा तो कल अपने बच्चों के सवालो का जवाब नही दे पाएंगे 👍👍👍

साभार- अपूर्व भारद्वाज


अगर आपको अपने नसीब पर पक्का भरोसा है कि वह आपको कभी धोखा नहीं दे सकता, तो आप स्पेशल केस हैं।
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अपने इर्द गिर्द आप देख सकते हैं कि कितने अपराधी आपके कर्णधार बन चुके हैं और कितने शरीफ लोग धूल में मिल चुके हैं। इस प्रकार देखें तो पाप-पुण्य जैसा कुछ इस धरती पर एक्जिस्ट नहीं करता और सब कुछ केवल नसीब का खेल है।

इस एकांतवास के समय शांतचित होकर आप अंदाज़ा लगाइये कि कैसे एक आदमी दस, बीस, पचास मर्डर, रेप, अपहरण, लूट करके भी बच जाता है और देश की संसद और विधानसभाओं में पहुंचकर भारत भाग्यविधाता बन जाता है। दूसरा आदमी पेट की भूख से मजबूर होकर आलू चुराता हुआ पकड़ लिया जाता है, भीड़ के हत्थे चढ़ जाता है और पीट पीटकर मार डाला जाता है।


कितने मेहनती प्रतिभाशाली लोग अपनी बदनसीबी के कारण नष्ट हो गए और कितने अयोग्य निकम्मे लोग अपने नसीब के कारण राज कर रहे हैं। इसलिए नसीब तो है, लेकिन वह मैनेज करने योग्य नहीं है। मतलब, कि वह जो है सो है। उसे किसी के द्वारा बदला नहीं जा सकता। उसे आप अंगूठियों, रत्नों, मालाओं, भभूतों, भस्मों, प्रसादों इत्यादि के ज़रिए भी नहीं बदल सकते। उसे पहले जानना भी संभव नहीं।

यह प्रवचन आज इसलिए दिया, क्योंकि जीवन और मृत्यु भी नसीब द्वारा संचालित है।

अभी कोरोना काल में एक आदमी ऐसा हो सकता है, जो पहले की तरह नॉर्मल लाइफ जीते हुए भी संक्रमण से बचा रहे और एक बदनसीब ऐसा भी हो सकता है, जो तमाम तपस्याएं और परहेज करके भी महज एकाध छोटी मोटी असावधानियों, जो किसी मजबूरी का भी परिणाम हो सकती हैं, के कारण संक्रमित हो जाए।

इसी तरह एक आदमी ऐसा हो सकता है, जिसे संक्रमित होने के बावजूद सारी चिकित्सा सहायताएं उचित ढंग से मिलती चली जाएं और बीमारी के प्रति अधिक संवेदनशील होने या कमज़ोर इम्युनिटी के बावजूद वह बच जाए। दूसरी तरफ एक बदनसीब ऐसा भी हो सकता है, जिसे संक्रमित होने के बावजूद ठीक तो किया जा सकता है, लेकिन उचित चिकित्सा सहायता नहीं मिल पाने के कारण उसकी जान चली जाए।

मतलब यह, कि अगर आपको अपने नसीब पर ऐसा पक्का भरोसा है कि वह आपको कभी धोखा नहीं दे सकता, तो आप स्पेशल केस हैं, लेकिन अगर आपको लगता है कि अक्सर नसीब आपको धोखा दे जाती है तो कोरोना से बचने के लिए जितनी अधिक सावधानी बरत सकते हैं, बरतें, क्योंकि इसके अलावा आपके पास कोई दूसरा चारा नहीं है। ये दुनिया एक रंगमंच है। हम सब यहाँ एक किरदार निभा रहे है। किसको कब आना है कब जाना है वह सब उस निर्देशक के आदेश पर निर्भर करता है। जो इस पूरी दुनिया का किसी अदृष्ट शक्ति के रूप में संचालित कर रहा है।

आप मनन कर अपने आस-पास, समाज का आंकलन कर बेहतर भविष्य की नीव रख सकते हैं। हमें कैसा समाज चाहिए? कैसे लोगों के बीच हमें रहना है? कैसे लोग हमारा प्रतिनिधित्व करेंगे? हमें किन लोगों का भरोसा करना चाहिए व किस पर नजर रखनी चाहिए? कैसे हमारा आने वाला कल सुरक्षित होगा? हम हो न हो हमारा समाज आने वाले कल में आज से बेहतर होना ही चाहिए? आपने आज तक क्या पाया व क्या आने वाले समय में आप पा सकते हैं? आपका क्या ख़्याल है ज़रूर सांझा कीजियेगा।

धन्यवाद।
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मित्रता ऐसा अनमोल रत्न है जिसे पा लें तो जीवन की हर मुश्किल आसान और जिसके बिना जीवन का सफ़र कठिन हो जाता है।
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जब हम अपने घर से बाहर निकलकर बाहरी संसार में अपनी स्थिति जमाते है, तब पहली कठिनता मित्र चुनने में पड़ती है। यदि स्थिति बिल्कुल एकान्त और निराली नहीं रहती तो हमारी जान-पहचान के लोग धड़ाधड़ बढ़ते जाते हैं और थोड़े ही दिनों में कुछ लोगों से हमारा हेल-मेल हो जाता है। यही हेल-मेल बढ़ते-बढ़ते मित्रताप में परिणत हो जाता है। मित्रों के चुनाव की उपयुक्तता पर उसके जीवन की सफ़लता निर्भर हो जाती है। क्योकि संगति का गुप्त प्रभाव हमारे आचरण पर बड़ा भारी पड़ता है। हम लोग ऎसे समय में समाज में प्रवेश करके अपना कार्य आरम्भ करते हैं जबकि हमारा चित्त कोमल और हर तरह का संस्कार ग्रहण करने योग्य रहता है, हमारे भाव अपरिमार्जित और हमारी प्रवृत्ति अपरिपक्व रहती है। हम लोग कच्ची मिट्टी की मूर्ति के समान रहते है जिसे जो जिस रूप में चाहे, उस रूप का करे-चाहे वह राक्षस बनावे, चाहे देवता।


मित्रता वह शब्द है जो इंसान की जिन्दगी में सबसे अधिक महत्व रखता है। कहा जाता है -- सम्बन्धी ऊपर से निर्धारित आते हैं लेकिन मित्र हम स्वयं चुनते हैं। एक ऐसा रिश्ता जिसके साथ हम अपने सुख-दुख बेहिचक बाँट सकते हैं । जिसके साथ झगड़ना भी आनंददायक होता है। जहां हम वह सब कुछ कह सकते हैं - बेहिचक ,इस विश्वास के साथ कि मेरा मित्र मुझे समझेगा और अपनी सही राय बेहिचक देगा। आज मित्रता पर लिखते हुए मुझे कवि बुद्धिलाल पाल जी एक प्यारी सी कविता याद आ रही है जो दोस्ती के महत्व को बड़े ही सुन्दर ढंग से व्याख्यायित कर जाती है ---



दोस्ती —
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सूरज के होने से
चमकता हुआ दिन होता है
चाँद के होने से
शीतल दुधिया चाँदनी
तारों के टिमटिमाते रहने से
रात में भी दिशा ज्ञान होता है
पृथ्वी के घूमते रहने से
बहती हवाएं दिशाएँ बदलती हैं
हिमद्वीपों के होने से
धरती जलमग्न होने से
बची रहती है
समुद्र के होने से
बरसात की बूंदें बची रहती हैं
धरती के भीतर नमी होने से
बची रहती हैं उम्मीदें
कभी - कभी
दोस्त के होने से ऐसा होता है
कि जीवन
व्यर्थ होने से बचा रहता है ।।

सच है, मित्रता ऐसा अनमोल रत्न है जिसके बिना जीवन का सफ़र कठिन हो जाता है और जिसे पा लें तो जीवन की हर मुश्किल आसान। हमारे यहाँ कृष्ण और सुदामा की मित्रता की कहानी काफी प्रसिद्द है। सच्ची मित्रता की पहचान भी यही है कि किसी राजकुमार और एक निर्धन व्यक्ति के बीच भी मित्रता हो सकती है तथा जरुरत पड़ने पर एक सच्चा मित्र अपने मित्र को अपना सब कुछ दे सकता है। इंसान की बात तो रहने दें मित्रता का यह सुन्दर उदाहरण जानवरों में भी देखने /पढने को मिलता है।
महान कथाकार मुंशी प्रेमचन्द जी की कहानी "दो बैलों की कथा " इसका सुन्दर उदाहरण है। इसकी कुछ पंक्तियाँ देखें --
“झूरी क पास दो बैल थे- हीरा और मोती। देखने में सुंदर, काम में चौकस, डील में ऊंचे। बहुत दिनों साथ रहते-रहते दोनों में भाईचारा हो गया था। दोनों आमने-सामने या आस-पास बैठे हुए एक-दूसरे से मूक भाषा में विचार-विनिमय किया करते थे। एक-दूसरे के मन की बात को कैसे समझा जाता है, हम कह नहीं सकते। अवश्य ही उनमें कोई ऐसी गुप्त शक्ति थी,जिससे जीवों में श्रेष्ठता का दावा करने वाला मनुष्य वंचित है। दोनों एक-दूसरे को चाटकर सूँघकर अपना प्रेम प्रकट करते, कभी-कभी दोनों सींग भी मिला लिया करते थे, विग्रह के नाते से नहीं, केवल विनोद के भाव से, आत्मीयता के भाव से, जैसे दोनों में घनिष्ठता होते ही धौल-धप्पा होने लगता है। इसके बिना दोस्ती कुछ फुसफसी, कुछ हल्की-सी रहती है, फिर ज्यादा विश्वास नहीं किया जा सकता। जिस वक्त ये दोनों बैल हल या गाड़ी में जोत दिए जाते और गरदन हिला-हिलाकर चलते, उस समय हर एक की चेष्टा होती कि ज्यादा-से-ज्यादा बोझ मेरी ही गर्दन पर रहे। दिन-भर के बाद दोपहर या संध्या को दोनों खुलते तो एक-दूसरे को चाट-चूट कर अपनी थकान मिटा लिया करते, नांद में खली-भूसा पड़ जाने के बाद दोनों साथ उठते, साथ नांद में मुँह डालते और साथ ही बैठते थे। एक मुँह हटा लेता तो दूसरा भी हटा लेता था। "

कुसंग का ज्वर सबसे भयानक होता है। यह केवल नीति और सदव्रत्ति का ही नाश नही करता, बल्कि बुद्धि का भी क्षय करता है। किसी युवा-पुरूष की संगति यदि बुरी होगी तो वह उसके पैरों में बंधी चक्की के समान होगी जो उसे दिन-दिन अवनति के गड्डे में गिराती जायेगी और यदि अच्छी होगी तो सहारा देने वाली बाहु के समान होगी जो उसे निरन्तर उन्नति की ओर उठाती जायेगी। बुराई अटल भाव धारण करके बैठती है। बुरी बातें हमारी धारणा में बहुत दिनों तक टिकती है।
ह्रदय को उज्ज्वल और निष्कलंक रखने का सबसे अच्छा उपाय यही है कि बुरी संगत की छूत से बचो। यही पुरानी कहावत है कि-

काजर की कोठरी में कैसो हू सयानो जाय,
एक लीक काजर की, लागिहै, पै लागिहै।


ज़िंदगी में आप तब सीखते हैं जब आपको ठोकर लगती है। ठोकर खाकर गिरना जिंदगी नही है उसके बाद ख़ुद को सम्भाल लेना ही जिंदगी है। मैंने भी अपनी जिंदगी में कई बार ठोकरें खायी और खुद को सम्भालते रहे। ईश्वर ना करे किसी की मित्रता को कोरोना की बुरी नजर लगे। यह लेख उन सभी सच्चे मित्रों को समर्पित जिन्होंने जीवन के प्रत्येक मोड़ पर बराबरी से खड़े होकर मेरा साथ दिया।

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किस्से गाँव-घर के-
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चित्र में जो दिख रहा है हम इसे 'नौऊ’ (नौला) बोलते हैं। शुद्ध प्राकृतिक पेयजल श्रोत। गाँव में आई नई- नवेली दुल्हन को भी सबसे पहले नौऊ ही दिखाया जाता था। शादी में भी लड़की को यहाँ से पानी लाने के लिए एक गगरी जरूर मिलती थी। अपना नौला पत्थर और मिट्टी से बना होता था। एक तरह से जमीन के अंदर से निकलने वाले पानी के स्टोरेज का अड्डा था। इसमें अंदर-अंदर पानी आता रहता था। हम इसको 'शिर फूटना' भी कहते थे। मतलब जमीन के अंदर से पानी का बाहर निकलना।

नौला थोड़ा गहरा और नीचे से साफ कर दिया जाता था ताकि पानी इकट्ठा हो सके और मिट्टी भी हट जाए। कुछ गाँव में नौला के अंदर चारों ओर सीढ़ीनुमा आकार दे दिया जाता था। यह सब गाँव की आबादी और खपत पर निर्भर करता था। सुबह- शाम नौला से पानी लाना बच्चों का नित कर्म था। बारिश हो या तूफान नौला से पानी लाना ही होता था।

इस्कूल जाने से पहले नौला से एक डब्बा या 'गागर' (तांबे की गगरी) पानी लाना नियम था। ईजा रात को ही कह देती थीं’ नौऊ बे पाणी ल्या बे धर दिए तबे इस्कूल जाए हाँ'। सुबह आँख मलते हुए जब हम पानी लेने जाते थे तब तक ईजा 2 गागर पाणी ला चुकी होती थीं। सुबह चार- पाँच बजे से लोग नौला पानी लेने चले जाते थे।


शाम को दिन छिपने के बाद सारा गाँव नौला में ही उमड़ आता था। इधर से डब्बा फतोड़ते (डब्बा बजाते नहीं फतोड़ते थे) हुए मैं जा रहा हूँ तो वहाँ से दो भाई और आ रहे हैं। ईजा डब्बे की आवाज सुनकर ज़ोर से बोल देती थीं कि 'फोड़ दें हाँ डाब कें, आ तू घर आ आज'। थोड़ी देर नहीं बजाते थे फिर जहाँ से घर दिखना बंद हो जाता डम- डम शुरू कर देते थे।

शाम को नौला में 1 से 2 घण्टा बैठते थे। नौला सामूहिक झगड़ों और देश- विदेश के ज्ञान को प्रदर्शित करने का केंद्र भी था। कभी-कभी नौला में डिब्बे और कंटर बजाकर जागरी लगाते थे। यह बात जब भी ईजा को पता लगती थी तो, घर पर 'सिसोंण' (बिच्छू घास और कंडाली) तैयार रहता था। पानी का डब्बा गोठ रखते ही जैसे अंदर को कदम बढ़ते.. झप एक झपाक ईजा लगा देती थीं... आजी लगाले नौला पन जागर.... आजी बजाले डाब-भान..... न ईजा न... भो बे नि लगुँल.. नौला पन जब 'मसाण' (भूत) लागल न तब पत... ओ ईजा अब न न न.... कहते- कहते तीन- चार झपाक लग ही जाते थे। तब अम्मा आकर बीच बचाव करती थीं।

अगले दिन फिर शाम को बैट- बॉल खेलने 'तप्पड'( मैदान) चले जाते थे। दिन ढलने के बाद वहीं से पानी लेने नौला चल देते थे। जब गांव के सब बच्चे नौला पहुंच जाते थे तो फिर पहले दिन लगे सिसोंण का बदला गाली देकर निकालते थे..... जैल म्यर ईजें कें बता ऊ घुरि जो.. वीक पाणी गागर लफाई जो..फेल हैं जो ऊ...मन का सब गुब्बार फेर कर कंधे में पानी का डब्बा रख घर चल देते थे।

अक्सर ईजा नौला से लेट आने के लिए फटकार लगती थीं। कई बार नौला से लौटते हुए रात हो जाती थी तो रास्ते में पानी गिर जाता था। एक -दो बार तो अंधेरे में डर के मारे पानी का डब्बा भी गिर गया था। ईजा कहती थीं कि ‘पठ अन्यार में आ, कदिने बाघ खाल...’ पर यह रोज का था। ईजा की मार, डाट खाने और बाघ से डर के बावजूद भी नौला से अंधेरा होने से पहले घर जाने का मन ही नहीं करता था।


अब नौला खाली और गाँव वीरान पड़े हैं। घर-घर पर नल लग गए हैं। गधेरे पानी को और गाँव इंसान को तरस रहे हैं। आज भी ईजा सुबह-सुबह पानी नौला से ही लाती है। हर सुबह गगरी सर में रख नौला चली जाती है। कहती है- नल के पानी में स्वाद नहीं आता है, न 'तीस' (प्यास) मिटती है. अपने नौला का पानी तो मीठा होता है।

गाँव की लगभग हर ईजा को अब भी नौला का पानी ही अच्छा लगता है जबकि दुनिया बिसलेरी और केंट आ रो पर पहुंच गई है। पहाड़ व पहाड़ का अपनापन अद्भुत है, जिसका कोई सानी नही है। आपका क्या अनुभव है? आपको क्या लगता है आप भी अपने अनुभव साँझा करें?
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Sunday, 31 May 2020

पर्यटन उद्योग पर कोरोना का कहर
- सर्वाधिक रोजगार देने वाले पर्यटन सेक्टर पर ही पड़ी सबसे अधिक मार


पर्यटन को सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रखना चाहिए बल्कि इससे बहुत अच्छा ज्ञान मिलता है। हम पहाड़ों के विषय में अक्सर पढ़ते आए हैं कि वे इतने ऊंचे होते हैं, वहां जंगल होता है और भयानक जीव रहते हैं लेकिन जब पहाड़ पर जाते हैं, उन्हें नजदीक से देखते हैं तो एक तरफ हजारों फिट गहरी खाईं और दूसरी तरफ सैकड़ों फिट ऊंचे पेड़ जिनके ऊपरी हिस्से को हम राह चलते छू सकते हैं। ऐसा ज्ञान किताबों से नहीं मिलता। विश्व पर्यटन संगठन के अनुसार पर्यटक वे हैं जो यात्रा करके अपने सामान्य वातावरण से बाहर के स्थानों में रहने जाते हैं। यह दौरा ज्यादा से ज्यादा एक साल के लिए मनोरंजन, व्यापार, धार्मिक आस्था व अन्य उद्देश्य से भी किया जाता है। पर्यटन दुनिया भर में एक आराम पूर्ण गतिविधि के रूप में लोकप्रिय हो गया है। भारत में ताजमहल, लखनऊ का इमामबाड़ा, मध्य प्रदेश में खजुराहो के मंदिर, मिस्र के पिरामिड, चीन की दीवार, उत्तराखंड में चारधाम, फूलों की घाटी, नैनीताल, पिंडारी ग्लेशियर, मिनी स्विज़रलैंड कौसानी आदि को देखने के लिए दुनिया भर के पर्यटक आते हैं। 

इन दिनों पर्यटक झिझके हुए हैं क्योंकि चीन से फैला कोरोना वायरस लोगों को घर से बाहर नहीं निकलने दे रहा है।
कोरोना वायरस के कहर का पर्यटन क्षेत्र पर व्यापक असर पड़ा है। ऐसे में कई ट्रैवल कंपनियों ने अपने कर्मचारियों की वेतन वृद्घि टाल दी है और नई भर्तियों पर रोक लगा दी है। अर्थव्यवस्था में नरमी और कोरोनावायरस की वजह से मांग कम होने से कारोबार पर असर पड़ा है। लोगों का घरों से निकलना पूरी तरह से बंद हो चुका है। सैर सपाटे का शौक़ रखने वाले सभी प्रकृति प्रेमी घरों में क़ैद हैं जिसका सीधा असर होटल व्यवसाय पर नजर आ रहा है। जहाँ सीधे तौर पर पहाड़ में पहाड़ सी ज़िम्मेदारी के ऊपर होटल व्यवसाइयों पर क़र्ज़ का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। जो वर्तमान समय में किसी से छुपा नही है। उत्तराखंड में पहाड़ के युवाओं के लिये मुख्य रोज़गार के रूप में पर्यटन ही है। जिस पर कोरोना के कहर के चलते जहाँ आज हज़ारों परिवारों के सामने रोज़ी-रोटी का संकट पैदा हो गया है और प्रदेश व देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से प्रभावित हो रही है। पर्यटन कारोबारियों का मानना है कि लॉकडाउन से सबसे अधिक असर उन्हीं पर पड़ा है। राहत भी सबसे बाद में ही मिलेगी। इस हालात में सभी ने सबसे बड़ी चुनौती कर्मचारियों को वेतन देने से लेकर टैक्स, बिजली बिलों के भुगतान को बताया। साफ किया कि यदि सरकार ने समय रहते सहायता नहीं दी, तो युवाओं को रोजगार देने वाला सबसे बड़ा ये सेक्टर डूब जाएगा।
संसार में सब से अधिक दुःखी प्राणी कौन है ? बेचारी मछलियां क्योंकि दुःख के कारण उनकी आंखों में आने वाले आंसू पानी में घुल जाते हैं, किसी को दिखते नहीं। अतः वे सारी सहानुभूति और स्नेह से वंचित रह जाती हैं। सहानुभूति के अभाव में तो कण मात्र दुःख भी पर्वत हो जाता है।
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गैर जिम्मेराना हरकतों से भय-भ्रम का माहौल बनाना छोड़ो और आम जनता में सकारात्मक माहौल बनाकर उनको जागरूक बनाने का प्रयास करो.....
♦️जागरूकता के साथ लड़ेंगे तो हारेगा कोरोना

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कल तक हम खुद को उसकी पहुँच से बहुत दूर महसूस कर रहे थे और लग रहा था की ये और जगह कहर बरपा सकता है,लेकिन इतनी दूर हम तक किसी भी हालत में पहुँच ही नहीं सकता। उसके हम तक नहीं पहुँच पाने के बहुत से कारण,हमने खुद ही बना लिए थे। लेकिन देखो वो हमारे आसपास दस्तक दे ही गया।पूरी दुनिया में विनाशलीला का स्वप्न लिए कोरोना वायरस रूपी मानवजाति का ये अदृश्य दुश्मन आज हमारे आसपास मौजूद है और बस इसी इंतजार में है कि,कब हम गलतियाँ करें,लापरवाह गतिविधियां करें और इसे हमें और हमारे अपनों को नुकसान पहुंचाने का मौका मिले। इतना सब कुछ साफ होने के बाद भी ऐसे तथाकथित शूरवीरों की कोई कमी नहीं,जो कोरोना वायरस को लेकर अपनी गैर जिम्मेराना हरकतों से आम जनता के बीच भय,अफरा-तफरी का माहौल बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं।जबकि ऐसे माहौल में ऐसी हरकतें करने के बजाय आम जनता के मध्य सकारात्मक वातावरण बनाने और उन्हें जागरूक करने का प्रयास करने की आवश्यकता है।

कोरोना के केस आए नहीं कि ऐसे शूरवीरों ने सोशल मीडिया में इस खबर को ऐसे-ऐसे तरीकों से परोसना शुरू कर दिया कि देखने-पढ़ने वालों में अफरा-तफरी का माहौल बनता दिखा और यकीनन भय का एक अनैच्छिक वातावरण का निर्माण हुवा। इनमें से कईयों ने तो हद ही पार कर दी। अरे भाई, ठीक है। देश के कोने-कोने में कोरोना संक्रमित पाए जा रहे हैं और यहाँ भी बाहर से वापस लौटे कुछ लोग कोरोना पॉज़िटिव पाए गए तो इसमें बहुत अधिक हैरानी की क्या बात हो गयी ? सभी चाहते हैं कि उनके यहाँ,कोरोना का प्रवेश ना हो, लेकिन हमेशा वैसा नहीं हो पाता,जैसा हम चाहते हैं। कोरोना संक्रमितों के ईलाज हेतु शासन-प्रशासन की अपने स्तर से तैयारियां हैं और संक्रमितों के ईलाज हेतु व्यवस्थाएं की गयी हैं और उनका ईलाज भी हो रहा है। अब ऐसी परिस्थितियों में क्या जरूरी है ? खुद जागरूक रहकर औरों को भी जागरूक करना जरूरी है या गैर जिम्मेराना हरकतें कर,आम जनता के मध्य भय का वातावरण बनाना जरूरी है ?
ये बहुत बड़ा सच है कि आज सोशल मीडिया,बहुत बड़ी ताकत बनकर सामने आया है और इसके सही-गलत दोनों प्रकार के प्रभाव भी समय-समय पर सामने आते दिखे हैं। अगर लोगों में होड़ केवल इस बात को लेकर हो कि कोरोना को लेकर वो सबसे पहले जानकारी सोशल मीडिया में साझा करे,फिर भले ही उनका जानकारी साझा करने का तरीका कितना ही गैर जिम्मेराना क्यों ना हो, तो फिर आप समझ सकते हैं कि सोशल मीडिया के माध्यम से किस प्रकार,आम जनता के मध्य भय और भ्रम का वातावरण बनाने का काम होता है। अब कोरोना हमारे आसपास दस्तक दे चुका है और अब ये अंतिम मौका है कि सभी लोग हालातों की गंभीरता को समझते हुवे ये तय कर लें कि हमें क्या करना है और क्या नहीं करना है। कोरोना की भयावहता की तस्वीर हमारे यहाँ नहीं बने,यदि हम ऐसा चाहते हैं तो हम सभी को सबसे पहले कोरोना से सुरक्षा और बचाव के सभी उपायों को अपनी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा और अन्यों को भी इसके लिए आवश्यक रूप से जागरूक करना होगा। आशा है कि कोरोना से इस जंग में हम सभी एक जागरूक कोरोना योद्धा बनेंगे और मानव जाति के अदृश्य दुश्मन कोरोना को परास्त करेंगे। जागरूक रहिए,सुरक्षित रहिए .....
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वही विजेता होगा, जिसका धैर्य व संकल्प मजबूत होगा!
— बचाव में ही बचाव है!!

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आज से पहले हमें बसों व रेलगाडिय़ों में यह बात पढऩे को मिलती है कि यात्री अपने सामान का स्वयं जिम्मेवार है। अब तो बड़े-बड़े मॉल क्या करीब-करीब प्रत्येक बड़े संस्थान में उपरोक्त तरह की चेतावनी देखने व पढऩे को मिलेगी। कोरोना संक्रमण के कारण हुए पूर्णबंदी से निकलने के लिए भी सरकार ने उपरोक्त चेतावनी का ही सहारा लिया एवं आगे भी लेना होगा।
‘दो गज दूरी’ का महत्व समझते हुए हमें संक्रमण रोकने के लिए यह सुनिश्चित करना होगा कि लोग सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने समेत अन्य सावधानियां बरत रहे हैं। कोरोना के खिलाफ लड़ाई को और ज्यादा केंद्रित करना होगा। हमें साफ पता चल चुका है कि देश के किन-किन इलाकों में कोरोना का खतरा ज्यादा है और अभी कौन से इलाके बहुत ज्यादा प्रभावित हैं। हालांकि हम जानते हैं कि हम मैराथन में दौड़ रहे हैं। यह छोटी दूरी की दौड़ नहीं है जिसे तेजी से भागकर पूरा कर लिया जाए। भारत और वास्तव में पूरी दुनिया को संक्रमण के प्रसार के लिये आने वाले कई-कई महीनों और संभवत: सालों तक के लिये तैयार रहना होगा।
अत्यधिक आबादी, शहरी इलाकों में अत्यधिक भीड़ और कुछ ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य देखभाल की खराब पहुंच के तौर पर कई चुनौतियां हैं। वास्तव में यह जन स्वास्थ्य निगरानी, प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल केंद्र और स्वास्थ्य कर्मियों की संख्या को मजबूत करने का समय है। धरातल का सच यही है कि कोरोना महामारी से एक लंबी लड़ाई लडऩे के लिए विश्व को तैयार होना होगा। यह लड़ाई घर बैठकर तो लड़ी नहीं जा सकती और न ही सरकार एक सीमा से आगे कुछ करने की स्थिति में है। लॉकडाउन के कारण मजदूर, किसान से लेकर छोटे-छोटे दुकानदार, बड़े से बड़ा व्यापारी व उद्योगपति परेशान है। जन साधारण को भी लग रहा है कि वह एक तरह से कैदी नुमा जीवन जी रहे हैं। जीवन जैसे ठहर सा गया है। जीवन को पुन: गति देने के लिए सरकार ने ढीलें देनी तो शुरू की हैं लेकिन इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि लॉकडाउन-5 भी आयेगा लेकिन उस में छूटें पहले से अधिक होंगी। कोरोना वायरस एक लंबी दौड़ की तरह है जिसमें वही विजेता होता है जिसका धैर्य व संकल्प मजबूत होता है। जो अपना धैर्य खो देता है वह दौड़ को पूरा नहीं कर पाता। जीवन अपने आप में एक लंबी दौड़ ही है। इसमें सफल वही होता है जो लक्ष्य को सम्मुख रख अपना संघर्ष जारी रखता है और अपना संयम व संतुलन बनाये रखता है। प्रत्येक यात्री के अपने-अपने अनुभव होते हैं लेकिन चेतावनी सबके लिए होती है। चेतावनी को सम्मुख रख सबको एहतियात रखना होता है, जो नहीं रखता उसको खामियाजा भी भुगतना पड़ता है।
अब समय आ गया है कि जन-साधारण को लॉकडाउन से बाहर निकाला जाए। सरकार को जहां रोजमर्रा के जीवन में जन साधारण को अधिक रियायतें देनी चाहिए। वहीं सरकार को जन साधारण को यह भी चेतावनी देनी होगी कि अगर कोई लापरवाही हुई तो वह स्वयं उसका जिम्मेवार होगा। सतर्क रहकर व बताई गई बातों को ध्यान में रख कर तथा एहतियात रखते हुए हम अपने जीवन को पुन: गति दे सकेंगे। जरा सी असावधानी हमें व हमारे परिवार के वर्तमान व भविष्य को प्रभावित कर सकती है। कोरोना वायरस के प्रभाव से आप भली-भांति परिचित हैं, सो अपना ध्यान आप रखें। बचाव में ही बचाव है।

#Rescue_is_defense🙏🏻
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