Sunday, 30 October 2022

"बड़े अच्छे लगते हैं"



तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे, 
मैं एक शाम चुरा लूं अगर बुरा न लगे। 

शायर को शायद शाम ही चुरानी थी। क्योंकि मौसम अच्छा हो तो दिन का कोई भी हिस्सा चुराया जा सकता था। लेकिन शाम ही क्यूं चुरानी है? 
शायद शाम ख़ास है। शाम ख़ास ही होती है। दिन का ऐसा प्रहर जिसमें कितनी ही कोपलें फूटने लगती हैं। समय के बाकी हिस्से आप देते रहेंगे खाद, पानी लेकिन कोपल शाम को ही दिखती है। 



“शाम को सिर्फ़ सूरज नहीं डूबता, बिछड़े हुए प्रेमियों के दिल भी डूब जाते हैं। जो चाँद ही न आए किसी शाम, धरी न रह जाएंगी लेखकों की कलम ? शाम ही है कि घर ले जाती है, सुबह ने तो दूर ही किया है सदैव।”

शाम संभवतः सबसे सुंदर आलिंगनों की गवाह है। विदा लेते हैं दिन के आए मेहमान और दावत पर पुराने मित्र अक्सर शाम को ही तो आते हैं। इस समय आसमान से सिर्फ़ सूरज नहीं उतरता दिन भर की थकन उतारने के जतन भी होते हैं। किसी शाम सोके उसी शाम उठ जाएं अगर, तो अगला दिन हो जाने का भरम होता है। क्या किसी अगले दिन सी ही हैं शाम ? तो कौन न चुरा लेगा अगला दिन एक शाम पहले। 

          

आजकल सोनी पर एक सीरियल आ रहा है "बड़े अच्छे लगते हैं"। मैं सीरियल्स वगेरा ज्यादा फॉलो नहीं करता, पर इसके प्रोमो ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींच लिया। जब सीरियल की हीरोइन जो कि 32 साल की उम्र में शादी करने जा रही है। कहती है कि "टीचर हूं सेल्फ डिपेंडेंट हूं पर फिर भी लोग पूछते हैं कि शादी कब कर रही हो, कोई भी अचीवमेंट शादी के सर्टिफिकेट को मैच नहीं कर सकता।" 

इस बात ने एक बार फिर से मुझे भारतीय समाज का असली चेहरा दिखा दिया। भारतीय समाज में शादी का बड़ा महत्व है, और लड़की की शादी तो जैसे सामाजिक मुद्दा बन जाता है। लड़की अगर पच्चीस पार कर जाए तो लोगों के सवाल बढ़ते ही चले जाते हैं। एक साथ बैठी ऑंटियों को गॉसिपिंग का अच्छा टॉपिक मिल जाता है। लोग न तो उस लड़की की मनोदशा समझते हैं, ना घरवालों की मजबूरियां। समझते हैं तो बस ये कि शादी क्यों नहीं कर रहे? 

बड़ा आसान होता है लोगों के लिए कहना कि इस उम्र में कुंवारी है तो कोई कमी होगी। अधिक उम्र की कुंवारी लड़की का चरित्र हनन करने का तो जैसे अधिकार मिल जाता है। बड़ी ही आसानी से लोग बोल देते हैं कि 31की उम्र में भी कुंवारी है तो अब कौन सी सती सावित्री बैठी होगी?  




और अगर लड़की जॉब वाली हो तो लोगों को कहने का मौका मिल जाता है कि घरवाले बेटी की कमाई खा रहे हैं। लड़कियों की उम्र और शादी का ऐसा संयोजन दिमाग में बैठाए हुए है। भारतीय समाज कि अगर लड़की की शादी 18 से 25 के बीच हो गई तो ठीक नहीं तो सब बेकार। लड़की अगर बहुत काबिल है तो भी बोल देते हैं क्या फायदा अगर शादी और बच्चे नहीं हैं, क्या करेगी इतना कमाकर जब अकेले ही रहना है? 

अरे भई!! अगर 18 की उम्र में शादी करके 25 की उम्र में तलाक़ हो जाए तो, या 21 की उम्र में शादी कर के भी सालों तक बच्चे न हों तो ?? ऐसी भी लड़कियां होती हैं जो 20 की उम्र में शादी कर के 22 की उम्र में विधवा हो गई हैं और इस बीच अगर मां बन गईं हैं तो बच्चों का वास्ता देकर पूरी उम्र उसकी दूसरी शादी नहीं की जाती। 

ऐसे भी उदाहरण देखें हैं जब कम उम्र में शादी करने के चक्कर में अनसेटल्ड लड़का जो पढ़ ही रहा है से शादी कर देते हैं, और बाद में कुछ भी सेटल नहीं होता। इस समाज को समझने की और बदलने की बहुत ही ज्यादा जरूरत है। शादी ज़िंदगी का हिस्सा है पूरी ज़िंदगी नहीं है। शादी से भी ज़रूरी काम होते हैं मानव जीवन में और शादी इच्छा के साथ साथ इच्छा अनुसार व्यक्ति के साथ हो तो ही अच्छी होती है। 



मुझे लगता है, सिर्फ समाज की खुशी के लिए यूं ही किसी के साथ बंध जाना शादी का मकसद नहीं होना चाहिए। क्योंकि समाज का क्या है, आएगा ,नाचेगा, खाना खायेगा, दो चार कमियां निकालेगा और चला जायेगा। फिर निभाना लड़का-लडकी को ही है। शादी के बाद होने वाली परेशानियों को कभी सुलझाया है समाज ने? नहीं ना ?

तो मेरे हिसाब से बराबरी की शादी, मनपसंद शादी, इच्छानुसार वर से शादी और वो शादी जिसमें सब खुश हों वही सबसे अच्छी शादी है, नहीं तो सब बर्बादी है, फिर चाहे किसी भी उम्र में हो। बाकी उम्र आपकी फ़ैसला आपका।

अब आप सोच रहे होगे कि अपनी बात कर भाई, लोगों का क्या? लोगों का तो बस काम ही है कहना, तो कुछ तो लोग कहेंगे ही। क्या करोगे सुनकर मुझसे मेरी कहानी, बेलुत्फ जिन्दगी के किस्से हैं फीके फीके साहब…………

Sunday, 9 October 2022

कैमरे मे शहर, नजरों मे जलेबी

मेरे शहर बागेश्वर में प्रमुख चौराहों पर पुलिस द्वारा सीसीटीवी कैमरा लगवाया गया। एक बागेश्वरवासी ने सुबह-सुबह कंट्रोल रूम में फ़ोन किया। पढ़िए उसकी बातचीत का कुछ अंश…….

बागेश्वरवासी: सर गुडमॉर्निंग, क्या आपके सीसीटीवी काम कर रहे हैं?
कंट्रोल रूम: जी सर, बिलकुल।




बागेश्वरवासी: क्या मंगल वाली गली भी नज़र आ रही है ?
कंट्रोल रूम: जी नही सर, उस तरफ नही हैं।

बागेश्वरवासी: अरे, मंगल जलेबी वालों की दुकान तो दिख रही होगी ?
कंट्रोल रूम: नही सर, क्या बात हो गई?

बागेश्वरवासी: पुराने एसबीआई के पास करन स्वीट्स की दुकान तो नज़र आ रही होगी ?
कंट्रोल रूम: जी सर, क्या बात हो गई?

बागेश्वरवासी: अरे, क्या फ़ायदा है फिर ऐसे कैमरे लगाने का हम जैसे आम आदमी को ?
कंट्रोल रूम: सर, क्या बात हो गई? बताइये तो, हम आपकी क्या मदद कर सकते हैं?

बागेश्वरवासी: अरे मालिक, जरा देख के बतावा दो कि गरम जलेबी या पनीर जलेबी रेडी है की नही?




पहाड़ों में लगातार पड़ रही बारिश के चलते आज 10वीं शताब्दी में ईरान में भारत आई 'जुलाबिया या जुलुबिया' जो अब भारत की राष्ट्रीय मिठाई बन बैठी है, बहुत मन है खाने का। पर जाकर लाये कौन? बहुत ही गम्भीर समस्या आन पड़ी है। बिन खाये रहा भी न जाये और इतनी बारिश में जाया भी न जाये।

#व्यंग

Wednesday, 14 September 2022

मेरे प्यारे बागेश्वर,


कैसे हो मेरे भाई! 
पहचाना?





कोई बात नहीं। 
स्मृति गड्डमड्ड होती रहती है। 

तुमसे मिले भी तो बहुत दिन हो गए। शायद आखिरी बार कब जी भर के निहारा था तुम्हें, मुझे ठीक से याद भी नही। पर तब करीब महीना भर साथ रहा था। पहले भी तुमसे बार-बार मिलता रहा हूं। आज भी साथ हूँ पर भागदौड़ की इस भीड़ में लगता है कहीं गुम न हो जाऊँ।

अहा! 

तुम्हारे भट्ट के डुबके, हरी साग और भात की याद आती है, तो मुंह में पानी भर जाता है। ...
वो नदियाँ, वो झरने, वो पहाड़, वो छोटे-बड़े बुग्याल, वो हिमाल जब याद आते हैं तो मन अथाह प्रेम से भर उठता है। …

यह मेरे लिए अजीब है कि तुम्हें अपनी पहचान बतानी पड़ रही है मुझे। मगर मुझे इसका बुरा भी क्यों मानना चाहिए! तुम्हारी गोद में पले सभी को तो हरदम बतानी पड़ती है, बरसों से साबित करनी पड़ती है अपनी पहचान, कि वे बिल्कुल तुम्हारी गोद के हैं। पूरमपूर तुम्हारे हैं। मुझे कभी-कभी लगता है कि मैं तो थोड़ा दूर का हूं। फिर मेरे जैसे तो अनेक हैं, जो तुम्हे चाहते तो बहुत हैं, चाहते हुए भी तुम्हारे पास नहीं आ पाते। 

माफ करना मेरे बागेश्वर! 
मगर तुमने मुझे दूर का होने का, कभी अहसास होने न दिया। न कभी खुद से जुदा ... 

बुरा न मानना मेरे भाई!

खैर, कैसी हैं तुम्हारी वादियां? तुम्हारे गांव-गलियारे! अब तो तुम पियराने लगे होगे। रंग बदलने लगी होगी तुम्हारी हरियाली। अक्तूबर आते-आते तुम्हारे आंगन के 'बैट वृक्ष' छोड़ने लगेंगे पत्ते। कुछ पेड़ निझा जाएंगे। चीड़ की ललियाई पत्तियां टूट कर तैरनी शुरू कर देंगी हवाओं में। 
मैंने तो तुम्हारे दो ही रंग देखे हैं- हरा और पीला। तुम्हारा सफेद रंग देखने की शक्ति मुझमें नहीं, सो कभी तुम्हारे पास उस जगह पर ज़्यादा समय टिका नहीं। ठंड में दांत किटकिटाने लगते हैं मेरे। तो डर लगता है कहीं जम न जाऊँ तुम्हारे उस रूप के दीदार के बाद पहाड़ों की उस चोटी पर। 

खैर, और कहो! 
कैसा है तुम्हारे बागनाथ मन्दिर का वातावरण! बैजनाथ का हाल। वहां की मछलियां कैसी है? भांग के घोटे का प्रसाद अब भी तो बंटता होगा शिवरात्रि पर! 
कैसी है महर्षि मार्कण्डेय की तपस्थली त्रिवेणी के उस संगम पर? दुर्गा पूजा की तैयारियां भी चलने वाली होंगी अब कुछ दिनों में। जैसे कावड़ यात्रियों को बीच रस्ते से लौटा दिया गया था, वैसे ही दुर्गा पूजा और रामलीला भी तो नहीं रोक दी जायेगी। 

शिखर-भनार, कोट माई, सनेती, लीती, भराड़ी, बागेश्वर व बदियाकोट में अब भी लगते होंगे मेले।

पिंडारी के नजारे तो भला क्या बदले होंगे!... 

बस नजरें बदल गई हैं।

इधर महीने भर से तुम्हारे बारे में कुछ ठीक-ठीक खबरें नहीं मिल पा रहीं। परसों कोई बता रहा था कि सिपाही कुछ ज्यादती करते हैं तुम्हारे लोगों पर। मगर यह तुम्हारे लोगों के लिए कोई नई बात तो नहीं। माफ कर देना उनको। बेचारे वे भी तो हमारे बच्चे हैं। खेती-बाड़ी बेच कर अपने मां-बाप की आंखों में तैरते सपनों को जीते हुए किसी और की हुकूमउदूली करते हैं। वे अपने मन की कब कुछ कह या कर पाए हैं। 

फिक्र उन लोगों की हो रही है, जो साल भर से ज्यादा हुआ, अपने घरों में बंद रहे हैं। 

कोरोना काल के चलते पिछले दो सालों से बंद रोज़गार के अब उनके घरों में पता नहीं कितना अनाज बचा होगा। कैसे खाते-पीते होंगे उनके बच्चे।

पता नहीं कितने जा पाते होंगे अपने धान के खेतों में। अपनी बगानो में। यह तो धान की फसल तैयार होने का मौसम है। उनकी रखवाली कौन करता होगा।

जिनका गुजारा सैलानियों के सहारे होता था- वे घोड़े वाले, गाड़ी वाले, होटल वाले, हलवा-पूड़ी, भुट्टे, चाय और पकौड़े बेचने वाले। उनके बच्चे सलामत तो हैं न मेरे भाई! 

पहाड़ों से जो गए थे मैदानों में या मैदानों से जो गए थे पहाड़ों पर, रोजगार की तलाश में। जो सड़कें बनाते थे, होटलों, रेस्तरां, सैलानी झोपड़ियों में बर्तन मांजते, झाड़ू-बुहारी करते खाना पकाते-परोसते थे। किराए के एक कमरे में दस-दस जन ठुंसे रह कर पैसे जमा कर अपने गांव लौट कोई बेहतर ठीया बनाने का सपना देखा करते थे। पता नहीं, अब उनके क्या समाचार हैं। पता नहीं, उनमें से कितने वापस लौट पाए, कितने वहीं रह गये होंगे। 

हो सके, तो अपनी कुछ खोज-खबर देना, मेरे भाई।

अपनी 25 साल की आयु पूर्ण कर 26 वें बसंत की दहलीज़ पर कदम रखा तो तुमने, पर जरा संभलकर चलना मेरे भाई, समय बहुत कठिन है आज….

डबडबातीं अखियों से शुभ प्रभात 🙏🏻
तुम्हारा एक अदना सा दोस्त राजकुमार…..

Tuesday, 23 August 2022

शिकायत



अक्सर हमें शिकायत होती है कि हम अपने दिल की बात किसी से नही कह पाते हैं। मगर ऐसा भी नही है कभी किसी से बिना किसी संकोच के कह भी जाते हैं।
हमारे आस-पास बहुत से ऐसे लोग होते हैं जो कभी किसी से अपने दिल की बात शेयर नही कर पाते हैं, वो अपनी हसरतों, ख्वाहिशों के दाग मुहब्बत में धो लेते हैं।




यूं हसरतों के दाग मोहब्बत में धो लिए, खुद दिल से दिल की बात कह ली और रो लिये। घर से चला था मैं खुशी की तलाश में, गम राह में खड़े थे वही साथ हो लिये।
मुरझा चुका है फिर भी, ये दिल फूल ही तो है। अब आप की खुशी इसे काँटे से तोलिए। होंठों को सी चुके तो जमाने ने कहा, यूं चुप से क्यों लगे हो, अजी कुछ तो बोलिए…….

इसी बात पर कुछ फ़रमाया है, जरा दिल से पढ़ियेगा, आपके दिल तलक मेरे अल्फ़ाज़ पहुंचने का अहसास हो तो शब्दों के माध्यम से कमेंट कर जरुर बतलाइयेगा……

मैंने मांगी थी कुछ डालियाँ
हाथ में वो नीम की पत्तियाँ दे गये
तंग जब भी किया हिचकियों ने मुझे
मुझको मेरी लिखी चिट्ठियाँ दे गये
मेरा आगन अभी तक तो सूखा नही
अपने आंसू कहीं और जा बहाइये।

किताबों में तुमने जो कुछ लिख दिया
आज तक वो हर एक पन्ना मोड़े रहा 
मेरी चादर थी छोटी पता था मुझे 
इसी लिये पॉव अपने सिकोड़े रहा 
राधिका कृष्ण सब द्वापरी बातें हैं 
इस प्रसंगों में न अब मुझे उलझाइये
पूछकर हाल मेरा अब तुम 
ऐ अजनबी दोस्त यूं न बहलाइये। 

मगर मुझे लगता है कभी-कभी किसी के साथ बेवजह भी बैठ जाना चाहिए, क्या पता वह आपसे कोई बात करना चाहे। खुशी व गम का सम्बंध ऐसा है जैसे ग़ुब्बारे में भरी हवा और सुई का है। जैसे मात्र एक छोटी सी सुई चुभने पर बड़े से बड़े ग़ुब्बारे की हवा क्षण भर में फुर्र हो जाती है वैसे ही किसी के पास बैठकर प्यार के दो बोल बोलने मात्र से ही उसे खुशी दिलाई जा सकती हैं। इसलिए जीवन में ख़ुशियाँ बाँटते चलिए  सफर आज नही तो कल कट ही जायेगा। पर आपके जाने के बाद भी आपको सबसे ज़्यादा याद वो अनजान दोस्त ही करेगा जिसे कभी आपने खुशी दी थी।

Monday, 22 August 2022

पहला सफ़ेद बाल


आज पहला सफ़ेद बाल दिखा। कान के पास काले बालों के बीच से झाँकते इस पतले रजत-तार ने सहसा मन को झकझोर दिया। ऐसा लगा, जैसे वसन्त में वनश्री देखता घूम रहा हूँ कि सहसा किसी झाड़ी से शेर निकल पड़े! या पुराने जमाने में किसी मजबूत माने जानेवाले किले की दीवार पर रात को बेफिक्र घूमते गरबीले किलेदार को बाहर से चढ़ते हुए शत्रु के सिपाही की कलगी दिख जाए! या किसी पार्क के कुंज में अपनी राधा को हृदय से लगाए प्रेमी को एकाएक राधा का बाप आता दिख जाए। 

            

कालीन पर चलते हुए काँटा चुभने का दर्द बड़ा होता है। मैं अभी तक कालीन पर चल रहा था। रोज नरसीसस जैसी आत्म-रति से आईना देखता था। अपने काले केशों को देखकर, सहलाकर, सँवारकर प्रसन्न होता था। उम्र को ठेलता जाता था, वार्द्धक्य को अँगूठा दिखाता था। पर आज कान में यह सफेद बाल फुसफुसा उठा, ‘भाई मेरे, एक बात कान्फिडेंस’ में कहूँ-अपनी दुकान समेटना अब शुरू कर दो!’

तभी से दुखी हूँ। ज्ञानी समझाएँगे – जो अवश्यम्भावी है, उसके होने का क्या दुख? जी हाँ, मौत भी तो अवश्यम्भावी है, तो क्या जिन्दगी भर मरघट में अपनी चिता रचते रहें? और ज्ञान से कहीं हर दुख जीता गया है? वे क्या कम ज्ञानी थे, जो मरणासन्न लक्ष्मण का सिर गोद में लेकर विलाप कर रहे थे, ‘मेरो सब पुरुषारथ थाको! स्थितप्रज्ञ दर्शन अर्जुन को समझानेवाले की आँखें उद्धव से गोकुल की व्यथा-कथा सुनकर डबडबा आई थीं। मरण को त्योहार माननेवाले ही मृत्यु से सबसे अधिक भयभीत होते हैं। वे त्योहार का हल्ला करके अपने हृदय के सत्य भय को दबाते हैं।

मैं वास्तव में दुखी हूँ। सिर पर सफेद कफन बुना जा रहा है, आज पहला तार डाला गया है। उम्र बुनती जाएगी इसे और यह यौवन की लाश को ढँक लेगा। दुख नहीं होगा मुझे? दुख उन्हें नहीं होगा, जो बूढ़े ही जन्मे हैं।

मुझे गुस्सा है, इस आईने पर। वैसे तो यह बड़ा दयालु है, विकृति को सुधारकर चेहरा सुडौल बनाकर बताता रहा है। आज एकाएक यह कैसे क्रूर हो गया? क्या इस एक बाल को छिपा नहीं सकता था? इसे दिखाए बिना क्या उसकी ईमानदारी पर बड़ा कलंक लग जाता? उर्दू कवियों ने ऐसे संवेदनशील आईनों का जिक्र किया है, जो माशूक के चेहरे में अपनी ही तस्वीरें देखने लगते हैं। जो उस मुख के सामने आते ही गश खाकर गिर पड़ते हैं। जो उसे पूरी तरह प्रतिबिम्बित न कर सकने के कारण चटक जाते हैं। सौन्दर्य का सामना करना कोई खेल नहीं है। मूसा बेहोश हो गया था। ऐसे भले आईने होते हैं, उर्दू-कवियों के और यह एक हिन्दी लेखक का आईना है।

मगर आईने का क्या दोष? बाल तो अपना सफेद हुआ है। सिर पर धारण किया, शरीर का रस पिलाकर पाला, हजारों शीशियाँ तेल की उड़ेल दीं और ये धोखा दे गए। संन्यासी शब्द इसीलिए इनसे छुट्टी पा लेता है कि उस विरागी का साहस भी इनके सामने लड़खड़ा जाता है। आज आत्मविश्वास उठा जाता है। साहस छूट रहा है। किले में आज पहली सुरंग लगी है। दुश्मन को आते अब क्या देर लगेगी। 

क्या करूँ? इसे उखाड़ फेंकूँ? लेकिन सुना है, यदि एक सफेद बाल को उखाड़ दो, तो वहाँ एक गुच्छा सफेद हो जाता है। रावण जैसा वरदानी होता है, कम्बख्त। मेरे मुहबोले चाचा ने एक नौकर सफेद बाल उखाड़ने के लिए ही रखा था, पर थोड़े ही समय में उनके सिर पर काँस फूल उठा था। एक तेल बड़ा ‘मनराखन’ हो गया है। कहते हैं, उससे बाल काले हो जाते हैं। (नाम नहीं लिखता, व्यर्थ प्रचार होगा) उस तेल को लगाऊँ? पर उससे भी शत्रु मरेगा नहीं, उसकी वर्दी बदल जाएगी। कुछ लोग खिजाब लगाते हैं। वे बड़े दयनीय होते हैं। बुढ़ापे से हार मानकर, यौवन का ढोंग रचते हैं। मेरे एक परिचित खिजाब लगाते थे। शनिवार को वे बूढ़े लगते और सोमवार को जवान-इतवार उनका रँगने का दिन था। न जाने वे ढलती उम्र में काले बाल किसे दिखाते थे! शायद तीसरे विवाह की पत्नी को। पर वह उन्हें बाल रँगते देखती तो होगी ही। और क्या स्त्री को केवल काले बाल दिखाने से यौवन का भ्रम उत्पन्न किया जा सकता है? नहीं, यह सब नहीं होगा।शत्रु को सिर पर बिठाए रखना पड़ेगा। जानता हूँ, यह धीरे-धीरे सब वफादार बालों को अपनी ओर मिला लेगा।

याद आती है, कवि केशवदास की, जिसे ‘चन्द्रवदन मृगलोचनी’ ने बाबा कह दिया, तो वह बालों पर बरस पड़ा था। हे मेरे पूर्वज, दुखी, रसिक कवि! तेरे मन की ऐंठन मैं अब बखूबी समझ सकता हूँ। मैं चला आ रहा हूँ, तेरे पीछे। मुझे ‘बाबा’ तो नहीं, पर ‘दादा’ कहने लगी है-बस, थोड़ा ही फासला है!

मन बहुत विचलित है। आत्म-रति के अतिरेक का फल नरसीसस ने भोगा था, मुझे भी भोगना पड़ेगा। मुझे एक अन्य कारण से डर है। मैंने देखा है, सफेद बाल के आते ही आदमी हिसाब लगाने लगता है कि अब तक क्या पाया, आगे क्या करना है और भविष्य के लिए क्या संचय किया। हिसाब लगाना अच्छा नहीं होता। इससे जिन्दगी में वणिक-वृत्ति आती है और जिस दिशा से कुछ मिलता है, आदमी उस दिशा में सिजदा करता है। बड़े-बड़े ‘हीरो’ धराशायी होते हैं। बड़ी-बड़ी देव-प्रतिमाएँ खंडित होती हैं। 

राजनीति, साहित्य, जन-सेवा के क्षेत्र की कितनी महिमा-मंडित मूर्तियाँ इन आँखों ने टूटते देखी हैं। कितनी आस्थाएँ भंग होते देखी हैं। बड़ी खतरनाक उम्र है यह, बड़े समझौते होते हैं सफेद बालों के मौसम में। यह सुलह का झंडा सिर पर लहराने लगा है। यह घोषणा कर रहा है, अब तक के शत्रुओ ! मैंने हथियार डाल दिये हैं। आओ, सन्धि कर लें।’ तो क्या सन्धि होगी-उनसे, जिनसे संघर्ष होता रहा? समझौता होगा उससे, जिसे गलत मानता रहा?

पर आज एकदम ये निर्णायक प्रश्न मेरे सामने क्यों खड़े हो गए? बाल की जड़ बहुत गहरी नहीं होती। हृदय से तो उगता नहीं है यह! यह सतही है, बेमानी ! यौवन सिर्फ काले बालों का नाम नहीं है। यौवन नवीन भाव, नवीन विचार ग्रहण करने की तत्परता का नाम है। यौवन साहस, उत्साह, निर्भरता और खतरे-भरी जिन्दगी का नाम है। यौवन लीक से बच निकलने की इच्छा का नाम है और सबसे ऊपर, बेहिचक बेवकूफी करने का नाम यौवन है। मैं बराबर बेवकूफी करता जाता हूँ। यह सफेद झंडा प्रवंचना है। हिसाब करने की कोई जल्दी नहीं है। सफेद बाल से क्या होता है?

यह सब मैं किसी दूसरे से नहीं कह रहा हूँ, अपने-आपको ही समझा रहा हूँ। द्विमुखी संघर्ष है यह-दूसरों को भ्रमित करना और मन को समझाना। दूसरों से भय नहीं। सफेद बालों से किसी और का क्या बिगड़ेगा? पर मन तो अपना है। इसे तो समझाना ही पड़ेगा कि भाई, तू परेशान मत हो। अभी ऐसा क्या हो गया है! यह तो पहला ही है और फिर अगर तू नहीं ढीला होता, तो क्या बिगड़नेवाला है। 

पहला सफ़ेद बाल का दिखना एक पर्व है। दशरथ को कान के पास पहला सफ़ेद बाल दिखे, तो उन्होंने राम को राजगद्दी देने का संकल्प किया। उनके चार पुत्र थे। उन्हें देने का सुभीता था। मैं किसे सौंपूँ? कोई कन्धा मेरे सामने नहीं है, जिस पर यह गौरवमय भार रख दूँ। किस पुत्र को सौंपूँ? मेरे एक मित्र के तीन पुत्र हैं। सबेरे यह मेरा दशरथ अपने कुमारों को चुल्लू-चुल्लू पानी मिला दूध बाँटता है। इनके कन्धे ही नहीं हैं-भार कहाँ रखेंगे? बड़े आदमियों के दो तरह के पुत्र होते हैं-वे, जो वास्तव में हैं, पर कहलाते नहीं हैं और वे, जो कहलाते हैं, पर हैं नहीं। जो कहलाते हैं, वे धन-सम्पत्ति के मालिक बनते हैं और जो वास्तव में हैं, वे कहीं पंखा खींचते हैं या बर्तन माँजते हैं। होने से कहलाना ज्यादा लाभदायक है।

अपना कोई पुत्र नहीं। होता तो मुश्किल में पड़ जाते। क्या देते? राज-पाट के दिन गए, धन-दौलत के दिन हैं। पर पास ऐसा कुछ नहीं है, जो उठाकर दे दिया जाए। न उत्तराधिकारी है, न उसका प्राप्य। यह पर्व क्या बिना दिये चला जाएगा?
पर हम क्या दें? 
महायुद्ध की छाया में बढ़े हम लोग, 
हम गरीबी और अभाव में पले लोग, 
केवल जिजीविषा खाकर जिए हम लोग 
हमारी पीढ़ी के बाल तो जन्म से ही सफेद हैं। 

हमारे पास क्या है? हाँ, भविष्य है, लेकिन वह भी हमारा नहीं, आनेवालों का है। तो इतना रंक नहीं हूँ – विराट भविष्य तो है। और अब उत्तराधिकारी की समस्या भी हल हो गई। पुत्र तो पीढ़ियों के होते हैं। केवल जन्मदाता किसी का पिता नहीं होता। विराट भविष्य को एक पुत्र ले भी कैसे सकता है? इससे क्या कि कौन किसका पुत्र होगा, कौन किसका पिता कहलाएगा ? मेरी पीढ़ी के समस्त पुत्रो, मैं तुम्हें वह भविष्य ही देता हूँ। यद्यपि वह अभी मूर्त्त नहीं हुआ है, पर हम जुटे हैं, उसे मूर्त्त करने। हम नींव में फँस रहे हैं कि तुम्हारे लिए एक भव्य भविष्य रचा जा सके। वह तुम्हारे लिए एक वर्तमान बनकर ही आएगा, हमारा तो कोई वर्तमान भी नहीं था। मैं तुम्हें भविष्य देता हूँ और इस देने का अर्थ यह है कि हम अपने आपको दे रहे हैं, क्योंकि उसके निर्माण में अपने-आपको मिटा रहे हैं। लो, सफेद बाल दिखने के इस पर्व पर यह तुम्हारा प्राप्य सँभालो। होने दो हमारे बाल सफेद। हम काम में तो लगे हैं, जानते हैं कि काम बन्द करने और मरने का क्षण एक ही होता है।
हमें तुमसे कुछ नहीं चाहिए। ययाति जैसे स्वार्थी हम नहीं हैं जो पुत्र की जवानी लेकर युवा हो गया था। बाल के साथ, उसने मुँह भी काला कर लिया। हमें तुमसे कुछ नहीं चाहिए। हम नींव में धंस रहे हैं, लो, हम तुम्हें कलश देते हैं।

Friday, 19 August 2022

प्यार भरा प्रेम संवाद



जब भी प्रेम की बात होती है, भगवान श्रीकृष्ण का नाम सबसे पहले आता है। श्रीकृष्ण को प्रेम और स्नेह का प्रतीक माना जाता है। पुराणों के अनुसार, श्रीकृष्ण की 16 हजार 108 रानियां थीं। श्रीकृष्ण की मुख्य रानियों में रुक्मणि, सत्यभामा का नाम शामिल है। इसके अलावा बाल्यावस्था में श्रीकृष्ण के गोकुल में गोपियों संग रासलीला की कहानियां आज भी मशहूर हैं। हालांकि सभी को प्रेम और स्नेह का पाठ पढ़ाने वाले श्रीकृष्ण का नाम सिर्फ राधा के साथ ही लिया जाता है। हर कोई प्रभु कृष्ण के नाम का जाप करते समय 'राधे श्याम' का उच्चारण करता है। भले ही उनकी 160108 रानियां थीं लेकिन जब प्रेम की मिसाल दी जाती है तो श्रीकृष्ण और राधा का प्रेम सबसे ऊपर होता है। श्रीकृष्ण और राधा की प्रेम कहानियां पीढ़ी दर पीढ़ी सुनने को मिलती हैं। लेकिन जब भी राधारानी और श्रीकृष्ण के प्रेम का जिक्र होता है तो यह सवाल जरूर मन में उठता है कि जब दोनों के बीच इतना प्रेम था, तो कृष्ण ने राधा से विवाह क्यों नहीं किया? 16108 रानियों में एक राधा क्यों नहीं थीं? 




यह तुम्हारा मोर के पंखों से बना हुआ मुकुट, यह तुम्हारा सुंदर मुकुट, जिसमें सारे रंग समाएं हैं! वही प्रतीक है। मोर के पंखों से बनाया गया मुकुट प्रतीक है इस बात का कि कृष्ण में सारे रंग समाए हैं। महावीर में एक रंग है, बुद्ध में एक रंग है, राम में एक रंग है–कृष्ण में सब रंग हैं। इसलिए कृष्ण को हमने पूर्णावतार कहा है…सब रंग हैं। इस जगत की कोई चीज कृष्ण को छोड़नी नहीं पड़ी है। सभी को आत्मसात कर लिया है। कृष्ण इंद्रधनुष हैं, जिसमें प्रकाश के सभी रंग हैं। कृष्ण त्यागी नहीं हैं। कृष्ण भोगी नहीं हैं। कृष्ण ऐसे त्यागी हैं जो भोगी हैं। कृष्ण ऐसे भोगी हैं जो त्यागी हैं। कृष्ण हिमालय नहीं भाग गए हैं, बाजार में हैं। युद्ध के मैदान पर हैं। और फिर भी कृष्ण के हृदय में हिमालय है। वही एकांत! वही शांति! अपूर्व सन्नाटा!
कृष्ण अदभुत अद्वैत हैं। चुना नहीं है कृष्ण ने कुछ। सभी रंगों को स्वीकार किया है, क्योंकि सभी रंग परमात्मा के हैं।

श्री राधे श्री कृष्ण की साक्षात् ह्रदय है और राधा-कृष्ण के संवाद में बहुत गहराई है। उसे शब्दों में समझा पाना उतना आसान नहीं है।ये बात उस समय की है जब महाभारत के बाद श्री कृष्ण द्वारिका लौटे थे। वो बहुत उदास रहने लगे रुक्मणी ,सत्यभामा आदि सभी रानियों ने उनकी उदासी का कारन पूछा लेकिन कृष्ण नहीं बोले। रुक्मणी जी समझ गईं की कृष्ण के मन में अनंत वेदना है।

और उस वेदना का एक मात्र उपाय श्री राधाजी हैं। उन्होंने मुस्कुराते हुए कृष्ण से पूछा क्यों न राधा को कुछ दिन मेहमानी के लिए यहां बुला लिया जाए। कृष्ण रुक्मणी की और कृतज्ञता से मुड़े और हल्की सी मुस्कराहट में अपनी स्वीकृति देते हुए वह से चले गए। रुक्मणी जी के आमंत्रण पर राधाजी द्वारका आईं यह संवाद उसी समय का है।

श्री राधा जी का प्रश्न:-
कितने वर्षों बाद द्वारकाधीश आज ये घडी आयी है ।स्वर्ग सजे महलों में कैसे तुमको राधा याद आयी है।

कृष्ण की मनुहार—
मत कहो द्वारकाधीश मैं तो तुम्हारा कान्हा हूँ।क्यों समझ रही हो मुझे पराया मैं तो जाना माना हूँ।
जब से बिछुड़ा तुम सब से हे राधे मुझे विश्रांति नहीं।हर दम दौड़ा भागा हूँ राधे मुझे किंचित शांति नहीं।

राधा के उल्हाने —
क्यों होगी शांति तुम्हे कान्हा जब से तुम द्वारकाधीश बने।गोकुल वृन्दावन को विसरा राजनीति के आधीश बने।
वंशी भूले ,यमुना भूले ,भूले गोकुल के ग्वालों को।
प्रेम पगी राधा भूले भूले ब्रज के मतवालो को।
अब बहुत दूर जाकर बोलो कान्हा कैसे लौटोगे।
जो दर्द दिया ब्रज वनिताओं को बोलो कैसे मेटोगे।
एक समय था उठा गोवर्धन ब्रजमंडल की तुमने रक्षा की थी।
एक समय था अर्जुन को गीता में लड़ने की शिक्षा दी थी।
एक समय था ब्रज मंडल में तुम सबके प्यारे प्यारे थे।एक समय था जब हम सब तुम पर वारे वारे थे।
कैसे कृष्ण महाभारत का कोई हिस्सा हो सकता है ?कैसे कृष्ण प्रेम के बदले युद्ध ज्ञान को दे सकता है ?
प्रेम शून्य होकर अब क्यों तुम प्रेम जगाने आये हो।भूल चुके तुम जिन गलियों को क्यों अपनाने आये हो।
मैं तो प्रेम पगी जोगन सी सदा तुम्हारे साथ प्रिये।
तुम विसराओ या रूठ के जाओ मैं बोलूंगी सत्य प्रिये।

कृष्ण का दर्द—
सत्य कहा प्रिय राधे तुमने मैंने जीवन मूल्यों को त्यागा है।
लेकिन न किंचित सुख में रहा ये कान्हा तुम्हारा अभागा है।
विषम परिस्थितियों ने मुझ कान्हा को कूटनीति है सिखलाई।
पर तुम्हारे इस प्रिय अबोध को राजनीति कभी नहीं भाईं।
लेकिन न किंचित सुख पाया इन भव्य स्वर्ग से महलों में।
बिसर न पाया वह सुख जो मिला था गोकुल की गलियों में।
भूला नहीं आज तक हूँ मैं वह आनंदित रास प्रिये।
जीवन की आपा धापी में वे यादें सुगन्धित पास प्रिये।
नन्द यशोदा और ब्रज वालों का ऋण कैसे चुका पाऊंगा ?
कौन सा मुख लेकर अब उनके सम्मुख मैं जाऊंगा ?
कई बार छोड़ कर राजपाट आने का मन करता है।
लेकिन कर्तव्यों के पालन में सौ बार ये मन मरता है।
मेरी विषम विवशताओं का आज आंकलन तुम करो प्रिये।
अपराध बोध से ग्रसित इस ह्रदय दंश को तुम हरो प्रिये।

राधा का प्रेम लेपन—
कान्हा से तुम कृष्ण बने फिर तुम बने द्वारकाधीश।
भक्तों के तुम भगवन प्यारे मेरे हो आधीश।
इस अपराध बोध से निकलो तुम सबके प्रिय हो बनवारी।
भक्तों के तुम तारण कर्ता राधा तुम पर वारि वारि।
सौ जन्मों के वियोग को सह लूंगी कान्हा प्यारे।
एक पल तेरा संग मिले जो मेरे हों बारे न्यारे।

श्री कृष्णा ने कहा — 
सच कहूँ राधा जब जब भी तुम्हारी याद आती थी इन आँखों से आँसुओं की बुँदे निकल आती थी।

श्री राधा जी बोली —
“मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ, ना तुम्हारी याद आई ना कोई आंसू बहा। क्यूंकि हम तुम्हे कभी भूले ही कहाँ थे जो तुम याद आते। इन आँखों में सदा तुम रहते थे। कहीं आँसुओं के साथ निकल ना जाओ इसलिए रोते भी नहीं थे। प्रेम के अलग होने पर तुमने क्या खोया इसका एक आइना दिखाऊं आपको ?कुछ कडवे सच ,प्रश्न सुन पाओ तो सुनाऊ ? कभी सोचा इस तरक्की में तुम कितने पिछड़ गए।
  • यमुना के मीठे पानी से जिंदगी शुरू की और समुन्द्र के खारे पानी तक पहुच गए ?
  • एक ऊँगली पर चलने वाले सुदर्शन चक्र पर भरोसा कर लिया और दसों उँगलियों पर चलने वाळी बांसुरी को भूल गए ?
  • कान्हा जब तुम प्रेम से जुड़े थे तो ….जो ऊँगली गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों को विनाश से बचाती थी
  • प्रेम से अलग होने पर वही ऊँगली क्या क्या रंग दिखाने लगी ?
  • सुदर्शन चक्र उठाकर विनाश के काम आने लगी 
  • कान्हा और द्वारकाधीश में क्या फर्क होता है बताऊँ ‘
  • कान्हा होते तो तुम सुदामा के घर जाते सुदामा तुम्हारे घर नहीं आता
  • युद्ध में और प्रेम में यही तो फर्क होता है युद्ध में आप मिटाकर जीतते हैं, और प्रेम में आप मिटकर जीतते हैं.
  • कान्हा प्रेम में डूबा हुआ आदमी दुखी तो रह सकता है पर किसी को दुःख नहीं देता।

आप तो कई कलाओं के स्वामी हो स्वप्न दूर द्रष्टा होगीता जैसे ग्रन्थ के दाता हो, पर आपने क्या निर्णय किया। अपनी पूरी सेना कौरवों को सौंप दी? और अपने आपको पांडवों के साथ कर लिया। सेना तो आपकी प्रजा थी। राजा तो पालाक होता है। उसका रक्षक होता है।
आप जैसा महा ज्ञानी उस रथ को चला रहा था जिस पर बैठा अर्जुन आपकी प्रजा को ही मार रहा था। आपनी प्रजा को मरते देख आप में करूणा नहीं जगी क्यूंकि आप प्रेम से शून्य हो चुके थे।
आज भी धरती पर जाकर देखो, अपनी द्वारकाधीश वाली छवि को ढूंढते रह जाओगे। हर घर हर मंदिर में मेरे साथ ही खड़े नजर आओगे। आज भी मै मानती हूँ लोग गीता के ज्ञान की बात करते हैं, उनके महत्व की बात करते है, मगर धरती के लोग, युद्ध वाले द्वारकाधीश पर नहीं प्रेम वाले कान्हा पर भरोसा करते हैं। गीता में मेरा दूर दूर तक नाम भी नहीं है। पर आज भी लोग उसके समापन पर” राधे राधे” करते हैं।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी की आप सभी साथियों को हार्दिक बधाई। भगवान श्री कृष्ण जी का आशीर्वाद हम सभी पर सदैव बना रहे, यही मेरी प्रार्थना है।

।। राधे राधे।।🙏

Thursday, 11 August 2022

संस्कृत: वह एकमात्र भाषा जो आज भी प्रयोग में है



संस्कृत भाषा गायब नहीं हुई है। भारत में जैसे जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय और दुनिया भर के कई शोध संस्थानों में विशेषज्ञ संस्कृत भाषा का अनुसंधान कर रहे हैं। देश या कहें विदेशों के कई मंदिरों में आज भी भिक्षु व भिक्षुणी प्रतिदिन संस्कृत में शास्त्रों का पाठ करते हैं। संस्कृत का अभी भी दुनिया में अपने अद्वितीय सांस्कृतिक मूल्य के साथ उपयोग किया जा रहा है, और यह निश्चित रूप से भविष्य में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहेगी।


       


भारत में सबसे पुराने ग्रंथ, जैसे "वेद", संस्कृत भाषा से बने हैं, और उनमें उपमहाद्वीप की कुछ प्राचीन भाषाओं जैसे तमिल के तत्व भी शामिल हैं। भारत में कुछ मंदिरों और यहां तक कि दूरदराज के कुछ इलाकों में अभी भी संस्कृत का प्रयोग किया जाता है। प्राचीन भारत में लगभग सभी महत्वपूर्ण ग्रंथ संस्कृत में लिखे गए थे, जिसने बहुत सारे नाटक, दर्शन, वास्तुकला, योग, पौराणिक कथाओं आदि की भी जन्म हुई थी। शास्त्रीय संस्कृत में बड़ी संख्या में धार्मिक, दार्शनिक, साहित्यिक, वैज्ञानिक, राजनीतिक, कानूनी और कलात्मक रचनाएँ भी लिखी गईं थीं। सौभाग्यवश, वे सभी हजारों वर्षों के ऐतिहासिक परिवर्तनों से बचे हैं।


           


हालाँकि, संस्कृत एक मौखिक भाषा नहीं बन पाई। यहां तक कि पंडित भी शायद संस्कृत का इस्तेमाल केवल औपचारिक उद्देश्यों के लिए करता था। इस संबंध में, संस्कृत भाषा प्राचीन काल की चीनी भाषा के समान है। अर्थात्, यद्यपि लोग इसे लिखित रूप में उपयोग करते थे, पर बातचीत में दूसरी बोली भाषा का इस्तेमाल करते थे। संस्कृत अब आमतौर पर केवल धार्मिक समारोहों में और जन्म, विवाह, अंत्येष्टि और मंदिर की प्रार्थना जैसे अवसरों पर उपयोग की जाती है।

संस्कृत का मूल्य कई सांस्कृतिक क्लासिक्स में परिलक्षित होता है, और दूसरी ओर, लोगों का मानना है कि संस्कृत के उपयोग से मस्तिष्क की शक्ति में सुधार हो सकता है, और संस्कृत का उपयोग करने वाले लोग भगवान के साथ आध्यात्मिक संचार प्राप्त कर सकते हैं। इसीलिए स्कूल के पाठ्यक्रम में संस्कृत को शामिल करना आवश्यक साबित है। संस्कृत विज्ञान, गणित, चिकित्सा और अंतरिक्ष से संबंधित ज्ञान में समृद्ध है। इसके अलावा, कई एशियाई देशों की भाषाओं में संस्कृत तत्व भी हैं, जो इतिहास और धार्मिक प्रसारण के परिणाम दोनों से संबंधित हैं।


        


संस्कृत भाषा ने हमारी संस्कृति, संस्कार, परम्पराओं और सभ्यताओं को सींच कर समृद्ध बनाया है। वैज्ञानिक भाषा होने के साथ संस्कृत विश्व की अनेक भाषाओं की जननी भी है। संस्कृत दिवस पर हम अपनी इस अमूल्य धरोहर को संरक्षित-संवर्धित करने के प्रति समर्पित हों। संस्कृत दिवस की शुभकामनाएं।