Tuesday, 19 January 2021

दिल सा कोई कमीना नहीं



कैसे हो? मौसम सर्द है तो उम्मीद करता हूँ आप सब गुलाबी ही होंगे।दिल और दिमाग का आपसी ताल मेल ना है ना कभी होगा, क्या चाहिए क्या करना है? कौन सा रास्ता सही है? इसमें हमेशा ही दिल और दिमाग बेहस करते हैं और इस बहस में मरते हैं हम यानी इंसान।घुटते हैं हम तड़पते हैं हम....

वैसे scientificly ये prove हो चुका है की सोचने समझने का काम हमारा brain करता है पर लोगों ने दिमाग और दिल की category बनाई जो अपनी जगह बिलकुल सही है। हम जो कुछ महसूस करते हैं हमारी हंसी हमारा दर्द हमारी उलझने दिल से जुडी होती है और हमारे मज़बूत फैसले, mature decisions दिमाग की देन होते हैं। मतलब जो बेसाख्ता हो वो दिल और जो चालाक हो वो दिमाग। यानी हमारे अन्दर ही दो शख्स। 


दिल ओ दिमाग की जंग में पल पल मरते हैं,
अब तो खुद ही से डरते हैं खुद ही से लड़ते हैं
ख्वाहिशें अब करते नहीं हम,
जो की थी हसरतें उन्ही से डरते हैं
खुद कलामी कर लिया करते थे हम,
अब तो हाल ये हैं आईने से डरते हैं
ना पूछो मेरी शरारतें मेरी शोखी कहाँ गयी,
सच कहें तो अब हम कहकहों से डरते हैं। 

दिल हमेशा ऐसे रास्ते पर चलने को कहता है जो खतरनाक होता है, रिस्की होता है और दिमाग हमेशा सुरक्षित रास्तों की तलाश में रहता है, इसी उधेड़ बुन को दिल और दिमाग की जंग कहा जाता है। मतलब फैसला कोई भी हो बेबस इंसान ही होगा। क्यूकि दिल सा वाकई कोई कमीना नहीं...

तुम्हारा राष्ट्र

सुनो ऐ हुक्मरानों, 
मुझे नहीं चाहिये तुम्हारा देश,
तुम्हारा राष्ट्र 


और ये तुम्हारा राष्ट्रवाद 
जहाँ चलती हो गोलियाँ, बहता हो लहू 
पहचाना जाता हो आदमी 
दाढ़ी, टोपी, तिलक और जातियों से
जहाँ जलाई जाती हो औरते 
और बनाई जाती हो जाति और धर्म की मर्यादा 
औरतों की जलती हुई चिता पर बना दिये जाते है धर्म के मंदिर 
मुझे नही चाहिये ऐसा देश
मुझे तो थोड़ी सी जमीन चाहिये
जहाँ ऊगा सकू थोड़ा सा अन्न
थोड़ी सी सब्जियां पेट भरने को
मेरा, तुम्हारा, उनका सबका पेट भर सके जो भूखे है
मुझे बंदूक नही बोना है, ना ही बारूद, क्योंकि इनसे पेट नही भरता।

#FarmersProtest

Saturday, 19 December 2020

"इश्क़ का डिजिटलाइज़ेशन"

आज हम आधुनिकतावाद के उस चरम पर हैं, जिसके बारे में हीर-राझे, राजुला-मालुशाही ने कभी सपने में भी इस तरह के इश्क की कल्पना नही की होगी। तो आप इसका भी अंदाज़ा लगाते चलें की ये नई पीढ़ी के लोग आपको कितना याद और कितना यादों में सम्भाल कर रखेंगे........


डिजिटल इंडिया के दौर में 'लिखे जो खत तुझे' और 'फूल तुम्हे भेजा है खत में' जैसे गीत अब सिर्फ गीत बनकर रह गए है,जबकि कभी इनमे एहसासों की सुगंध हुआ करती थी। अब हमैं इन अहसासों को कहानियों क़िस्सों के माध्यम से ही ज़िन्दा रखना होगा। चिट्ठी लिखना, महबूबा की गली से गुजरना व किताबो में गुलाब देना,जैसे क्रियाकलाप कम ही नज़र आते है।कारण मोहल्ले,समाज व सोसाइटी के साथ साथ इश्क़ का भी डिजिटल हो जाना है।

वर्तमान जमाने का इश्क़ इन्टरनेट के रहमो करम पर पल रहा है। इश्क़ उन्ही का परवान चढ़ रहा है जिनके पास तेज़ इन्टरनेट कनेक्शन है,धीमे कनेक्शन वालों के पास तो जब तक महबूबा का रिप्लाई आता,बड़ी देर हो चुकी होती है।जहां आपका इन्टरनेट से कनेक्शन टूटा वही इश्क़ की दीवारों से पपड़ी उखड़ने लग जाती है।क्योंकि कभी आँखें मिलती थी,लब मुस्कुराते हैं पर आज उंगलियाँ चलती हैं फ़ोन के कीपैड पर।

नयी पीढ़ी का इश्क़ फेसबुक,ट्विटर,व्हाट्सअप पर ही पनपता है और एक अंतराल के बाद वही कहीं खो जाता है।कभी इश्क़ में महबूबा के छत पर आने का इंतज़ार होता था आज उसके मैसेंजर पर ऑनलाइन आने का इंतज़ार होता है। कभी अपने हाथ से बनाए कार्ड दिए जाते थे और आज तरह तरह के स्टिकर कमेंट से रिझाया जाता है। गौर करने वाली बात ये हैं कि जितने ज्यादा बातचीत के जरिए बढ़ते जा रहे हैं रिश्ते उतने ही धीमी मौत मरते जा रहे हैं!


वैसे इसके फायदे भी कई है...पहले प्यार में नाकामी पर युवा प्रेमी हाथ की नस काट लेते थे पर अब विरोध में सिर्फ अपनी आईडी बंद कर दिया करते है। पहले इश्क़ के चर्चे मोहल्ले में न हो जाए इसका खतरा होता था वही आज आप फेसबुक/व्हाट्सअप पर दर्जनों के साथ इश्क़ लड़ा सकते बिना किसी को कानोकान खबर हुए।

वैसे इश्क़,इश्क़ होता है,डिजिटल हो या पौराणिक। कभी सिर्फ  गली मोहल्ले में प्यार तलाशने वाले आज सात समंदर पार महबूबा की खोज कर रहे,इसे भी विकास का ही एक भाग माना जाना चाहिए और वैसे भी अगर ज़ज़्बात सच्चे हो तो इश्क़ मुकम्मल होना ही है फिर चाहे वो मैसेंजर पर जन्मा डिजिटल इश्क़ ही क्यों ना हो।अब तो बस ये देखते जाना है कि डिजिटलाइज़ेशन की अंधाधुंध दौड़ में इश्क़ रफ़्तार बनाए रखने में कामयाब हो पाता है या लड़खड़ा जाएगा।इश्क़ करते रहिए साहब, दौर तो यूँ ही बदलते रहेंगे।❤️

Friday, 11 December 2020

आगे रहने की होड़ में प्यार छोड़, नफरत सीख ली...


आज पूरे विश्व के साथ-साथ भले ही हमारे देश के लोग अब तक की सबसे बड़ी तालाबंदी का सामना कर रहे हों और इसकी तकलीफें अपार हों, लेकिन भारत में कोरोना संक्रमण के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। कोरोना संक्रमण के मामले में भारत अब दुनिया भर में अपना एक विशेष स्थान बना रहा है। 
चौबीस मार्च को जब पूरे भारत को ताले में बंद करने की घोषणा की गई थी, उस समय भारत सबसे ज्यादा प्रभावित बीस देशों की सूची में शामिल नहीं था। कोरोना वायरस संक्रमण के आंकड़े लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं। 
जाहिर है कि कोरोना संकट के बहाने बहुत सारे पुराने बदले भी चुकाए जा रहे हैं। दुश्मनी निकाली जा रही है। लेकिन, इन सबके बीच मेरी निगाह इकोनामिक्स टाइम्स में 27 अप्रैल को छपी एक खबर की तरफ जाती है। भारत हथियारों की खरीद करने वाले देशों की सूची में तीसरे नंबर पर पहुंच गया है। 


स्टाकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के हवाले से खबर बताती है कि भारत ने वर्ष 2019 में अपनी सैन्य संरचनाओं पर 71.1 बिलियन डॉलर रुपये का खर्च किया है। पिछले साल की तुलना में इसमें 6.8 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इसके साथ ही सैन्य खर्च के मामले में भारत तीसरे स्थान पर पहुंच गया है। पहले स्थान पर अमेरिका, दूसरे पर चीन है। जबकि, चौथे पर रूस और पांचवें पर सऊदी अरेबिया है। दुनिया भर में हथियारों या सैन्यसंरचनाओं पर कुल जितना पैसा खर्च होता है उसका 62 फीसदी खर्च केवल ये पांच देश ही कर देते हैं। 
अमेरिका वह देश है जो दुनिया में हथियारों पर सबसे ज्यादा पैसा खर्च करता है। संस्थान का अनुमान है कि दुनियाभर में सैन्य संरचना पर वर्ष 2019 में कुल 1917 अरब डॉलर का खर्च किया गया है। इसमें से 38 फीसदी रकम अकेले अमेरिका ने खर्च की है। जबकि, चीन ने 14 फीसदी रकम खर्च की है। 
भारत में पिछले तीस सालों में सैन्य संरचनाओं पर होने वाले खर्च में 259 फीसदी का इजाफा हुआ है। सिर्फ 2010 से 2019 के बीच ही इसमें 37 फीसदी का इजाफा हुआ है। 
हैरानी की बात देखिए कि ये सारा खर्च ये सारे देश सिर्फ अपनी रक्षा के नाम पर कर रहे हैं। वे रक्षा के नाम पर ज्यादा से ज्यादा घातक हथियारों को विकसित करते हैं। उनकी खरीद करते हैं। सभी के यहां विभाग का नाम रक्षा ही है। लेकिन, काम उनका धौंसपट्टी और आक्रमण है। जानते ही हैं कि अमेरिका का रक्षा विभाग जाने कितने देशों पर हमला कर चुका है। लेकिन, उसका नाम अभी तक नहीं बदला है। 

वहीं, अपने देश की स्थिति देखिए तो बीते तीस सालों में सैन्य संरचनाओं पर तेजी से खर्च बढ़ा है। ये वही तीस साल हैं जब सरकार ने अपनी जिम्मेदारियों से पीछा छुड़ाना शुरू किया। शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन से लेकर जनता की तमाम जरूरतों को निजी क्षेत्रों में ज्यादा से बेचा जाने लगा। उदारीकरण के नाम पर बर्बादीकरण हुआ। सरकार अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हट गई। वह टैक्स तो वसूलती है। लेकिन, सेवाएं नहीं देती। सेवाओं के लिए आपको अलग से रकम खर्च करनी होगी और उसे पूंजीपतियों से खरीदना होगा।  
तमाम निजी स्कूल-कॉलेज, अस्पताल, प्राइवेट ट्रांसपोर्ट से लेकर प्राइवेट सुरक्षा तक सभी इसी तीस साल की देन है। 
हम सभी अपने समाज से सुनते आए है अच्छी सेहत ही सबसे बड़ा धन है सोचिए, दुनिया के देशों ने यह पैसा हथियारों को जमा करने की बजाय अगर लोगों की सेहत सुधारने में लगाई होती तो क्या हुआ होता। 

क्या इस दुनिया से अलग दूसरे तरह की दुनिया संभव नहीं है !!!

Saturday, 28 November 2020

ज़िंदगी ऐसी ही बेसबब है!



अक्सर लोगों को कहते सुना है ज़िन्दगी इम्तिहान लेती है, हर पल, हर मोड़ पर, फिर कौन जाने ये दिन भी एक परीक्षा हों, कि देखें कौन पहले टूटता है। किसके अंदर की सजावट और तरतीब पहले तितर-बितर होती है। किसका ज़ेहन पहले कुंद होता है। क्या पता कि ये एक आज़माइश हो!

तब ईश्वर ने जिनको दुलार से पाला, जिनके मन का ही हरदम हुआ, वो इससे फ़ौरन हताश होंगे। हारकर पूछ बैठेंगे कि यह सब क्यूँ हो रहा है, जैसे कि ज़िंदगी एक आरामगाह थी, जिसमें मेज़ पर हमेशा उनकी पसंद के फूलों ने रहना था! 



पर ईश्वर के सौतेले इसमें देर तक टिकेंगे, शायद वो आख़िर तलक अडोल रहें!

वो जिनको बुरी ख़बरों ने पोसा, अकेलेपन ने अंगुली पकड़ चलना सिखाया, जिनकी बुद्धि ने उनमें निस्संगता भर दी। पतंग के काग़ज़ जैसे पारदर्शी जिनके लिए जीवन के सारे प्रतिमान हो गए। किंतु वो ऐसे नाशुक्रे हैं कि इस बढ़त पर छाती न फुलाएंगे, जीत का कोई दावा पेश ना करेंगे। 

जब सब पहले जैसा हो जाएगा और लोग अपनी पुरानी आदतों में लौट जाएंगे तो ज़रूर वो मन ही मन सोचेंगे कि ये फिर वही भूल दोहराते हैं, इन्होंने अभी सबक़ सीखा नहीं! कि यहाँ कोई संगी नहीं है, सब अकेले हैं। ये जलसा झूठ है, भरम है। इन बेपता दिनों ने जिस सच को उघाड़ दिया था, उसको अब गांठ बांधकर रखना। इस खोखलेपन को भूलना नहीं, ये ज़िंदगी ऐसी ही बेसबब है!

पर आदत के बतौर वो तब भी चुप रहेंगे, यह बात भी किसी से बांटेंगे नहीं! बस दौरे-जहाँ की फ़ितरत को देख मुँह ही मुँह मुस्काएंगे! खैर जैसी भी हो ज़िन्दगी उसे खुल के आज़ाद तरीक़े से बिन्दास जीयो, यही हाल-ए-ख़ुशी का नायाब तरीका है।

Wednesday, 18 November 2020

एक रोज मेरी मनोस्थिति -



फूल बेचने वाले लड़के को भला क्या मालूम था। उसने भूल से कह दिया- एक गुलाब ले लीजिए, भगवान आपकी जोड़ी सलामत रखेगा। वो लड़की सच में ही मेरे इतने क़रीब खड़ी थी कि किसी को भी वहम हो जाए, साथ में है।


असमंजस की स्थिति बन गई। मैं मुस्करा दिया। वो भी शायद झेंपकर मुस्कराई होगी। मैंने देखा तो नहीं, पर उसकी परछाई देखकर कल्पना बांधी। अपराह्न के चार बजे होंगे और धरती पर हम दोनों की लम्बी-सी परछाई गिर रही थी। परछाई में सच में ही जुड़े कंधों वाली इतनी क़ुरबत मालूम होती, जैसे हाथ थामे खड़े हों। मुझे लगा मैं अपनी परछाई से दोयम हो गया हूं। उससे हार गया हूं। मेरा हाड़-मांस का होना अकारथ था। मुझे एक बेआवाज़ अंधेरे के वृत्त में धरती पर गिर पड़ना था, एक युगल आकृति में- जैसे चित्रकार बनाते हैं तिमिरचित्र।

मैंने फूल ले लिया। मुझे उसकी कोई ज़रूरत नहीं थी, फिर भी रख लिया। किताब में सहेज लिया। फूल बेचने वाले को कहने का मन हुआ कि दोस्त, तुम्हें तो तुम्हारे फूल के दाम मिल गए, लेकिन तुम्हारी दुआ बेकार जाएगी। ना कोई जोड़ी है, ना किसी को सलामत रहना है। ये तो बस यों ही अफ़रातफ़री में जुड़ गया एक साथ है। यहां इतनी भीड़ है कि भ्रम होता है, अलग-अलग नहीं हैं।

वो दिल्ली थी। मैं वैशाली मेट्रो स्टेशन पर था। फूल को किताब में रखकर आगे बढ़ चला। वो भी साथ ही चली। हमने साथ में ही क़तार में लगकर टोकन लिया। साथ ही प्लेटफ़ॉर्म पर पहुंचे। साथ ही मेट्रो का इंतज़ार किया। साथ ही गाड़ी में घुसे। साथ-साथ बैठे।

मैंने मन ही मन सोचा- उम्रभर का नहीं, चंद मिनटों का तो साथ रहेगा। बीस रुपए का गुलाब था। अपने हिस्से की दुआ पूरी करके ही मुरझाना चाहता था। उस फूल की ये ख़ुदमुख़्तारी मुझे रुच गई, यों तो दुनिया में कुछ चीज़ें पूरे जीवन की पूंजी लगाकर ना मिलें, इतनी अमोल होती हैं।

मेट्रो चलती रही। एक-एक कर स्टेशन आते रहे। मुसाफ़िर उतरते-चढ़ते रहे। मैं हर स्टेशन पर सोचता, शायद यहीं तक का साथ हो, किंतु दरवाज़ा खुलकर बंद हो जाता और वो अपनी जगह पर बनी रहती। मैं ख़ुद को चंद और मिनटों की क़ुरबत की मुबारक़बाद देता। कौशाम्बी आया और गया। आनंद विहार आकर निकल गया। यमुना बैंक पर तो लगा, अब वो उतर जाएगी, लेकिन पर्स टटोलकर ही स्थिर हो गई। प्रगति मैदान पर भी नहीं उतरी।

मैंने कनखियों से देखा, उसके कान में मिट्‌ठू के पिंजरे के जैसा एक नन्हा-सा झुमका था, जो पूरे समय झूल रहा था, जैसे नीमबेहोशी में कोई हिंडोला लहराता हो। बालों की एक लट चेहरे पर चली आई थी। गाल पर बरसों पुरानी एक खरोंच का निशान था। बड़ी तीखी नाक। उसका फ़ोन बजा। मुस्कराकर वो बात करती रही। मैंने अब देखा, उसके एक क्रुकेड टुथ था। ऊपर की दंतपंक्ति में एक दांत अपनी जगह पर हलका-सा तिर्यक।

वो कौन थी, क्या पता। कहां से आई, कहां को उसे जाना था। ना जान, ना पहचान। लेकिन एक लापरवाह भूल से कही गई वो बात थी- भगवान आपकी जोड़ी सलामत रखेगा। वो बात भले झूठी हो, लेकिन सुंदर थी। उसकी कल्पना में रस था। मेरा-उसका उस एक झूठे आरोप का नाता बन गया था, जैसे कहने भर से ही कुछ जुड़ गया। जैसे कि कुछ भी कहना इस संसार में हवा का एक बगूला भर ना हो, कहने से उसका एक ठोस आकार बन जाता हो, नियति बंध जाती हो। गुलाब की कली बेचने के मक़सद से बोला गया वो एक ब्यौपारी झूठ ही तो था। किसी को अनजाने में भी ऐसी बातें नहीं कहना चाहिए, जो हमें वैसी माया में बिसरा दें।

मंडीहाउस स्टेशन आया। अब तो मुझे ही उतरना था। मैं ग्रीनपार्क जा रहा था, मंडीहाउस पर मेट्रो की लाइन बदलना होती थी। संयोग कि वह भी यहीं उतरी। किंतु उसे और आगे नहीं जाना था। उसकी मंज़िल मंडीहाउस ही थी। इतना भर ही संग-साथ था। कौन जाने, एनएसडी की स्टूडेंट हो। क्या पता, त्रिवेणी कैफ़े पर किसी के साथ चाय पीने का वादा हो। या शायद सांझढले घर ही जा रही हो। मंडीहाउस के बाहर ऑटो-रिक्शा वालों के इसरार की ज़िद में उसे खो जाना हो, दिल्ली की गलियों में कहीं गुम जाना हो। ऐसे विलीन हो जाना हो, जैसे भोर का सपना। फिर खोजे से ना मिलना हो।

मैं उसे दूर तक देखता रहा, जब तक कि आंख से ओझल ना हो गई। मैं उम्मीद कर रहा था कि वो शायद एक बार मुड़कर देखेगी, किंतु सच तो यही है कि लड़कियां अगर ऐसे वाक़यों पर पलटकर देखने लगें तो जीवन दु:ख से भर जाए उनका। मन का तो काम ही है तृष्णा करना और दु:ख देना। लेकिन जीवन को तो बांधकर चलना होता है।

उसकी पीठ सुदूर जाकर धुंधला गई। मैंने उससे मन ही मन कहा, ये आख़िरी है, ज़िंदगी में अब मिलना ना होगा। तुम्हें विदा। दुनिया बहुत बड़ी है, इसलिए नहीं कि यहां ख़ूब सारे नदी-पहाड़ हैं, बल्कि इसलिए कि उसमें दो के बीच अंतरिक्ष जितनी असम्भव दूरियां होती हैं। मैंने किताब खोली और फूल को देखा। ये तुम्हारा घर है- मैंने उससे कहा- पूरा जीवन अब तुम्हें इस किताब के भीतर रहना है।

सहसा मुझे ममता कालिया की कहानी दूसरा देवदास की याद हो आई। उसमें भी ऐसा ही होता है। हर की पौड़ी पर एक तरुण एक पुजारी से कलावा बंधवा रहा होता है कि एक लड़की पास आकर खड़ी हो जाती है। पुजारी उससे संकल्प पढ़वाने को कहता है। लड़की कहती है- नहीं, हम कल आरती की बेला आएंगे। हम शब्द सुनकर पुजारी को भ्रम होता है कि वो लड़के के साथ है। सुखी रहो, फूलो-फलो का आशीष दे बैठता है। लड़का लड़की झेंप जाते हैं। उनके असमंजस की इस वर्णमाला को मैं कहानी पढ़ते समय निजी अनुभव से तुरंत पहचान गया था।

कहानी में फिर ऐसा होता है कि बाद उसके लड़के को कुछ और होश नहीं रहता। वो उस फूलो-फलो के आशीष से तादात्म्य बना लेता है। अगले दिन फिर उसी लड़की की टोह में उसे ढूंढता फिरता है, जिसने कल आरती की बेला आने का वचन दिया था। वो उसे फिर मनसा देवी की झूलागाड़ी में मिल ही जाती है।

वो कहानी पढ़ते समय मैं अपने को त्रासदी के लिए तैयार कर रहा था। मैं जानता था कि कहानी के अंत में लड़की उस लड़के से हमेशा के लिए खो जाएगी। ऐसा ही तो कहानियों में होता है। किंतु उस कहानी में ऐसा हुआ नहीं। दोनों आख़िर मिल ही गए। लेखिका ने उसको दूसरा देवदास इसलिए नहीं कहा था, क्योंकि वो दुर्भागा था। बल्कि इसलिए कहा था कि लड़की का नाम पारो था।

मुझे निराशा हुई। मुझे लगा, जैसे लेखिका की कहानी का नायक मेरी कहानी के नायक से जीत गया था। उसने दूसरी बार उस लड़की को खोज लिया था। मैंने इस शिक़ायत को चुपचाप अपने मन में रख लिया। कहानी के नायक का नाम सम्भव था। मेरी कहानी की तरह सबकुछ उसके लिए इतना असम्भव नहीं था।

Sunday, 8 November 2020

कुछ चिट्ठीयाँ लिखनी है तुम्हें...

नमस्कार 🙏🏻

अगर आप साथ हैं तो चलो कुछ नया सा करते हैं मगर पुरानी चीजों को साथ लेकर। मुझे कुछ चिट्ठियाँ लिखनी हैं तुम्हें! तुम्हारे उस पते पर जहाँ तुम अभी तक शिफ़्ट ही नही हुए! वो सब बातें लिखनी हैं जो होती हैं तुम्हारे बग़ैर तुम्हारे बारे में! तुमसे जुड़ी हुई।

चिट्ठियाँ जिसमें तुम होगे, तुम्हारा अक़्स होगा और होंगे सारे लम्हे। चिट्ठियों में जान होती है। वो जो काग़ज़ होता है न, स्पर्श सा होता है और वो स्याही! तुम्हारी महक हो जैसे। तुम्हारे उलझे हुए बालों सी मेरी गंदी सी राईटिंग(जिसके कारण आजतक सेकेंड डिविज़न ही पास हुआ हूँ!) मैं लिखे अल्फ़ाज़ जिसमें होंगी भावनाएँ। पूर्ण विराम होगा तुम्हारा गले लग जाना और कॉमा होगा तुम्हारे माथे को चूम लेना। तो जितनी बार पूर्ण विराम और कॉमा आए तो तुम में उपस्थिति महसूस कर लेना! 


तुमको चिट्ठियाँ इस लिए भी भेजनी है क्यूँकि मेरे पास तुम्हारे लिए कभी कोई कारण नही होता है। जैसे साँसे लेना अनवरत या पलकों का झपकना बेवजह। वैसे ही तुम्हारी याद आना और और तुम्हारी कही गयी बातों को ज़हन में लेके मुसकाने पे मेरा कोई ज़ोर नही है। 

हालाँकि तुमसे कोई उम्मीद नही है अब मुझको क्यूँकि उस उम्मीद के फ़ेज़ से बहुत आगे निकल आया हूँ मैं। मालूम है तुमसे उम्मीद करना वैसा ही है जैसा चाँद को पतंग के माँझे से पकड़ के खींच लेना। ख़ैर...

सुनो, बहुत सी चिट्ठियाँ लिखनी है। क्यूँकि तुमको बताना है वो सब जो कभी हुआ ही नही और जो सोचा था कि कभी होगा। आइये एक नये दौर में आज स्थापना दिवस के मौक़े पर उन सभी शहीदों को नमन करते हुए आन्दोलनकारियों को प्रणाम कर मेरे उत्तराखंड के दर्द को अपने शब्दों के माध्यम से चिट्ठी के रूप में आप भेजिए जरुर सांझा करेंगे, आपका दर्द, आपकी सोच, आपके विचार। चिट्ठियाँ सच्ची होती हैं। तुम्हारी मुर्दी आँखो जितनी सच्ची। जिसमें मुझे सारा जहाँ दिखता है अब। सिवाए अपने चेहरे के........



उत्तराखंड राज्य स्थापना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ
कुछ चिट्ठीयाँ लिखनी है तुम्हें...
#बेरोज़गार_उत्तराखंडी®️✍🏻