Sunday, 30 April 2023

हवा रुक सी गई



"मैं चुप था तो चलती हवा रुक गई, ज़ुबा सब समझते हैं जज्बात की!"
वैसे गौर करें तो हर कहानी में ग़लती है। मनुष्य ग़लतियों के सोपान पर चढ़कर ही तो ज़िंदगी का महाकाव्य लिखता है। लेकिन, दूसरों की कहानी की त्रुटियों को लाल रंग से रेखांकित करने में व्यस्त हम, अपनी कहानी के इन्द्रधनुष को देखना भूल जाते हैं। जीना भूल जाते हैं। मनुष्य अपना समय और परिश्रम मात्र दूसरों की ख़ुशी से दुःखी होने में लगा देता है और ख़ुशी उसकी चौखट से मायूस लौट जाती है। 

ऐसा होता है, नहीं? 



जीवन में बहुत से काम मैं सिर्फ़ अपने कर्मों का हिसाब-किताब ठीक रखने के लिए करता हूँ। बचपन में मेरे कुछ दोस्त अक्सर कहा करते थे कि जब आपकी आँखें दुनिया की बदसूरती और खूबसूरती गहराई से देख लेती हैं तब बोलने लगती हैं। मैंने अपने छोटे से जीवन में इतना कुछ देख लिया है कि उस ‘देखने’ की वजह से काव्यात्मक न्याय पर मेरा विश्वास बहुत गहरा हो गया है। इसलिए अब मुझे छोटा और कमीना दिल रखना सबसे ज़्यादा ख़तरनाक लगता है।

मेरा किसी ने कितना दिल दुखाया, यह अब मेरे लिए उतना प्राथमिक प्रश्न नहीं है जितना यह कि मैंने तो गलती से किसी को चोट नहीं पहुँचाई? मैं अपनी चेतना में आई इस नई जागरूकता और सतर्कता की वजह से कई बार बहुत हैरान होता हूँ। उदारता कितना मुश्किल गुण है और कितना ज़रूरी, यह आपको तभी मालूम चलता है जब आपको खुद अपने लिए किसी और की आँखों में इसकी दरकार होती है। संवेदना एकदम वर्कआउट से मिलने वाली ऊर्जा की तरह है। जितना अभ्यास करेंगे उतनी ज़्यादा मिलती जाएगी। 

कमबख्त बड़ा मीठा नशा है यादों का भी,
वक़्त गुजरता गया और हम आदी होते गए। 
रुक सी जाती है सासें तेरे सौन्दर्य के दीदार से,
तबाही मचा देती है मेरे मन में तेरी अदाएं भी प्यार से।

Tuesday, 25 April 2023

अननोन नंबर से फोन कॉल



आज किसी तरह का कोई काम न होने के कारण दोपहर भोजन के बाद यूं ही बेले बैठे हुए थे, अचानक एक अननोन नंबर से फोन आया, पहले तो कट कर दिया फिर दूसरी बार में उठाया तो…………..

"प्लीज माफ कर दो, अब नही करुंगी शक आप पर, भले आपका नंबर बिजी रहेगा, आपको कॉल करके परेशान भी नही करुंगी, शॉपींग कराने की जिद भी नही करुंगी, रिचार्ज खुद करा लुंगी, प्लीज माफ कर दो"

पता नही किसकी गर्लफ्रेंड थी, पर सुन के बहुत तसल्ली हुई थी... 




एक घण्टे के बाद पुनः एक अननोन नंबर से फिर फोन आया, उठाया तो सवाल था..

"आप राजकुमार बोल रहे हैं?"
"जी बोल रहे हैं। आप कौन?
"हम फलाने (नाम सही से याद नहीं) बोल रहे हैं दिल्ली से। फेसबुक पे बहुत पढ़े हैं आपको। बहुत अच्छा लिखते हैं आप!"

"बहुत-बहुत आभार। पर नंबर किसने दिया आपको मेरा?"
"आपकी किसी पोस्ट में किसी ने आपसे आपका नम्बर मांगा था। वहीं से लिया"

"अरे! (हमें हँसी आई और खुशी भी महसूस हुई) वही सोच रहा हूं यार मैं, किसी को जल्दी नम्बर तो देता नही और msg भी नहीं पढ़ पाता जल्दी msngr वाला" 

"वहीं से लिए सर"
"कोई बात नही। अच्छा किया। क्या करते हैं आप?"

"सर B.Sc कर रहे हैं। सेकेंड ईयर है।"
"बहुत बढ़िया यार। चलो पढ़ते रहो। हमको भी और अपना कोर्स भी। एसएससी की भी तैयारी करो। स्कोप अच्छा है।"
"हाँ सर देखेंगे।"
"चलो ठीक हैं फिर बाद में बात करते हैं।"

और फिर फोन रख दिया। अक्सर कुछ दोस्त भी पूछते हैं कैसे पा जाते हो इतनी मोहब्बत? जवाब आज तक नही मिला मुझे। खैर बाद में बात करना भूल गया। नम्बर भी पीछे छूट गया। भूलने की बीमारी पता नही मुझसे क्या क्या छुड़वायेगी...

आप, सर, भैया इतना सम्मान जब इस वर्चुअल दुनिया से मिलता है तो अच्छा लगता है। बाकी फोन नम्बर पाने के लिए तो हमने कई बार पापड़ बेलें है पर लड़की होशियार निकली। 2011 तक की पोस्ट और कमेंट छान मारा...

दोस्त अगर पढ़ रहे हो ये पोस्ट तो फिर से फोन करना। अच्छा लगा मुझे। पता चला कि लिख के पैसा न सही ये सम्मान तो कमा ही लिया है, बाकी हमे तो लगा कि हम सिर्फ गरलसखी की गालियां खाने को ही अवतरित हूये हैं! वैसे कई बार बस में भी लोग मिल चुके हैं, मेले में भी, बाज़ार में भी। और तो और यूपीएससी के एग्जाम वाले रूम में भी। बहुत अच्छा लगता है। अनजान लोग आपको सिर्फ फेसबुक से पहचान लेते हैं। मेरी तो किताब भी नही आई यार। पर दिल बाग-बाग हो जाता है....

बाकी आपका कभी बागेश्वर (उत्तराखंड) आना तो खबर कर देना। तुमको भट्ट के डुपके-भात खिलाएंगे, पहाड़ की सुन्दरता दिखलायेंगे और यहां बहने वाले झरनों का संगीत भी सुनाएँगे। दादी-नानी की कहानी किस्से व अल्हड़ बचपन से भी रूबरू कराएँगे। ढेरों प्रेम मित्र, इस जलन भरी दुनिया में तुम जैसे लोग बोरोलीन का काम करते हैं। हर मर्ज का इलाज। 

सोचा इस वर्चुअल दुनिया से मिलने वाले प्यार को इसी वर्चुअल दुनिया से सांझा करूँ।  

आभार! ढेरों धन्यवाद!!

Monday, 24 April 2023

मैं और मेरा महाभारत



दोस्तों मन के अंदर जैसे ही कोई इच्छा उठती है, तो उससे जुड़ी न जाने कितनी इच्छाएं उत्पन्न हो जाती हैं। इसे आप ऐसा वृक्ष मान सकते हैं, जिसकी सैकड़ों टहनियां, हजारों डंठल और लाखों पत्तियां हैं। ये असंख्य इच्छाएं पैदा तो होती हैं मन में, लेकिन दिखाई देती हैं कल्पना के पर्दे पर। इच्छा के अनुकूल ही विचार पैदा होते हैं। ये इच्छाएं मन में उत्पन्न होती हैं, इसलिए मन ही व्यक्ति का प्रतिरूप होना चाहिए। कह सकते हैं कि मन का ही साकार रूप है मनुष्य।
वैसे मुझे रामायण की जगह महाभारत पसंद है, इसके पीछे कारण हैं महाभारत के कुछ किरदार जो आज के समाज व मुझसे मेल खाते है ! जो निम्न है!



♦️मामा शकुनी —
इनकी तरह एकदम षडयंत्रकारी, संवाग रचने की अद्भूत कला में माहिर हूँ। अक्सर मैं फेसबुक पर कुछ ऐसा लिख देता हूँ जिससे दो लोग आपस में भिड़ बैठते हैं जबकि मुझसे कोई नहीं लड़ता। कुछेक जगह ऐसी टिप्पणी कर देता हूँ जिससे वहाँ का मनोरम दृश्य जमघट में बदल जाता हैं, लोग शायरी छोड़ तलवार बाजी की बाते करने लगते हैं !

♦️धृतराष्ट्र —
अक्सर मेरी पोस्ट पर लोग लडते है तो मैं चुपचाप उनके कमेंट पढता हूँ, या नहीं भी लड़ते तो बहुत सारी टिप्पणियाँ आ जाती हैं देखता हूँ तब भी कोई जवाब नहीं देता ना लाईक करता हूँ! बस उनकी तरह अंधा नहीं हूँ पर इस मामले में बन जाता हूँ ! 

♦️भीम —
भीम की तरह भोजन उठाना, भीम की तरह मेरा भी उपहास उडाया जाता हैं मित्रो द्वारा भोजन को लेकर। पर मेरा कोमल हृदय उन्हें हर बार माफ कर देता हैं। भले 70 हाथियो जितनी ताकत नहीं है किंतु दो तीन लौन्डो़ को कभी भी अकेले रगड़ दूंगा !

♦️कर्ण — 
काबिल और ओहदा प्राप्त लोग मेरा सम्मान इसलिए नहीं करते क्योकि मेरे पास सरकारी नौकरी नहीं हैं, जबकि उनको पता हैं उनसे ज्यादा टैलेंट है मेरे में बस मेरा प्रारब्ध मेरे साथ नहीं है ! 

♦️भीष्म —
वचन निभाने में माहिर ( कई लोग इस बात से सहमत होंगे जब पढेंगे तो ) दूसरा अपने प्रण पर टिके रहना जैसे 'जो बीत गया है वो अब दौर ना आएगा, इस दिल में सिवा तेरे कोई और ना आएगा ' !

वैसे बात में दम तो है कि जितनी गहरी आपकी इच्छा होगी, कल्पनाओं के रंग भी उतने ही स्पष्ट और चटख होंगे। कल्पनाओं के रंग जितने अधिक चटखदार होंगे, उस इच्छा को पूरा करने वाले हमारे विचार भी उतने ही अधिक ठोस और मजबूत होंगे। हमारी इच्छा की गहराई ही हमारे विचारों और संकल्पशक्ति की गहराई होती है। इच्छा ही विचार बनते हैं और विचार ही हमारे कर्म बनते हैं। जब हम इन कर्र्मो को लगातार करते चले जाते हैं, तो ये ही कर्म हमारी आदत बन जाते हैं, हमारा व्यवहार बन जाते हैं और हमारी ये आदतें और व्यवहार हमारा व्यक्तित्व बन जाते हैं।


दोस्त यहां रोता वही है जिसने सच्चे रिश्ते को महसूस किया हो, वर्ना मतलब का रिश्ता रखने वालों की आंखों में न शर्म होती है और न पानी। मैं वह नहीं हूँ जो दिखता हूँ, मैं वह हूँ जो लिखता हूँ।

Friday, 14 April 2023

Congratulations Bageshwar


बधाई हो!

कुमाऊं मंडल के सबसे अधिक राजस्व देने वाले बागेश्वर जिले में निवास करने वाले व्यक्ति की सबसे कम 98,755 रुपये प्रति व्यक्ति आय है। यदि हम बात करें यहां के विकास को सरकार द्वारा आवंटित (जिला योजना) बजट की तो उससे अधिक का राजस्व यहां आवंटित शराब की दुकानों से सरकार को प्राप्त होता है। बांकी अन्य संसाधनों से आप स्वयं ही अंदाज़ा लगा सकते हैं, कहां खड़े हैं? खैर जो भी हो आप इसे सरकार के साथ उत्सव के रूप में मनाने को तैयार रहें। क्यूँकि आँकड़े बतलाते हैं कि प्रति व्यक्ति आय दुगनी हो चुकी है।



♦️ जनपदवार प्रतिव्यक्ति आय-

जनपद 2011-12                 2021-22
उत्तरकाशी         49584                   1,07281
चमोली             64,327                  1,27,330
रुद्रप्रयाग          46,881                   93,160
टिहरी              49,854                  1,03,345
देहरादून           1,06,552                2,35,707
पौड़ी                50,476                  1,08,640
हरिद्वार             1,76,845               3,62,688
पिथौरागढ़         52,413 1,                  18,678
बागेश्वर            46,457                  98,755
अल्मोड़ा।          55,640                   1,00844
चंपावत             52,463                   1,16,136
नैनीताल            94,142                   1,90,627
ऊधमसिंह नगर   1,26,298              2,69,070

♦️नोटः वर्ष 20111-12 आधार वर्ष, 20021-22 जारी वर्ष दर                                    
2021-22                                                    2022-23
सकल राज्य घरेलू उत्पाद         265488         3,02000
विकास दर                          7.05                  7.09
प्रति व्यक्ति आय                  205,840          2,33,000

♦️बहुआयामी गरीबी-

आर्थिकी में सुधार के बावजूद राज्य के सामने बहुआयामी निर्धनता के रूप में बड़ी चुनौती उपस्थित है। बहुआयामी गरीबी में हेड काउंट रेशियो के घटते क्रम में उत्तराखंड 15वें स्थान पर है। राज्य में 17.72 प्रतिशत जनसंख्या बहुआयामी निर्धर है। इनमें 25.65 प्रतिशत हेड काउंट रेशियो के साथ अल्मोड़ा जनपद सर्वाधिक निर्धन है। यह दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है। जिलों में ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वाधिक निर्धनता हरिद्वार में 29.55 प्रतिशत है। नगरीय क्षेत्र में चम्पावत जिला सबसे अधिक 20.90 प्रतिशत निर्धन हैं। वहीं बागेश्वर जनपद की यदि बात करें तो यहाँ 19.9 प्रतिशत निर्धन हैं। 

हालांकि, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, ग्रामोदय योजना, स्वर्णजयंती रोजगार योजना समेत कई योजनाएं चल रही हैं, लेकिन गरीब आज भी गरीब ही है। साफ है कि योजनाओं के क्रियान्वयन में कहीं न कहीं खोट है, जो नीति नियंताओं को नजर नहीं आ रहा।

Tuesday, 28 February 2023

मैं बागेश्वर जनपद हूँ




“मैं बागेश्वर जनपद हूँ"
नदियाँ पहाड़ हैं शान मेरी
मैं हरा भरा सा एक जनपद हूँ 
छोटी काशी सब कहते मुझे 
मैं बागेश्वर जनपद हूँ “

खो रही अब पहचान मेरी 
कटते पेड़ ले रहे जान मेरी 
अब चंद वर्षों का बचा खेल हूँ 
मैं बागेश्वर जनपद हूँ 

ये जो नोच नोच मुझे खा रहे 
ये सब इंसान हैं कातिल मेरे 
इनकी महत्वाकांक्षा की चढ़ती भेंट हूं 
मैं बागेश्वर जनपद हूँ 

कहीं मेरे पहाडों को काट रहे 
कहीं मेरी नदियों को बाँट रहे 
अब बन रहा मैं बंजर खेत हूँ 
मैं बागेश्वर जनपद हूँ 

अपनी बदहाली पर रो रहा हूँ 
तुम इंसानों की खबाहिशें ढो रहा हूँ 
मेरी नदियाँ नाले सब सूख रहे 
पल-पल मुझे सब कोस रहे 

अब तो रूक जाओ मैं कह रहा हूँ 
बख्श दो मुझको कब से सह रहा हूँ 
अब बचा लो मुझे जितना बचा शेष हूँ 
मैं तुम्हारा अपना बागेश्वर जनपद हूँ। 


तेरे साथ चलूँ
तेरे साथ रहूं
थक कर
तेरे सीने पर
सर रख दूं
ऐसी मनमानियों को
दिल चाहता है... ❤️❤️🙏

Monday, 30 January 2023

जब बारिश के बाद खिलते हैं धरती के रंग और मयूर के पंख तो थोड़े सुर्ख़ हो जाते हैं गाल भी..






धरती से टकराने वाली बारिश की बूंदों की खुशबू मेरी आत्मा को भर देती है क्योंकि पानी का छींटा मेरे कानों के लिए शुद्ध संगीत है। सब कुछ उज्जवल और हरा-भरा है। मौसम सुंदर और रोमांटिक है। 

वैसे बारिश को एक निश्चित अनुपात में होना चाहिए। इतना कि कोई गीला हो पर डूबे ना, फूल खिलें पर गलें ना, जो लोग घरों के बाहर हैं वे वापस लौट सकें। फसल और चेहरे खिल सकें। बारिश को इतना भर होना चाहिए कि किसी को याद किया जा सके, इतना ही बरसे पानी कि जिसे याद किया है उसे भुलाया जा सके।


कहते हैं न बारिश का समय वह समय होता है जब आप अपने जीवन के प्यार के साथ एक कप गर्म चाय पीते हुए बैठते हैं। आप बालकनी में या खिड़की के पास बैठे हैं, धरती को छू रही बारिश की शांत धुन सुन रहे हैं। या तो वह या आप बाहर बारिश का पानी डालने में भीग रहे हैं। यह लगभग वैसा ही है जैसे पानी हमारी सारी चिंताओं को दूर कर देता है और उस समय हम बेफिक्र, आजाद होते हैं।

कुछ लोग मौसम को उदास मान सकते हैं और जिस तरह से आप इसे समझते हैं, उसके आधार पर यह हो सकता है। गरज और रोशनी, तेज और गर्जना, अक्षम्य बाढ़। लेकिन आप दर्द में डूबते हुए आनंद को नहीं भूल सकते। दोनों उत्साह जगाते हैं, फिर भी कहीं न कहीं आप अज्ञात की गहराइयों में डूब जाते हैं। जब आप प्यार में होते हैं तो सब कुछ अधिक सुंदर और उज्जवल लगता है। यह अपूरणीय क्षति भी पहुंचा सकता है, लेकिन हम अभी भी रोमांस की महाकाव्य कहानियों से प्यार करते हैं, है ना?

बारिश तो प्रेमियों का इत्र है, बदन पे मलो तो महक उठे। फिर किसके भीतर प्रेम नहीं रहता, सभी तो गढ़ते हैं अपने हिस्से की परिभाषा। मनुष्य को न देखो तो दरख़्तों को निहारो, बरखा में संवाद करते हैं वे और सावन में उन पर डले झूले। आकाश तक पहुंचने की कोशिश में नन्हे कदम महत्वाकांक्षाओं की पहली उड़ान भरते हैं। 

जब बारिश के बाद खिलते हैं धरती के रंग और मयूर के पंख तो थोड़े सुर्ख़ हो जाते हैं गाल भी। धरती पर हर बूंद के साथ नृत्य करती हैं कलियां, उनके निखर जाने का समय जो है। तमाम रंग जोड़कर इकट्ठा करता है चित्रकार, पीत में मिलाकर नील बरसाए तो हरा बने। मेघ नहीं बरसते मात्र बारिश में स्मृति भी रिसती हैं, दीवार पर पानी की बूंदें आती हैं जैसे जाने कहां से। कितना कुछ फिर लौट आता है इस बारिश, मैंने जाना कि जो नहीं है मौजूद मैंने उसे आज तक नहीं कहा है विदा।




"मेरा नाम और मेरे बारे में तो अब तक आप अपनी धारणा ke अनुरूप जान ही चुके होंगे: मैं बहुत दिनों से स्वयं को लेखकों व पत्रकारों की ज़मात में शामिल करवाना चाहता था। कोई भी कितना भी अच्छा लेखक हो, कवि हो, या ये हो या वो हो, जब तक वह पुराने पापियों के बीच घुसकर खड़ा नहीं होता, तब तक उसे मान्यता नहीं मिलती। वैसे भी लेखन में मेरा कोई बड़ा योगदान अब तक नहीं रहा है, पर जब भी कुछ लिखता हूँ तो अकसर मेरा दिल भी लेखक कहलाये जाने के लिए मचल जाता है।"

"मगरमच्छ की दुनिया पानी है। पानी से ऊबकर कुछ देर के लिए वह धरती पर आता है, धूप के मज़े लेने या खुली हवा में सांस लेने। इसी प्रकार मैदानी इलाकों में रहने वाले नीरस लोग रस की तलाश में समुद्र की ओर भागते हैं या पर्वत की ओर। मगरमच्छ और मनुष्य का स्वभाव एक जैसा है, कुछ देर के लिए बाहर निकलने का लेकिन दोनों में कुछ मौलिक अंतर है। मगरमच्छ बाहर निकल कर रेत पर पसरकर आराम करता है, जबकि मनुष्य पैदल चल-चल कर हैरान होने के लिए बाहर निकलता है। जिसे भी पैदल चलने में कष्ट होता हो, उसे अपने घर में टीवी के सामने बैठकर दुनिया देखनी चाहिए। लेकिन यदि घर से निकल पड़े तो ट्रेन, टैक्सी, ऑटो, होटल की विविध समस्याओं के साथ पैरों का दर्द सहना होगा–यह यात्रा का समानान्तर सुख है।"

बस इस बारिश की हल्की-फुल्ली रिमझिम फुहार में क्या करोगे सुनकर मुझसे मेरी कहानी, बेलुत्फ जिन्दगी के किस्से हैं कुछ फीके-फीके मेरी जुबानी।

Sunday, 22 January 2023

आना-पाई से चलकर लाखों की स्टार नाईट तक जा पहुंचा बागेश्वर उत्तरायणी मेला



एक सरयू गोमती तहजीब थी। सरयू गोमती किनारे पनपी पली बढ़ी आकृति स्वरूप जन्म लेती बहुतेरी संस्कृतियां थीं। उन्हीं संस्कृतियों गुरुत्वता से निर्धारित बिल्कुल सत्य सटीक कथन था कि " वाक्य की संरचना करना आसान और उसकी यथार्थता का आंकलन कर उसे अनुभव करना कठिन है, जटिल है। जैसे कल्पनाओं में ऊंची उड़ान भरना और पंखों से ऊंची उड़ान भरना। दोनों में कई सौ योजन अनुभव का फर्क है। यूं कल्पनाओं में चाहे तो भूमि की गहराई माप ली जाए या नभ की ऊंचाई लेकिन जब चेतना यथार्थ ऊंचाई और यथार्थ गहराई की माप करती है तब जीवन के मायने थोड़ा नहीं कई गुना अलग हो जाते हैं।”


यूं तो बहुत ख़ास होता है एक मेला। मेले में हर चेहरे पर खुशी हो यह जरूरी नहीं। उदासियों की झुर्रियां भी कई चेहरों पर बटी होती हैं। मेले में भी बहुत बार होंठ सिले होते हैं। फिर भी देखने पर बड़ा हसीन सा लगता है एक मेला। आज भी कुछ खास फर्क नहीं आया है मेले में। वही पुरानी पारंपारिक मिठाईया, कपड़े, कुछ खिलौने और ढेर सारे छोटे मोटे वस्तुओं का भंडार सा लग जाता है। उस दिन कई छोटे छोटे दुकानों पर बड़ी उत्सुकता के साथ भीड़ सी लग जाती है। कई किलकारियां बड़ी उत्तेजना के साथ पुलकित हो उठती हैं और एक मेला अपने दिन की शुरुवात कर देता है।


बात करें बागेश्वर के उत्तरायणी मेले (कौतिक) की तो इसकी शुरुआत आज़ादी से पहले की है। इस दिन देवों की पूजा आरती के साथ शंख और नगाड़ों की ध्वनि से उदघोष कर रहा मेला प्रारम्भ होता था। पुष्प की खुशबुओं और इत्र की सुगंध के साथ अगरबत्तियों की महक लिए मेलार्थी अपने शुरुवाती बिंदु से अपना सफर तय करता है। अतिथि स्वरूप दूर सुदूर से लोग आकर यहीं अपना डेरा जमाने लगते हैं। बस कुछ एक दिन के लिए। भीड़ हर मेले का हिस्सा होता है। बिना भीड़ के कोई मेला मेला नहीं होता। देखने वाली बात यह है कि मेले का सांस्कृतिक महत्व कितना रहा है। उसे किन वजहों से तरजीह दी जाती रही है। उसके विन्यास के प्रतिबिंब उसी आकार में निर्मित होते हैं।


उत्तरायणी मेले में दुकानों की श्रृंखला,आपसी भाईचारे की झलक,छोटी मोटी प्रतियोगिताओं का दौड़, सांस्कृतिक भोज्य पदार्थ, सांस्कृतिक कार्यक्रम, राजनीतिक मंच और विभिन्न प्रकार के छोटे छोटे उद्योग कर्ताओं को अपने सर समान के बिक्री करने का एक सुनहरा अवसर। आज़ादी से पहले की यदि बात करें तो यह मेला व्यापार का मुख्य केन्द्र रहा है। यहां नेपाल, तिब्बत, मुंश्यारी व महानगरों से व्यापारी आकार बाज़ार लगाते थे। पहले वस्तु विनिमय होता था, आज मुद्रा। कहीं राम धनुष लेकर मारीच को मारते तो कहीं कृष्ण की बांसुरी का वादन। मेला अपनी छटा यहां भगवान शंकर जी के आंगन में बहुत बेहतर बिखेरता है। मेला इस विशेष स्थान से संबंधित एक जन्मदिन की तरह होता है। जिसे मनाने आज भी दूरस्थ पदचाप भागते चले आते हैं।


शहर के बूढ़े बुजुर्ग कहते हैं कि “उनके समय में मेले के लिए एक दो दिन पैदल चलकर ही बागेश्वर पहुंचा जाता था और उनके समाज के आधे से अधिक लोगों ने न तो बागेश्वर देखा और न उत्तरायणी का मेला। बस सुना और उनकी यादों में रचा बसा मेला देखे बिना ही ओ इस जहां को अलविदा कह चले। पहले लोगों के पास न संसाधन थे न ही आज की तरह आर्थिक सम्मपन्नता। अस्सी वर्ष की बागेश्वर के एक दूरस्थ गाँव की अम्मा कौशल्या देवी जी बतलाती है कि हम जब जवान थे तब पैदल बागेश्वर टोलियों में जाते व आते थे। इन सबमें तीन या चार दिन का समय लगता था वापस अपने घर गाँव पहुंचने में। कहते हुए उनकी आंखों से बहती आँसुओ की धारा बिन बोले ही हज़ारों दुःख बयान कर जाती है। उनका कहना था कि तब हम बहुत सारी महिलाएँ अपनी सास व अन्य लोगों के साथ भजन कीर्तन करते, बाबा बागनाथ जी के जयकरो के साथ घर से बागेश्वर तक का सफर काटते थे। तब राशन साथ लेकर चलते और जहां रात हुई वही डेरा डाल लेते थे। रात भर झोड़े-चाचरियों की महफ़िल सजाई जाती थी। तब लोग बहुत मिलनसार हुआ करते थे। आज देखो घर के दरवाज़े पर कार, बैठे तो फुर्र बागेश्वर बाज़ार और शाम को घर, “बखता तेर बलाई ल्यूल”। तब हम साल भर आना पाई जोड़ कर मुश्किल से दो चार रुपए जोड़ कर मेला खर्च जुटा पाते थे। उस पर भी गाँव पड़ोस में सभी के लिए “कौतिकि बान” लेकर जाना होता था। तब यहां मिठाई कोई नही जानता था, केवल जलेबी मिला करती थी। देखो आज हमारे देखते देखते आना पाई से मेला लाखों की स्टार नाईट के खर्च पर पहुँच गया है। 


अभी कुछ समय पहले तक इसे नौ लाख की उत्तरायणी कौतिक कहा जाता था पर अब एक रात के कुछ घण्टों में नौ लाख खर्च हो रहे हैं, इस हिसाब से अब यह करोड़ों का मेला बन चला है। आज मेले में हैलीकाप्टरों में लोग घूम रहे हैं। पहले तो जब पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी यहाँ आई थी तब ही यहाँ की महिलाओं ने ये जहाज़ देखा था। तब डिग्री कालेज का मैदान पूरा भर गया, बाज़ार में कहीं पाँव रखने की जगह नही थी। आज सब जहाज़ से अपना मकान देखने उड़ान भर रहे हैं। पहले झोड़े, चाचरी, भग्नोल गाये जाते थे, आज मंच पर डीजे बजाकर कलाकार नाच रहा है, क्या कहता है कुछ समझ नही आता है। बस बाजे के साथ सब नाच रहे हैं। अपनी बोली भाषा पहाड़ी बोलने से परहेज़ करने वाली नई पीढ़ी का बस यही मेला है। उसे अपनी सभ्यता, संस्कृति से हम लोग ही धीरे-धीरे दूर कर रहे हैं। 


वैसे जिन कन्धो पर जनता ने मेले की ज़िम्मेदारी सौंपी होती है वह अधिकारियों के सुर में सुर मिलाकर मेले के स्वरूप को ही बदल बैठे हैं, इन अधिकारियों को क्या मेला तो हमारी और आपकी संस्कृति से जुड़ा है, इसलिए इसे सम्भालने की ज़िम्मेदारी भी हम सभी को लेनी पड़ेगी। अपने अफसरों को खुश रखने की कोशिश करना। इन अधिकारियों की जुबान को वेदवाक्य समझना। अगर वे गलत भी कहें तो उसे ठीक मानना। इसी का नाम नौकरी है और वो यही सब तो कर रहे हैं, तुम थोड़े हो जो लगे पड़े हो। कहती हैं आज कोई बहु अपनी सास के मेला चले जाए ऐसा कम या यूँ कहें ना के बराबर देखने को मिलता है। वह बताती हैं कि माघ के माह के पहले गते को स्नान का बहुत महत्व था। स्नान के बाद तीन दिनों का व्रत होता था। आज कौन इतने नियम मान रहा है। आज मेले में चाऊमीन, मोमो की बहार है। 


आज के मेले का मतलब भीड़, हुड़दंग रह गया है। संस्कृति के नाम पर सांस्कृतिक मंच तो सजे है पर उन पर अपनी संस्कृति के बजाय फूहड़ गानों व गायकों को स्टार नाईट के नाम पर बुलाकर लाखों खर्च किए जा रहे हैं। पहले नदी बगड़ में राजनीतिक मंचो के विचारों व नेताओं को सुनने की भीड़ लगती थी, आज नेताओं से दूर भागने की रेस लगा रहे हैं लोग। खैर यह वही राजनीतिक व ऐतिहासिक जगह है जहां पर अंग्रेज़ी हुकूमत की नीव हिलाने का प्रण लेकर कुली बेगार प्रथा के रजिस्टर बहाकर अंत किया गया। आज मेले में मेलार्थियों से ज़्यादा तो पुलिसकर्मी हैं, उसके बाद भी अपराध लगातार चरम पर हैं। मेले में जाकर कभी तो ऐसा लगता है मैं कहीं किसी और देश तो नही आ गया हूँ गलती से। लम्बी बातचीत के बाद अम्मा को अपना परिचय दिया तो वह बोलीं खैर अब तुम क्या कर सकते हो तुम तो बस खबर लिखने वाले हुए पत्रकार साहब। मेला देखो और मौज लो। वैसे भी आज के  पत्रकार कहां कोई पत्रकार रह गए हैं…………



मैं उत्तरायणी मेले को लेकर अपनी यादों की कल्पना करूँ तो मुझे लगता है, पिता का कंधा मेले का रथ होता है। उनकी आंखों से सारा मेला अपने चरमोत्कर्ष पर दिखाई पड़ता है। उत्सव की बागडोर पिता की उंगली पकड़ कर चलने में है। वह मेला बहुत अधूरा सा रह जाता है जहां पिता के कंधों को ढूंढते रह जाया जाए और न मिले। जहां उनकी डांट फटकार कानों में मंत्रों के समान न गुंजित हो पावे। पिता के द्वारा अपने बच्चे को साधना उसे मेले के भीतर घूम रहे छद्म की तमाम अंगड़ाइयों से बचा लेता है जिसकी चपेट में आने से वह विलुप्त हो सकता है।


हर मेला अपने आप में बहुत ख़ास होता है।यह वह पगडंडी होती है जहां संभल कर कदम रखना बहुत आवश्यक है और वे कदम रखना सिखाते हैं पिता। मेले की तहजीब से वाकिफ होना है तो मेले का कारण जानने पर जोर देना चाहिए। मेले में आनंद प्राप्त करना है तो मेले को जीने पर जोर देना चाहिए।मेले को लेखिनी में उतारना हैं तो चेहरों पर लिखी पंक्तियों को अक्षशः पढ़ने पर जोर देना चाहिए। मेले से निकलना हो तो अपने पदांकुर पर बल देना चाहिए। क्योंकि एक मेला एक दिन का होता है। एक दिन चौबीस घंटों का होता है और भले ही मेला एक दिन का हो या कई दिन का, सच यह है कि जीवन में हमेशा मेले नहीं आते। अतः मेला सिर्फ एक दिन का सच है और जिंदगी का संघर्ष कई दिनों का यथार्थ इसलिए समय के कांटों को निश्चित कर मेले से सही समय पर निकल आना चाहिए। आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में वैसे ही कांटों की कहां कोई कमी है जो एक और मोल लेकर खुद ही खुद से पड़ी लकड़ी करें। 



“उत्तरायणी आते ही बागनाथ नगरी स्वर्ग की भाँति सज गयी, यहां का तृण तृण शिवमय हो चला। शिव भक्ति में लीन उत्तरायणी देखने की लालसा हर व्यक्ति में रहती है। हर व्यक्ति इस पल को यहां जी भर जी लेना चाहता है।”

फोटो साभार-- एड़ दिग्विजय सिंह जनौटी एवं सोशल साइट्स।