Tuesday, 21 November 2023

कहां राजा भोज- कहां गंगू तेली —


बहुत दिनों से सोच रहा था आंखिर यह कहावत क्यों बनी होगी? मैंने अक्सर बचपन से लेकर आज तक हजारों बार इस कहावत को सुना था कि "कहां राजा भोज- कहां गंगू तेली" आमतौर पर यह ही पढ़ाया और बताया जाता था कि इस कहावत का अर्थ अमीर और गरीब के बीच तुलना करने के लिए है। पर गाँव से बाहर जाकर पता चला कि कहावत का दूर-दूर तक अमीरी- गरीबी से कोई संबंध नहीं है और ना ही कोई गंगू तेली से संबंध है। आज तक तो सोचता था कि किसी  गंगू नाम के तेली की तुलना राजा भोज से की जा रही है यह तो सिरे ही गलत है। बल्कि गंगू तेली नामक शख्स तो खुद राजा थे। 


जब इस बात का पता चला तो आश्चर्य की सीमा न रही साथ ही यह भी समझ आया यदि घुमक्कड़ी ध्यान से करो तो आपके ज्ञान में सिर्फ वृद्धि ही नहीं होती बल्कि आपको ऐसी बातें पता चलती है जिस तरफ किसी ने ध्यान ही नहीं दिया होता और यह सोचकर हंसी भी आती है। यह कहावत हम सब उनके लिए सबक है जो आज तक इसका इस्तेमाल अमीरी गरीबी की तुलना के लिए करते आए हैं। 

इस कहावत का संबंध मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल और उसके जिला धार से है। भोपाल का पुराना नाम भोजपाल हुआ करता था। भोजपाल नाम धार के राजा भोजपाल से मिला। समय के साथ इस नाम में से "ज" शब्द गायब हो गया और नाम भोपाल बन गया। 

अब बात कहावत की कहते हैं, कलचुरी के राजा गांगेय (अर्थात गंगू) और चालूका के राजा तेलंग (अर्थात तेली) ने एक बार राजा भोज के राज्य पर हमला कर दिया इस लड़ाई में राजा भोज ने इन दोनों राजाओं को हरा दिया उसी के बाद व्यंग्य के तौर पर यह कहावत प्रसिद्ध हुई "कहां राजा भोज-कहां गंगू तेली"।

❣️अनायास ही भूपेन हजारिका का यह गीत मुझे याद आता है--

गली के मोड़ पे.. 
सूना सा कोई दरवाजा
तरसती आंखों से रस्ता किसी का देखेगा। 
निगाह दूर तलक..  
जा के लौट आयेगी
करोगे याद तो हर बात याद आयेगी। 

कुछ क़िस्से, कुछ कहानियाँ ही इतिहास है। जिन्हें हम सब भूलते जा रहे हैं। सब समझाइए, लोगों के मन में छोटे-बड़े शहरों के प्रति मोह जगाइए, प्रेम जगाइए। पढ़ने वाले तो सब जगह पढ़ लेते हैं।

Thursday, 16 November 2023

कृत्रिम मेघा और पत्रकारिता



मेरा इकलौता सुझाव यह है कि, अपने सपने का अनुसरण करें और वहीं करें जो आपको सबसे अच्छा लगता हो। मैंने पत्रकारिता इसलिए चुना, क्योंकि मैं ऐसी जगहों पर होना चाहता था जहां इतिहास गढ़े जाते हों। 


स्वतंत्रता आंदोलन के कालखण्ड में राष्ट्र जागरण में समाचार पत्रों की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही है, इसलिए हमारे देश में पत्रकारिता व्यवसाय नही, अपितु सांस्कृतिक मूल्यों के उन्नयन और सामाजिक न्याय का आश्वासन है। सूचना और संचार की क्रान्ति के इस युग में प्रेस की स्वायत्तता और अभिव्यक्ति सुरक्षित रहे, किन्तु समाज के प्रति मीडिया की संवेदनशीलता और अधिक अपेक्षित है।  

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (कृत्रिम मेघा) आने वाले समय में पत्रकारिता में क्रांतिकारी परिवर्तन लायेगा। आने वाले भविष्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग में मीडिया नए कीर्तिमान स्थापित करेगा। यह ठीक वैसा ही वाक्या है जब देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी ने देश को कंप्यूटर व हर हाथ मोबाईल का सपना दिखाया था। जिसके अपने कुछ फ़ायदे व नुक़सान हैं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी इस क्षेत्र का एक अगला कदम है। 

बदलते समय के साथ तकनीक में बदलाव भी आवश्यक है और बदलते समय के साथ इससे अपनाना भी आवश्यक है। कृत्रिम बुद्धिमता आगामी समय की मांग है जो पत्रकारिता को आगे बड़ाने में सहायक सिद्ध होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आने वाले समय में पत्रकारिता में क्रांतिकारी परिवर्तन लायेगा। बदलते परिवेश में मीडिया की भूमिका में भी बदलाव आया है। एक सशक्त राष्ट्र निर्माण व विकास में मीडिया की अहम भूमिका है तथा लोकतंत्र में मीडिया का प्रमुख स्थान है तथा इसे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ भी कहा जाता है।


माना जाता है कि मीडिया सरकार व प्रशासन के बीच सेतु के रूप में कार्य करता है तथा सरकार की विकासात्मक नीतियों व कार्यक्रमों को लोगों तक पहुँचाने में मीडिया की अहम भूमिका रहती है। वहीं इन योजनाओं से मिलने वाले लाभों व योजना की सफलता व कमियों के बारे में फीडबैक देने भी में मीडिया की अहम भूमिका है।

आज जहां समाज और व्यवस्था के हर अंग में नैतिक गिरावट आई है, वहां पत्रकारिता की गिरावट के लिए केवल पत्रकारों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। जहां वे पेशेवर मानकों और नैतिकता को बनाए रखने की जिम्मेदारी निभाते हैं, वहीं जनता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। 

एक जीवंत लोकतंत्र और मजबूत मीडिया पारिस्थितिकी तंत्र के लिए पत्रकारों और जनता के बीच साझेदारी की आवश्यकता होती है, जो सटीक, विश्वसनीय और सार्थक जानकारी के प्रवाह को सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम करते हैं। केवल सामूहिक प्रयासों से ही हम चुनौतियों से निपट सकते हैं और एक ऐसे भविष्य का निर्माण कर सकते हैं जहां पत्रकारिता लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और सकारात्मक बदलाव के लिए एक आवश्यक शक्ति के रूप में विकसित हो। 

लोगों के लिए हर जगह जाना असंभव है, इसलिए दुनिया के बारे में उनकी समझ मीडिया पर निर्भर करती है। प्रसारण, टेलीविज़न, प्रिंट मीडिया तथा ऑनलाइन मीडिया सभी की ज़िम्मेदारी है कि वे लोगों को अच्छी तस्वीर प्रदान करें, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें झूठी जानकारी फैलानी चाहिए या जानबूझकर तथ्यों को विकृत करना चाहिए। मीडिया सूचनाओं और विचारों को संप्रेषित करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाता है। लेकिन, व्यावसायीकरण के कारण कई मीडिया अपनी निष्पक्षता खो चुके हैं। विशेष हितों और राजनीतिक स्थितियों के अनुरूप समाचार रिपोर्टों में हेराफेरी और छेड़छाड़ की जाती है। झूठी जानकारियों के फैलने से सामाजिक भ्रम पैदा हुआ और अविश्वास बढ़ा।  
 
भविष्य में समाज चाहे कैसा भी विकसित हो, मीडिया एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। और मीडिया चाहे कोई भी मॉडल विकसित करे, पाठ, ध्वनि और चित्र मीडिया की मुख्य सामग्री होंगे। मीडिया तस्वीर और ध्वनि के माध्यम से लोगों को विभिन्न प्रकार के मनोरंजन और जानकारी प्रदान करता है। लेकिन अगर मीडिया वास्तविक जीवन के प्रतिबिंब को नजरअंदाज करते हुए और केवल झूठी सुंदरता को लोगों तक पहुंचाते हुए, आँख बंद करके उच्च रेटिंग और व्यावसायिक हितों का पीछा करता है, तो इससे लोगों को वास्तविक जीवन में और अधिक निराशा महसूस होगी। इस संबंध में न केवल मीडिया, बल्कि मुझे डर है कि फिल्में भी वही भूमिका निभाती हैं। वास्तव में, फिल्में सबसे शक्तिशाली प्रचार सामग्री हैं। सभी देशों की फिल्में अपनी कलात्मक सामग्री के माध्यम से लोगों तक विचार पहुंचाती हैं।
  
मीडिया की झूठ जानकारियों से लोग जीवन में सच्चाई का सामना करने में असमर्थ हैं, जिससे लोगों के बीच अलगाव को भी बढ़ावा मिलता है। उदाहरण के लिए, इंटरनेट पर लोग अपने सच्चे विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने के लिए अधिकतर छद्म शब्दों का प्रयोग करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोग गुमनाम ऑनलाइन वातावरण में अपनी राय अधिक खुलकर व्यक्त कर सकते हैं। लेकिन, यह गुमनामी अपने साथ झूठी, अपमानजनक और गैरजिम्मेदाराना बयानबाजी भी लाती है। आज इंटरनेट अफवाहों और दुर्भावनापूर्ण टिप्पणियों से भरा है, क्योंकि नेटिजनों को अपनी वास्तविक पहचान की ज़िम्मेदारी नहीं उठानी पड़ती है। संक्षेप में, मीडिया में फेक जानकारियों का प्रसार आधुनिक समाज में मूल्यों के असंतुलन को दर्शाता है। केवल इमानदारी संचार और पारस्परिक समझ के माध्यम से ही दुनिया को बढ़ावा मिलेगा।

लोकतंत्र के सजग प्रहरी के रूप में जन-जन की आवाज़ बनकर राष्ट्र एवं समाज को सही दिशा देने वाले सभी पत्रकार बंधुओं को राष्ट्रीय प्रेस दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ। आपकी सजग, स्वतंत्र और साहसिक पत्रकारिता राष्ट्रनिर्माण के यज्ञ में आवश्यक आहुति है।

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Friday, 27 October 2023

हां तुम बिलकुल —


अधिकांश सुन्दरी-सेवियों के जीवन में एक ऐसा समय आता है जब सुंदरियाँ उनके पास श्रद्धा-पूर्ण पत्र भेजने लगते हैं। कोई उनकी शारीरिक प्रशंसा करता है कोई उनके सद्विचारों पर मुग्ध हो जाता है। मुझ जैसे अदने से लेखक को भी कुछ दिनों पूर्व यह सौभाग्य प्राप्त है। ऐसे पत्रों को पढ़ कर हृदय कितना गद्गद हो जाता है इसे किसी मुझ जैसे भोले लड़के ही से पूछना चाहिए। अपने फटे कंबल पर बैठा हुआ वह कैसे गर्व और आत्मगौरव की लहरों में डूब जाता है। भूल जाता है कि रात को गीली लकड़ी से भोजन पकाने के कारण सिर में कितना दर्द हो रहा था खटमलों और मच्छरों ने रात भर कैसे नींद हराम कर दी थी। मैं भी कुछ हूँ यह अहंकार उसे एक क्षण के लिए उन्मत्त बना देता है। पिछले साल सावन के महीने में मुझे एक ऐसा ही पत्र मिला। उसमें मेरी मनगणत प्रसंग की दिल खोल कर दाद दी गयी थी।

पत्र-प्रेषक स्वयं एक अच्छे कवि हैं। मैं उनकी कविताएँ पत्रिकाओं में अक्सर देखा करता हूँ। कवि महोदय का पत्र, पत्र कम किसी उपहार से कहीं अधिक मर्मस्पर्शी था। प्यारे भैया ! कह कर मुझे सम्बोधित किया गया था मेरी रचनाओं की सूची और प्रकाशकों के नाम-ठिकाने पूछे गये थे। अंत में यह शुभ समाचार है कि मेरी पत्नी जी को आपके ऊपर बड़ी श्रद्धा है। वह बड़े प्रेम से आपकी रचनाओं को पढ़ती हैं। वही पूछ रही हैं कि आपका विवाह कहाँ हुआ है। आपकी संतानें कितनी हैं तथा उनकी कोई फोटो भी है हो तो कृपया भेज दीजिए। मेरी जन्म-भूमि और वंशावली का पता भी पूछा गया था। इस पत्र विशेषतः उसके अंतिम समाचार ने मुझे पुलकित कर दिया।


यह पहला ही अवसर था कि मुझे किसी महिला के मुख से चाहे वह प्रतिनिधि द्वारा ही क्यों न हो अपनी प्रशंसा सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। गरूर का नशा छा गया। धन्य है भगवान् ! अब रमणियाँ भी मेरे कृत्य की सराहना करने लगीं ! मैंने तुरंत उत्तर लिखा। जितने कर्णप्रिय शब्द मेरी स्मृति के कोष में थे सब खर्च कर दिये। मैत्री और बंधुत्व से सारा पत्र भरा हुआ था। अपनी वंशावली का वर्णन किया। कदाचित् मेरे पूर्वजों का ऐसा कीर्ति-गान किसी भाट ने भी न किया होगा। स्पष्ट से अपनी बड़ाई करना उच्छृंखलता है मगर सांकेतिक शब्दों से आप इसी काम को बड़ी आसानी से पूरा कर सकते हैं। खैर मेरा पत्र समाप्त हो गया और तत्क्षण लेटर बॉक्स के पेट में पहुँच गया। इसके बाद से आज तक कोई पत्र न आया।

अपने विवरण के पूर्ण होने के पश्चात् मुझे अनायास ही याद आया “चांद सी महबूबा हो मेरी” गाने में हीरो अपनी हिरोइन के मोटापे से दुखी है। वह उस पर उसका मज़ाक़ भी बनाता है और डर के मारे खुद के मन को भी समझाता नजर आता है। वही अधिकतर हमारे समाज की भी समस्या आन पड़ी है। तभी तो आज प्रातः भ्रमण पर सड़क का नजारा आप देख सकते हैं। इतनी सुबह-सुबह आंखिर किसको क्या चाहिए। इसी उधेड़बुन में हम लगातार भीड़ का हिस्सा बने हुए हैं। उसने हरगिज़ नही सोचा था कि महबूबा एक ही बच्चे के बाद चांद जैसी गोल मटोल हो जायेगी। अगली लाइन में पिटने से बचने के लिए बेचारा मजबूरी में बोला "हां तुम बिलकुल वैसी हो जैसा मैंने सोचा था"। यही हाल मेरे कुछ साथियों का भी है, यदि किसी के दिल पर लगे तो क्षमाप्रार्थी हूँ। वैसे मेरी नजर से तुम देखो तो फिर एक मस्त फ़साना याद आयेगा, ऐसे न देख मुझे नजर लग जायेगी, चोट जाने कहां-किधर लग जायेगी”। चल हट झूठे, बुरी नजर वाले तेरा मुँह काला। 

खैर अब तो अपनी महबूबा की तुलना भी कोई चाँद से करने में इतना कतरायेगा, जैसे विक्रम वेताल ने कोई डरावनी कहानी से रूबरू कराया हो। इस पर बहादुर शाह ज़फ़र ने क्या खूब फ़रमाया है,—
तुम ने किया न याद कभी भूल कर हमें,
हम ने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया। 

व्यक्ति में इतनी ताकत हमेशा होनी चाहिए कि अपने दुख अपने संघर्षों से अकेले जूझ सके। जिस दिन ये समझ आ गया तो उस दिन लगने लगेगा बस जीवन इसी का एक पहलू है। 

“सिंह सुवन, सत्पुरुष वचन, कदली फलै इक बार,
तिरिया तेल हमीर हठ, चढ़ै न दूजी बार.“

यानीं सिंहनी एक बार में एक ही शावक को जन्म देती है सज्जन लोग बात को एक बार ही कहता है, केला एक बार ही फलता हैं। स्त्री को एक बार ही तेल उबटन लगाया जाता हैं ऐसा ही राव हम्मीर का हठ हैं यानि हम्मीर देव चौहान ने एक बार जो ठान लिया, फिर वो अपनी भी नहीं सुनते थे, इस कारण इन्हें हठीला हम्मीर भी कहा जाता हैं। 

    

Saturday, 21 October 2023

मानसिकता की सारी गड़बड़ —



मुझे लगता है हर किसी मन में कुछ पाने की दौड़ हमेशा नचाती है। अक्सर ऐसे में वह छूट जाता है जो सामने है, जो वर्तमान क्षण है। आप जो भी पाने के लिए दौड़ेंगे, वही नहीं मिलेगा। 

अहिंसक होना चाहेंगे, हो नहीं पाएँगे। शांत होना चाहेंगे, शांत नहीं हो पाएँगे। संसार से भागना चाहेंगे, भाग नहीं पाएँगे। जो भी होना होता है। वह कभी भी आपकी चाह से नहीं होता। चाह से चीजें दूर हटती जाती हैं। चाह दरअसल बाधा है। आप जो हो बस उसी के साथ राजी हो जाएँ। यही सुखी जीवन का मूल मंत्र है। तो पूरे होश के साथ आप अपनी सजगता बनाए रखें। प्रकृति स्वयं सब सिद्ध करेगी।


कभी सोचा है आपने, यह भ्रम किसने फैलाया कि स्त्री पर हाथ नहीं उठाया जाना चाहिए? तो चलिए आज कुछ इतिहास के तथ्यों के माध्यम से समझते हैं आंखिर हम किस हद तक सही हैं? हमारा पहाड़ किस दिशा की तरफ बड़ रहा है? विचार करियेगा...

हनुमान जी ने भी दो गदा खींच के मारा था लंकिनी को, भरत जी ने अपनी माँ कैकेई को भला बुरा सुनाया था, ज़रूरत पड़ने पर लक्ष्मण जी ने सूर्पनखा का नाक काट दिया, भगवान श्री कृष्ण ने भी पूतना का वध किया था!

जब रानी चेनम्मा और रानी लक्ष्मीबाई युद्ध के मैदान में गयी तो क्या स्त्री समझ कर उन पर वार नहीं किया गया होगा? युद्ध का मैदान स्त्री पुरुष का भेद क्या जाने?

कन्या है तो हाथ मत उठाओ, आखिर क्यों भाई? गलती करेगी तो मार भी पड़ेगी जैसे बेटे को पड़ती है, सब सुविधा दो लेकिन हाथ मत उठाओ?

इसी मानसिकता ने सारी गड़बड़ की है, दो थप्पड़ बचपन में लगाओ और फिर बताओ की तुम कहीं की परी नहीं हो, गलती करोगी तो कुटाई भी होगी, तब जाकर वह एक दम सही रास्ते पे चलेगी

सारा काम मेरी गुडिया, मेरी रानी, मेरी परी करने वालों ने बिगाड़ा है, लेकिन जब उनकी बेटी लव जिहाद का शिकार हो जाती है तब उनके पास छाती पीटने के अलावा कोई उपाय नहीं बचता, एक घटना देखने को मिला है जिसमें अपनी बेटी को तो सुधार नहीं पाए लेकिन श्राद्ध जरूर किए थे तो आखिर ऐसा नौबत क्यों आया?

लड़का और लड़की दोनों को हमारा धर्म और कानून समानता का अधिकार देता है लेकिन अक्सर यह देखने को मिलता है गलती चाहे लड़की करे फिर भी ज्यादातर दोष लड़कों के ऊपर डाल दिया जाता है। 

आजकल अक्सर आपको बड़े शहरों में देखने को मिलेगा की बहुत सी लड़कियां नशा करती है, गलत रास्ते पर चलती है और इसका असर धीरे-धीरे छोटे-छोटे शहरों के साथ गांव में भी आने लगा है। इस पर हमारे देश की सिनेमा का बहुत बड़ा हाथ है। सास भी कभी बहूँ थी दिखाकर संयुक्त परिवारों का बंटाधार किया है। कौन और क्यूँ कोई सुध लेगा। जिसका सम्राट ही घर-परिवार त्याग आधुनिक महात्मा बन बैठा हो। 

आज फिर जुकरू से अकाउंट प्रतिबन्धित करवाने की तमन्ना है……..

Sunday, 8 October 2023

मैं....

पेड़ कितना मजबूत है
ये पेड़ नहीं आँधियाँ बतायेंगी,
तुम्हारे चित्त की हालत
तुम्हारे शब्द नहीं
तुम्हारी वृत्तियाँ बतायेंगी।
मैं ने देखी, 
मैं की माया।
मैं को खोकर, 
मैं ही पाया।
सिर्फ़ सिर झुका तो क्या झुका
अहंकार झुकाओ तो जानें……….


Sunday, 1 October 2023

फकीरी -



अपनी ज़िन्दगी भी यारों कुछ वो जींस, टी-शर्ट की यारी जैसी हो चली है। इस पर किसी ने खूब कहा कहा है, “जींस, टी-शर्ट तो वैसे भी मजदूरों के लिए बनाए गए थे जो आज बदलते वक्त के साथ फैशन में आ गए।”

अजीब है न!


जब कभी मैं प्रेम विषय पर कुछ लिखना चाहता हूं और दिमाग ब्लैंक हो जाता है तब मैं तुम्हारी तस्वीर देखता हूँ। तुम्हारी ऑंखें, तुम्हारे होंठ, तुम्हारा चेहरा। फिर उंगलियां तैरती है कीबोर्ड पर और छप जाती है कोई प्रेम कहानी। सच कहूं तो तुम पूरी किताब हो प्रेम की, मैं बस कुछ पन्नों को ही पढ़ पाया हूँ। बहुत मशरूफ़ रहता हूं, दुआ करो मुझे फुर्सत नसीब हो और पूरी किताब पढ़ सकूं तसल्ली से।

कहते हैं चमकीली धूप जब सर्द लकीर बनकर रह जाए तो दर्द होता है। अनगिनत पीड़ाओं को जब अल्फाजों की रूह न मिले तो दर्द होता है॥

ईश्वर ने हर किसी को कुछ रिश्तों के साथ धरती पर भेजा, उनके लिए शुक्रिया और शुक्रिया उन रिश्तों के लिए भी जो अपने आप ही बनते गए। कब कैसे किधर..? कुछ नहीं पता, पर बने। कुछ तूफान आने पर भी टिके रहे और कुछ हवा की जरा सी सरसराहट भी झेल न सके और उड़ गए। ऐसे रिश्तों के लिए शुभचिंतकों से नसीहतें मिलती रहती है कि मैंने इन्हें बिना-वजह ही सर पर चढ़ाया, खुशामद की। कुछेक लोगों को लगता है मेरा इनसे कोई गुप्त मतलब होता है तभी, अब मतलब क्या है वो तो मेरा दिल या उनका दिल ही जानता है।

वैसे जब पीड़ाओं को अल्फाज़ न मिले तो, मैं बस वही अल्फाज़ बनने की कोशिश करता हूं, पर वो शब्द कब पन्ने - पन्ने बढ़ते चले जाते हैं पता नहीं चलता। फिर रुकूं तो उन्हीं लोगों को तकलीफ होती है। नतीजा, वहीं रिश्ते पलायन करने लगते हैं और दोष अल्फाजों को देने लगते है। खैर अब मैंने फकीरी अपना ली है। अपनी चारपाई खुले आकाश के नीचे बिछाई है, न दीवारों का डर और न दरवाजे का। रही बात अल्फाज़ बनने की तो जन्मजात गुण है जो जाने नहीं वाला। बाकी जिन्हें ठहरना है वो ठहरें, जिन्हें जाना है वो शौक से जाएं।

वैसे अब उम्र धीरे-धीरे फिसल रही है। पता भी नहीं कितनी बाकी रही, रोज थोड़े पन्ने पढ़ता हूँ दुआ करो साँसे पूरी होने से पहले आखिरी पन्ना पलटकर बन्द कर दूं किताब।

मुझे मजनू नहीं बनना, न रांझा, न रोमियों। इनके जैसा कुछ नही चाहिए। मुझे इमरोज के फीमेल वर्जन की तलाश है। हो सके तो दुआ करना यहीं नसीब हो। जीवन की संध्या में तुम्हारे साथ रहने का सौभाग्य या कोई ऐसा मकान जो पटा पड़ा हो तुम्हारी तस्वीरों से। दीवारों, छतों, सीढ़ियों हर जगह बस तुम ही तुम। हो सके तो दुआ करना। सुना है जिसकी ऑंखें मासूम होती है ऊपर वाला भी उनकी सुनता है ...

कहाँ से लाऊँ रोशनी, खुशी व उम्मीद की बातें ? जो जीवन में ना के बराबर है। इन काले यथार्थ के अतल गह्वर में एक सर्जक के नाते मैं अपनी ओर से छींट भर रंग, चुटकी भर उजाला घोल सकता हूँ। इससे ज्यादा क्या ? ख़ुशी, उम्मीद, सपने शून्य में पैदा नहीं हो सकते। इन्हें एक ठोस आधार चाहिए होता है। 

मेरे हाथ में क़लम है, लिखने को कुछ भी लिख दूँ, पल में हवाई महल खड़ा कर दूँ, दुष्टों का नाश कर दूँ, लाटरी लगवा दूँ, मगर जीवन की समस्याओं का ऐसा सरलीकृत हल देना सही होगा क्या ?

Wednesday, 27 September 2023

जब शहर सो रहा था-



अहा बारिश और मैं, कभी झम झम के स्वर से आपकी नींद खुले, तो देखो जैसे बारिश पंचम स्वर में आलाप ले रही हो। घुप्प अंधेरे में बरसते मेघ जल को सुनना प्रेम के जादुई अक्षरों को सुनने से कम नहीं होता। बिन बादल बरसात के इन्ही दिनों में कोई मनोहरा मन को हर ले गई होगी।


बरसती बूंदों के संगीत, उसका स्पर्श, उसे महसूस करने के अपरिमित सुख का एकमात्र अधिकारी। दामिनी दमक रही घन माही, मेरे घर आंगन में लगा छितवन चमकने लगता है, उसकी पत्तियां फूल आई हैं। फूलना कितनी सुखद क्रिया है। प्रेम और मिलन की अभिव्यक्ति है फूलना। जीवन पुष्पित पल्लवित होने का नाम है, फूल जैसे हो जाने का नाम है। फूलने का आनंद ही देवत्व है। देव पर फूल चढ़ाते हुए शायद ही कोई इस भाव में हो कि देव से मिलन का आह्लाद कैसा होता है। भागदौड़ कर फूल फेंक दिया , लो जी हो गया मिलन, शुष्क मन से अर्पित फूल देव तक पहुंचने से पहले ही रुक्ष हो जाते होंगे। 

सिंदूरी बादलों को छूकर आती हवा में लाज की गंध बसी है। अनायास ही सितंबर की खुमारी मन को गुदगुदाने लगती है और बीते पलों के नाव पर बैठा देती हैं। कितनी शहद सी स्मृतियाँ मौसम के परों पर बैठी आस पास उड़ने लगती हैं। 
  
सिहराती नदी का वह किनारा दिखने लगता है जहाँ साँझ के कोमल पाँवों में कोई लाली लगा रहा होता है और शबनमी चाँद मुस्कान की तरह उभरता है, सितारों की कतार रोशन हो उठती है। ऐसा लगता है कि जैसे किसी ने पारिजात के फूलों की छड़ी हवा में उछाल दी। त्यौहारों की उमंग का कोष धीरे धीरे बढ़ रहा होता है। 

शामें और उनकी सरगोशियाँ, लैंप पोस्ट से आती मद्धिम मुलायम सी रोशनी, यूँ  ही घूमते घामते बेवजह ही किसी चाय की टपरी पर कदम रुकते हैं। उबलती चाय रूमानियत का पर्याय बन जाती है। मौसम का स्वाद और गाढ़ा हो जाता है। एक कहानी का अक्स दिखता है जिसकी नायिका नीली साड़ी और पफ ब्लाउज पहने नायक के कंधे पर सर रख कर शाम का ढलना देख रही है, दोनो चुप हैं पर दोनो के हृदय-मध्यांतर भावयामि के गीतों से भरी एक  धारा बह रही है। 

सितम्बर मयूर सा है, त्योहार सा है, कुमकुम सा है, रास सा है, फूल सा है, सुगंध सा है, बंशी की धुन सा है। सितम्बर प्रेम सा है, सितंबर प्रेम है। 

समय कब गुजर जाता है पता नहीं चलता, मैं अपनी सारी सजगताएं खो देना चाहता हूं, बरसते पानी में बहा देना चाहता हूं, बहाकर ठीक वैसे खुश होना चाहता हूं जैसे बच्चे पानी में कागज की नाव बहाकर खुश होते हैं। अचानक बस की पों पों से फूल कुम्हला जाता है। साढ़े छह बजे हैं। सड़क पर स्कूल बस आई है, एक मां अपने बच्चे को बस में बैठा रही है, बड़बड़ाए जाती है, पन्नी लपेटे बच्चा भी कूं कां करता हुआ पीठ पर बैग लादे पानी से बचते हुए बस में बैठ रहा है। मैं केवल इतना सुन पाता हूं, बड़ा ही गंदा मौसम है। मन में फांस सा धंस जाता है।

मौसम के सौंदर्य बोध की ग्रंथियों को मार कर हम कौन सी शिक्षा व्यवस्था का निर्माण कर रहे हैं, बच्चों का बचपन खाता स्कूल जेल से भी बदतर कब हो गया कुछ पता नहीं चला, मां बाप की इतनी हिम्मत नही है कि कह दें, मत जा स्कूल चल आज कैरम खेलते हैं, बरसात को सेलिब्रेट करते हैं। उन्हें डर है कि एक दिन भी क्लास मिस होने से बच्चा गंवार हो जायेगा। 

मुझे ख्याल आता है कि शायद सुपरसोनिक स्पीड से भागती हुई सभ्यता में ठहर कर बारिश को देखने बात अजीब हो सकती है या विकास की दौड़ में एक एक सेकंड का इस्तेमाल कर कर्मठ लोगों के मध्य बरसात की जल-तरंगो को सुनना कहीं असभ्यता की श्रेणी में तो नहीं आता। बारिश बदस्तूर जारी है, दामिनी दमक रही है, घनराज की दुंदुभी बज रही है, पन्नी में लिपटे लोग पानी में भाग रहे हैं, दरअसल पानी से भाग रहे हैं, दरअसल पूरी सभ्यता अब पानी से भाग रही है, या पानी के पीछे भाग रही है।