Friday, 14 April 2023

Congratulations Bageshwar


बधाई हो!

कुमाऊं मंडल के सबसे अधिक राजस्व देने वाले बागेश्वर जिले में निवास करने वाले व्यक्ति की सबसे कम 98,755 रुपये प्रति व्यक्ति आय है। यदि हम बात करें यहां के विकास को सरकार द्वारा आवंटित (जिला योजना) बजट की तो उससे अधिक का राजस्व यहां आवंटित शराब की दुकानों से सरकार को प्राप्त होता है। बांकी अन्य संसाधनों से आप स्वयं ही अंदाज़ा लगा सकते हैं, कहां खड़े हैं? खैर जो भी हो आप इसे सरकार के साथ उत्सव के रूप में मनाने को तैयार रहें। क्यूँकि आँकड़े बतलाते हैं कि प्रति व्यक्ति आय दुगनी हो चुकी है।



♦️ जनपदवार प्रतिव्यक्ति आय-

जनपद 2011-12                 2021-22
उत्तरकाशी         49584                   1,07281
चमोली             64,327                  1,27,330
रुद्रप्रयाग          46,881                   93,160
टिहरी              49,854                  1,03,345
देहरादून           1,06,552                2,35,707
पौड़ी                50,476                  1,08,640
हरिद्वार             1,76,845               3,62,688
पिथौरागढ़         52,413 1,                  18,678
बागेश्वर            46,457                  98,755
अल्मोड़ा।          55,640                   1,00844
चंपावत             52,463                   1,16,136
नैनीताल            94,142                   1,90,627
ऊधमसिंह नगर   1,26,298              2,69,070

♦️नोटः वर्ष 20111-12 आधार वर्ष, 20021-22 जारी वर्ष दर                                    
2021-22                                                    2022-23
सकल राज्य घरेलू उत्पाद         265488         3,02000
विकास दर                          7.05                  7.09
प्रति व्यक्ति आय                  205,840          2,33,000

♦️बहुआयामी गरीबी-

आर्थिकी में सुधार के बावजूद राज्य के सामने बहुआयामी निर्धनता के रूप में बड़ी चुनौती उपस्थित है। बहुआयामी गरीबी में हेड काउंट रेशियो के घटते क्रम में उत्तराखंड 15वें स्थान पर है। राज्य में 17.72 प्रतिशत जनसंख्या बहुआयामी निर्धर है। इनमें 25.65 प्रतिशत हेड काउंट रेशियो के साथ अल्मोड़ा जनपद सर्वाधिक निर्धन है। यह दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है। जिलों में ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वाधिक निर्धनता हरिद्वार में 29.55 प्रतिशत है। नगरीय क्षेत्र में चम्पावत जिला सबसे अधिक 20.90 प्रतिशत निर्धन हैं। वहीं बागेश्वर जनपद की यदि बात करें तो यहाँ 19.9 प्रतिशत निर्धन हैं। 

हालांकि, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, ग्रामोदय योजना, स्वर्णजयंती रोजगार योजना समेत कई योजनाएं चल रही हैं, लेकिन गरीब आज भी गरीब ही है। साफ है कि योजनाओं के क्रियान्वयन में कहीं न कहीं खोट है, जो नीति नियंताओं को नजर नहीं आ रहा।

Tuesday, 28 February 2023

मैं बागेश्वर जनपद हूँ




“मैं बागेश्वर जनपद हूँ"
नदियाँ पहाड़ हैं शान मेरी
मैं हरा भरा सा एक जनपद हूँ 
छोटी काशी सब कहते मुझे 
मैं बागेश्वर जनपद हूँ “

खो रही अब पहचान मेरी 
कटते पेड़ ले रहे जान मेरी 
अब चंद वर्षों का बचा खेल हूँ 
मैं बागेश्वर जनपद हूँ 

ये जो नोच नोच मुझे खा रहे 
ये सब इंसान हैं कातिल मेरे 
इनकी महत्वाकांक्षा की चढ़ती भेंट हूं 
मैं बागेश्वर जनपद हूँ 

कहीं मेरे पहाडों को काट रहे 
कहीं मेरी नदियों को बाँट रहे 
अब बन रहा मैं बंजर खेत हूँ 
मैं बागेश्वर जनपद हूँ 

अपनी बदहाली पर रो रहा हूँ 
तुम इंसानों की खबाहिशें ढो रहा हूँ 
मेरी नदियाँ नाले सब सूख रहे 
पल-पल मुझे सब कोस रहे 

अब तो रूक जाओ मैं कह रहा हूँ 
बख्श दो मुझको कब से सह रहा हूँ 
अब बचा लो मुझे जितना बचा शेष हूँ 
मैं तुम्हारा अपना बागेश्वर जनपद हूँ। 


तेरे साथ चलूँ
तेरे साथ रहूं
थक कर
तेरे सीने पर
सर रख दूं
ऐसी मनमानियों को
दिल चाहता है... ❤️❤️🙏

Monday, 30 January 2023

जब बारिश के बाद खिलते हैं धरती के रंग और मयूर के पंख तो थोड़े सुर्ख़ हो जाते हैं गाल भी..






धरती से टकराने वाली बारिश की बूंदों की खुशबू मेरी आत्मा को भर देती है क्योंकि पानी का छींटा मेरे कानों के लिए शुद्ध संगीत है। सब कुछ उज्जवल और हरा-भरा है। मौसम सुंदर और रोमांटिक है। 

वैसे बारिश को एक निश्चित अनुपात में होना चाहिए। इतना कि कोई गीला हो पर डूबे ना, फूल खिलें पर गलें ना, जो लोग घरों के बाहर हैं वे वापस लौट सकें। फसल और चेहरे खिल सकें। बारिश को इतना भर होना चाहिए कि किसी को याद किया जा सके, इतना ही बरसे पानी कि जिसे याद किया है उसे भुलाया जा सके।


कहते हैं न बारिश का समय वह समय होता है जब आप अपने जीवन के प्यार के साथ एक कप गर्म चाय पीते हुए बैठते हैं। आप बालकनी में या खिड़की के पास बैठे हैं, धरती को छू रही बारिश की शांत धुन सुन रहे हैं। या तो वह या आप बाहर बारिश का पानी डालने में भीग रहे हैं। यह लगभग वैसा ही है जैसे पानी हमारी सारी चिंताओं को दूर कर देता है और उस समय हम बेफिक्र, आजाद होते हैं।

कुछ लोग मौसम को उदास मान सकते हैं और जिस तरह से आप इसे समझते हैं, उसके आधार पर यह हो सकता है। गरज और रोशनी, तेज और गर्जना, अक्षम्य बाढ़। लेकिन आप दर्द में डूबते हुए आनंद को नहीं भूल सकते। दोनों उत्साह जगाते हैं, फिर भी कहीं न कहीं आप अज्ञात की गहराइयों में डूब जाते हैं। जब आप प्यार में होते हैं तो सब कुछ अधिक सुंदर और उज्जवल लगता है। यह अपूरणीय क्षति भी पहुंचा सकता है, लेकिन हम अभी भी रोमांस की महाकाव्य कहानियों से प्यार करते हैं, है ना?

बारिश तो प्रेमियों का इत्र है, बदन पे मलो तो महक उठे। फिर किसके भीतर प्रेम नहीं रहता, सभी तो गढ़ते हैं अपने हिस्से की परिभाषा। मनुष्य को न देखो तो दरख़्तों को निहारो, बरखा में संवाद करते हैं वे और सावन में उन पर डले झूले। आकाश तक पहुंचने की कोशिश में नन्हे कदम महत्वाकांक्षाओं की पहली उड़ान भरते हैं। 

जब बारिश के बाद खिलते हैं धरती के रंग और मयूर के पंख तो थोड़े सुर्ख़ हो जाते हैं गाल भी। धरती पर हर बूंद के साथ नृत्य करती हैं कलियां, उनके निखर जाने का समय जो है। तमाम रंग जोड़कर इकट्ठा करता है चित्रकार, पीत में मिलाकर नील बरसाए तो हरा बने। मेघ नहीं बरसते मात्र बारिश में स्मृति भी रिसती हैं, दीवार पर पानी की बूंदें आती हैं जैसे जाने कहां से। कितना कुछ फिर लौट आता है इस बारिश, मैंने जाना कि जो नहीं है मौजूद मैंने उसे आज तक नहीं कहा है विदा।




"मेरा नाम और मेरे बारे में तो अब तक आप अपनी धारणा ke अनुरूप जान ही चुके होंगे: मैं बहुत दिनों से स्वयं को लेखकों व पत्रकारों की ज़मात में शामिल करवाना चाहता था। कोई भी कितना भी अच्छा लेखक हो, कवि हो, या ये हो या वो हो, जब तक वह पुराने पापियों के बीच घुसकर खड़ा नहीं होता, तब तक उसे मान्यता नहीं मिलती। वैसे भी लेखन में मेरा कोई बड़ा योगदान अब तक नहीं रहा है, पर जब भी कुछ लिखता हूँ तो अकसर मेरा दिल भी लेखक कहलाये जाने के लिए मचल जाता है।"

"मगरमच्छ की दुनिया पानी है। पानी से ऊबकर कुछ देर के लिए वह धरती पर आता है, धूप के मज़े लेने या खुली हवा में सांस लेने। इसी प्रकार मैदानी इलाकों में रहने वाले नीरस लोग रस की तलाश में समुद्र की ओर भागते हैं या पर्वत की ओर। मगरमच्छ और मनुष्य का स्वभाव एक जैसा है, कुछ देर के लिए बाहर निकलने का लेकिन दोनों में कुछ मौलिक अंतर है। मगरमच्छ बाहर निकल कर रेत पर पसरकर आराम करता है, जबकि मनुष्य पैदल चल-चल कर हैरान होने के लिए बाहर निकलता है। जिसे भी पैदल चलने में कष्ट होता हो, उसे अपने घर में टीवी के सामने बैठकर दुनिया देखनी चाहिए। लेकिन यदि घर से निकल पड़े तो ट्रेन, टैक्सी, ऑटो, होटल की विविध समस्याओं के साथ पैरों का दर्द सहना होगा–यह यात्रा का समानान्तर सुख है।"

बस इस बारिश की हल्की-फुल्ली रिमझिम फुहार में क्या करोगे सुनकर मुझसे मेरी कहानी, बेलुत्फ जिन्दगी के किस्से हैं कुछ फीके-फीके मेरी जुबानी।

Sunday, 22 January 2023

आना-पाई से चलकर लाखों की स्टार नाईट तक जा पहुंचा बागेश्वर उत्तरायणी मेला



एक सरयू गोमती तहजीब थी। सरयू गोमती किनारे पनपी पली बढ़ी आकृति स्वरूप जन्म लेती बहुतेरी संस्कृतियां थीं। उन्हीं संस्कृतियों गुरुत्वता से निर्धारित बिल्कुल सत्य सटीक कथन था कि " वाक्य की संरचना करना आसान और उसकी यथार्थता का आंकलन कर उसे अनुभव करना कठिन है, जटिल है। जैसे कल्पनाओं में ऊंची उड़ान भरना और पंखों से ऊंची उड़ान भरना। दोनों में कई सौ योजन अनुभव का फर्क है। यूं कल्पनाओं में चाहे तो भूमि की गहराई माप ली जाए या नभ की ऊंचाई लेकिन जब चेतना यथार्थ ऊंचाई और यथार्थ गहराई की माप करती है तब जीवन के मायने थोड़ा नहीं कई गुना अलग हो जाते हैं।”


यूं तो बहुत ख़ास होता है एक मेला। मेले में हर चेहरे पर खुशी हो यह जरूरी नहीं। उदासियों की झुर्रियां भी कई चेहरों पर बटी होती हैं। मेले में भी बहुत बार होंठ सिले होते हैं। फिर भी देखने पर बड़ा हसीन सा लगता है एक मेला। आज भी कुछ खास फर्क नहीं आया है मेले में। वही पुरानी पारंपारिक मिठाईया, कपड़े, कुछ खिलौने और ढेर सारे छोटे मोटे वस्तुओं का भंडार सा लग जाता है। उस दिन कई छोटे छोटे दुकानों पर बड़ी उत्सुकता के साथ भीड़ सी लग जाती है। कई किलकारियां बड़ी उत्तेजना के साथ पुलकित हो उठती हैं और एक मेला अपने दिन की शुरुवात कर देता है।


बात करें बागेश्वर के उत्तरायणी मेले (कौतिक) की तो इसकी शुरुआत आज़ादी से पहले की है। इस दिन देवों की पूजा आरती के साथ शंख और नगाड़ों की ध्वनि से उदघोष कर रहा मेला प्रारम्भ होता था। पुष्प की खुशबुओं और इत्र की सुगंध के साथ अगरबत्तियों की महक लिए मेलार्थी अपने शुरुवाती बिंदु से अपना सफर तय करता है। अतिथि स्वरूप दूर सुदूर से लोग आकर यहीं अपना डेरा जमाने लगते हैं। बस कुछ एक दिन के लिए। भीड़ हर मेले का हिस्सा होता है। बिना भीड़ के कोई मेला मेला नहीं होता। देखने वाली बात यह है कि मेले का सांस्कृतिक महत्व कितना रहा है। उसे किन वजहों से तरजीह दी जाती रही है। उसके विन्यास के प्रतिबिंब उसी आकार में निर्मित होते हैं।


उत्तरायणी मेले में दुकानों की श्रृंखला,आपसी भाईचारे की झलक,छोटी मोटी प्रतियोगिताओं का दौड़, सांस्कृतिक भोज्य पदार्थ, सांस्कृतिक कार्यक्रम, राजनीतिक मंच और विभिन्न प्रकार के छोटे छोटे उद्योग कर्ताओं को अपने सर समान के बिक्री करने का एक सुनहरा अवसर। आज़ादी से पहले की यदि बात करें तो यह मेला व्यापार का मुख्य केन्द्र रहा है। यहां नेपाल, तिब्बत, मुंश्यारी व महानगरों से व्यापारी आकार बाज़ार लगाते थे। पहले वस्तु विनिमय होता था, आज मुद्रा। कहीं राम धनुष लेकर मारीच को मारते तो कहीं कृष्ण की बांसुरी का वादन। मेला अपनी छटा यहां भगवान शंकर जी के आंगन में बहुत बेहतर बिखेरता है। मेला इस विशेष स्थान से संबंधित एक जन्मदिन की तरह होता है। जिसे मनाने आज भी दूरस्थ पदचाप भागते चले आते हैं।


शहर के बूढ़े बुजुर्ग कहते हैं कि “उनके समय में मेले के लिए एक दो दिन पैदल चलकर ही बागेश्वर पहुंचा जाता था और उनके समाज के आधे से अधिक लोगों ने न तो बागेश्वर देखा और न उत्तरायणी का मेला। बस सुना और उनकी यादों में रचा बसा मेला देखे बिना ही ओ इस जहां को अलविदा कह चले। पहले लोगों के पास न संसाधन थे न ही आज की तरह आर्थिक सम्मपन्नता। अस्सी वर्ष की बागेश्वर के एक दूरस्थ गाँव की अम्मा कौशल्या देवी जी बतलाती है कि हम जब जवान थे तब पैदल बागेश्वर टोलियों में जाते व आते थे। इन सबमें तीन या चार दिन का समय लगता था वापस अपने घर गाँव पहुंचने में। कहते हुए उनकी आंखों से बहती आँसुओ की धारा बिन बोले ही हज़ारों दुःख बयान कर जाती है। उनका कहना था कि तब हम बहुत सारी महिलाएँ अपनी सास व अन्य लोगों के साथ भजन कीर्तन करते, बाबा बागनाथ जी के जयकरो के साथ घर से बागेश्वर तक का सफर काटते थे। तब राशन साथ लेकर चलते और जहां रात हुई वही डेरा डाल लेते थे। रात भर झोड़े-चाचरियों की महफ़िल सजाई जाती थी। तब लोग बहुत मिलनसार हुआ करते थे। आज देखो घर के दरवाज़े पर कार, बैठे तो फुर्र बागेश्वर बाज़ार और शाम को घर, “बखता तेर बलाई ल्यूल”। तब हम साल भर आना पाई जोड़ कर मुश्किल से दो चार रुपए जोड़ कर मेला खर्च जुटा पाते थे। उस पर भी गाँव पड़ोस में सभी के लिए “कौतिकि बान” लेकर जाना होता था। तब यहां मिठाई कोई नही जानता था, केवल जलेबी मिला करती थी। देखो आज हमारे देखते देखते आना पाई से मेला लाखों की स्टार नाईट के खर्च पर पहुँच गया है। 


अभी कुछ समय पहले तक इसे नौ लाख की उत्तरायणी कौतिक कहा जाता था पर अब एक रात के कुछ घण्टों में नौ लाख खर्च हो रहे हैं, इस हिसाब से अब यह करोड़ों का मेला बन चला है। आज मेले में हैलीकाप्टरों में लोग घूम रहे हैं। पहले तो जब पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी यहाँ आई थी तब ही यहाँ की महिलाओं ने ये जहाज़ देखा था। तब डिग्री कालेज का मैदान पूरा भर गया, बाज़ार में कहीं पाँव रखने की जगह नही थी। आज सब जहाज़ से अपना मकान देखने उड़ान भर रहे हैं। पहले झोड़े, चाचरी, भग्नोल गाये जाते थे, आज मंच पर डीजे बजाकर कलाकार नाच रहा है, क्या कहता है कुछ समझ नही आता है। बस बाजे के साथ सब नाच रहे हैं। अपनी बोली भाषा पहाड़ी बोलने से परहेज़ करने वाली नई पीढ़ी का बस यही मेला है। उसे अपनी सभ्यता, संस्कृति से हम लोग ही धीरे-धीरे दूर कर रहे हैं। 


वैसे जिन कन्धो पर जनता ने मेले की ज़िम्मेदारी सौंपी होती है वह अधिकारियों के सुर में सुर मिलाकर मेले के स्वरूप को ही बदल बैठे हैं, इन अधिकारियों को क्या मेला तो हमारी और आपकी संस्कृति से जुड़ा है, इसलिए इसे सम्भालने की ज़िम्मेदारी भी हम सभी को लेनी पड़ेगी। अपने अफसरों को खुश रखने की कोशिश करना। इन अधिकारियों की जुबान को वेदवाक्य समझना। अगर वे गलत भी कहें तो उसे ठीक मानना। इसी का नाम नौकरी है और वो यही सब तो कर रहे हैं, तुम थोड़े हो जो लगे पड़े हो। कहती हैं आज कोई बहु अपनी सास के मेला चले जाए ऐसा कम या यूँ कहें ना के बराबर देखने को मिलता है। वह बताती हैं कि माघ के माह के पहले गते को स्नान का बहुत महत्व था। स्नान के बाद तीन दिनों का व्रत होता था। आज कौन इतने नियम मान रहा है। आज मेले में चाऊमीन, मोमो की बहार है। 


आज के मेले का मतलब भीड़, हुड़दंग रह गया है। संस्कृति के नाम पर सांस्कृतिक मंच तो सजे है पर उन पर अपनी संस्कृति के बजाय फूहड़ गानों व गायकों को स्टार नाईट के नाम पर बुलाकर लाखों खर्च किए जा रहे हैं। पहले नदी बगड़ में राजनीतिक मंचो के विचारों व नेताओं को सुनने की भीड़ लगती थी, आज नेताओं से दूर भागने की रेस लगा रहे हैं लोग। खैर यह वही राजनीतिक व ऐतिहासिक जगह है जहां पर अंग्रेज़ी हुकूमत की नीव हिलाने का प्रण लेकर कुली बेगार प्रथा के रजिस्टर बहाकर अंत किया गया। आज मेले में मेलार्थियों से ज़्यादा तो पुलिसकर्मी हैं, उसके बाद भी अपराध लगातार चरम पर हैं। मेले में जाकर कभी तो ऐसा लगता है मैं कहीं किसी और देश तो नही आ गया हूँ गलती से। लम्बी बातचीत के बाद अम्मा को अपना परिचय दिया तो वह बोलीं खैर अब तुम क्या कर सकते हो तुम तो बस खबर लिखने वाले हुए पत्रकार साहब। मेला देखो और मौज लो। वैसे भी आज के  पत्रकार कहां कोई पत्रकार रह गए हैं…………



मैं उत्तरायणी मेले को लेकर अपनी यादों की कल्पना करूँ तो मुझे लगता है, पिता का कंधा मेले का रथ होता है। उनकी आंखों से सारा मेला अपने चरमोत्कर्ष पर दिखाई पड़ता है। उत्सव की बागडोर पिता की उंगली पकड़ कर चलने में है। वह मेला बहुत अधूरा सा रह जाता है जहां पिता के कंधों को ढूंढते रह जाया जाए और न मिले। जहां उनकी डांट फटकार कानों में मंत्रों के समान न गुंजित हो पावे। पिता के द्वारा अपने बच्चे को साधना उसे मेले के भीतर घूम रहे छद्म की तमाम अंगड़ाइयों से बचा लेता है जिसकी चपेट में आने से वह विलुप्त हो सकता है।


हर मेला अपने आप में बहुत ख़ास होता है।यह वह पगडंडी होती है जहां संभल कर कदम रखना बहुत आवश्यक है और वे कदम रखना सिखाते हैं पिता। मेले की तहजीब से वाकिफ होना है तो मेले का कारण जानने पर जोर देना चाहिए। मेले में आनंद प्राप्त करना है तो मेले को जीने पर जोर देना चाहिए।मेले को लेखिनी में उतारना हैं तो चेहरों पर लिखी पंक्तियों को अक्षशः पढ़ने पर जोर देना चाहिए। मेले से निकलना हो तो अपने पदांकुर पर बल देना चाहिए। क्योंकि एक मेला एक दिन का होता है। एक दिन चौबीस घंटों का होता है और भले ही मेला एक दिन का हो या कई दिन का, सच यह है कि जीवन में हमेशा मेले नहीं आते। अतः मेला सिर्फ एक दिन का सच है और जिंदगी का संघर्ष कई दिनों का यथार्थ इसलिए समय के कांटों को निश्चित कर मेले से सही समय पर निकल आना चाहिए। आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में वैसे ही कांटों की कहां कोई कमी है जो एक और मोल लेकर खुद ही खुद से पड़ी लकड़ी करें। 



“उत्तरायणी आते ही बागनाथ नगरी स्वर्ग की भाँति सज गयी, यहां का तृण तृण शिवमय हो चला। शिव भक्ति में लीन उत्तरायणी देखने की लालसा हर व्यक्ति में रहती है। हर व्यक्ति इस पल को यहां जी भर जी लेना चाहता है।”

फोटो साभार-- एड़ दिग्विजय सिंह जनौटी एवं सोशल साइट्स।

Sunday, 30 October 2022

"बड़े अच्छे लगते हैं"



तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे, 
मैं एक शाम चुरा लूं अगर बुरा न लगे। 

शायर को शायद शाम ही चुरानी थी। क्योंकि मौसम अच्छा हो तो दिन का कोई भी हिस्सा चुराया जा सकता था। लेकिन शाम ही क्यूं चुरानी है? 
शायद शाम ख़ास है। शाम ख़ास ही होती है। दिन का ऐसा प्रहर जिसमें कितनी ही कोपलें फूटने लगती हैं। समय के बाकी हिस्से आप देते रहेंगे खाद, पानी लेकिन कोपल शाम को ही दिखती है। 



“शाम को सिर्फ़ सूरज नहीं डूबता, बिछड़े हुए प्रेमियों के दिल भी डूब जाते हैं। जो चाँद ही न आए किसी शाम, धरी न रह जाएंगी लेखकों की कलम ? शाम ही है कि घर ले जाती है, सुबह ने तो दूर ही किया है सदैव।”

शाम संभवतः सबसे सुंदर आलिंगनों की गवाह है। विदा लेते हैं दिन के आए मेहमान और दावत पर पुराने मित्र अक्सर शाम को ही तो आते हैं। इस समय आसमान से सिर्फ़ सूरज नहीं उतरता दिन भर की थकन उतारने के जतन भी होते हैं। किसी शाम सोके उसी शाम उठ जाएं अगर, तो अगला दिन हो जाने का भरम होता है। क्या किसी अगले दिन सी ही हैं शाम ? तो कौन न चुरा लेगा अगला दिन एक शाम पहले। 

          

आजकल सोनी पर एक सीरियल आ रहा है "बड़े अच्छे लगते हैं"। मैं सीरियल्स वगेरा ज्यादा फॉलो नहीं करता, पर इसके प्रोमो ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींच लिया। जब सीरियल की हीरोइन जो कि 32 साल की उम्र में शादी करने जा रही है। कहती है कि "टीचर हूं सेल्फ डिपेंडेंट हूं पर फिर भी लोग पूछते हैं कि शादी कब कर रही हो, कोई भी अचीवमेंट शादी के सर्टिफिकेट को मैच नहीं कर सकता।" 

इस बात ने एक बार फिर से मुझे भारतीय समाज का असली चेहरा दिखा दिया। भारतीय समाज में शादी का बड़ा महत्व है, और लड़की की शादी तो जैसे सामाजिक मुद्दा बन जाता है। लड़की अगर पच्चीस पार कर जाए तो लोगों के सवाल बढ़ते ही चले जाते हैं। एक साथ बैठी ऑंटियों को गॉसिपिंग का अच्छा टॉपिक मिल जाता है। लोग न तो उस लड़की की मनोदशा समझते हैं, ना घरवालों की मजबूरियां। समझते हैं तो बस ये कि शादी क्यों नहीं कर रहे? 

बड़ा आसान होता है लोगों के लिए कहना कि इस उम्र में कुंवारी है तो कोई कमी होगी। अधिक उम्र की कुंवारी लड़की का चरित्र हनन करने का तो जैसे अधिकार मिल जाता है। बड़ी ही आसानी से लोग बोल देते हैं कि 31की उम्र में भी कुंवारी है तो अब कौन सी सती सावित्री बैठी होगी?  




और अगर लड़की जॉब वाली हो तो लोगों को कहने का मौका मिल जाता है कि घरवाले बेटी की कमाई खा रहे हैं। लड़कियों की उम्र और शादी का ऐसा संयोजन दिमाग में बैठाए हुए है। भारतीय समाज कि अगर लड़की की शादी 18 से 25 के बीच हो गई तो ठीक नहीं तो सब बेकार। लड़की अगर बहुत काबिल है तो भी बोल देते हैं क्या फायदा अगर शादी और बच्चे नहीं हैं, क्या करेगी इतना कमाकर जब अकेले ही रहना है? 

अरे भई!! अगर 18 की उम्र में शादी करके 25 की उम्र में तलाक़ हो जाए तो, या 21 की उम्र में शादी कर के भी सालों तक बच्चे न हों तो ?? ऐसी भी लड़कियां होती हैं जो 20 की उम्र में शादी कर के 22 की उम्र में विधवा हो गई हैं और इस बीच अगर मां बन गईं हैं तो बच्चों का वास्ता देकर पूरी उम्र उसकी दूसरी शादी नहीं की जाती। 

ऐसे भी उदाहरण देखें हैं जब कम उम्र में शादी करने के चक्कर में अनसेटल्ड लड़का जो पढ़ ही रहा है से शादी कर देते हैं, और बाद में कुछ भी सेटल नहीं होता। इस समाज को समझने की और बदलने की बहुत ही ज्यादा जरूरत है। शादी ज़िंदगी का हिस्सा है पूरी ज़िंदगी नहीं है। शादी से भी ज़रूरी काम होते हैं मानव जीवन में और शादी इच्छा के साथ साथ इच्छा अनुसार व्यक्ति के साथ हो तो ही अच्छी होती है। 



मुझे लगता है, सिर्फ समाज की खुशी के लिए यूं ही किसी के साथ बंध जाना शादी का मकसद नहीं होना चाहिए। क्योंकि समाज का क्या है, आएगा ,नाचेगा, खाना खायेगा, दो चार कमियां निकालेगा और चला जायेगा। फिर निभाना लड़का-लडकी को ही है। शादी के बाद होने वाली परेशानियों को कभी सुलझाया है समाज ने? नहीं ना ?

तो मेरे हिसाब से बराबरी की शादी, मनपसंद शादी, इच्छानुसार वर से शादी और वो शादी जिसमें सब खुश हों वही सबसे अच्छी शादी है, नहीं तो सब बर्बादी है, फिर चाहे किसी भी उम्र में हो। बाकी उम्र आपकी फ़ैसला आपका।

अब आप सोच रहे होगे कि अपनी बात कर भाई, लोगों का क्या? लोगों का तो बस काम ही है कहना, तो कुछ तो लोग कहेंगे ही। क्या करोगे सुनकर मुझसे मेरी कहानी, बेलुत्फ जिन्दगी के किस्से हैं फीके फीके साहब…………

Sunday, 9 October 2022

कैमरे मे शहर, नजरों मे जलेबी

मेरे शहर बागेश्वर में प्रमुख चौराहों पर पुलिस द्वारा सीसीटीवी कैमरा लगवाया गया। एक बागेश्वरवासी ने सुबह-सुबह कंट्रोल रूम में फ़ोन किया। पढ़िए उसकी बातचीत का कुछ अंश…….

बागेश्वरवासी: सर गुडमॉर्निंग, क्या आपके सीसीटीवी काम कर रहे हैं?
कंट्रोल रूम: जी सर, बिलकुल।




बागेश्वरवासी: क्या मंगल वाली गली भी नज़र आ रही है ?
कंट्रोल रूम: जी नही सर, उस तरफ नही हैं।

बागेश्वरवासी: अरे, मंगल जलेबी वालों की दुकान तो दिख रही होगी ?
कंट्रोल रूम: नही सर, क्या बात हो गई?

बागेश्वरवासी: पुराने एसबीआई के पास करन स्वीट्स की दुकान तो नज़र आ रही होगी ?
कंट्रोल रूम: जी सर, क्या बात हो गई?

बागेश्वरवासी: अरे, क्या फ़ायदा है फिर ऐसे कैमरे लगाने का हम जैसे आम आदमी को ?
कंट्रोल रूम: सर, क्या बात हो गई? बताइये तो, हम आपकी क्या मदद कर सकते हैं?

बागेश्वरवासी: अरे मालिक, जरा देख के बतावा दो कि गरम जलेबी या पनीर जलेबी रेडी है की नही?




पहाड़ों में लगातार पड़ रही बारिश के चलते आज 10वीं शताब्दी में ईरान में भारत आई 'जुलाबिया या जुलुबिया' जो अब भारत की राष्ट्रीय मिठाई बन बैठी है, बहुत मन है खाने का। पर जाकर लाये कौन? बहुत ही गम्भीर समस्या आन पड़ी है। बिन खाये रहा भी न जाये और इतनी बारिश में जाया भी न जाये।

#व्यंग

Wednesday, 14 September 2022

मेरे प्यारे बागेश्वर,


कैसे हो मेरे भाई! 
पहचाना?





कोई बात नहीं। 
स्मृति गड्डमड्ड होती रहती है। 

तुमसे मिले भी तो बहुत दिन हो गए। शायद आखिरी बार कब जी भर के निहारा था तुम्हें, मुझे ठीक से याद भी नही। पर तब करीब महीना भर साथ रहा था। पहले भी तुमसे बार-बार मिलता रहा हूं। आज भी साथ हूँ पर भागदौड़ की इस भीड़ में लगता है कहीं गुम न हो जाऊँ।

अहा! 

तुम्हारे भट्ट के डुबके, हरी साग और भात की याद आती है, तो मुंह में पानी भर जाता है। ...
वो नदियाँ, वो झरने, वो पहाड़, वो छोटे-बड़े बुग्याल, वो हिमाल जब याद आते हैं तो मन अथाह प्रेम से भर उठता है। …

यह मेरे लिए अजीब है कि तुम्हें अपनी पहचान बतानी पड़ रही है मुझे। मगर मुझे इसका बुरा भी क्यों मानना चाहिए! तुम्हारी गोद में पले सभी को तो हरदम बतानी पड़ती है, बरसों से साबित करनी पड़ती है अपनी पहचान, कि वे बिल्कुल तुम्हारी गोद के हैं। पूरमपूर तुम्हारे हैं। मुझे कभी-कभी लगता है कि मैं तो थोड़ा दूर का हूं। फिर मेरे जैसे तो अनेक हैं, जो तुम्हे चाहते तो बहुत हैं, चाहते हुए भी तुम्हारे पास नहीं आ पाते। 

माफ करना मेरे बागेश्वर! 
मगर तुमने मुझे दूर का होने का, कभी अहसास होने न दिया। न कभी खुद से जुदा ... 

बुरा न मानना मेरे भाई!

खैर, कैसी हैं तुम्हारी वादियां? तुम्हारे गांव-गलियारे! अब तो तुम पियराने लगे होगे। रंग बदलने लगी होगी तुम्हारी हरियाली। अक्तूबर आते-आते तुम्हारे आंगन के 'बैट वृक्ष' छोड़ने लगेंगे पत्ते। कुछ पेड़ निझा जाएंगे। चीड़ की ललियाई पत्तियां टूट कर तैरनी शुरू कर देंगी हवाओं में। 
मैंने तो तुम्हारे दो ही रंग देखे हैं- हरा और पीला। तुम्हारा सफेद रंग देखने की शक्ति मुझमें नहीं, सो कभी तुम्हारे पास उस जगह पर ज़्यादा समय टिका नहीं। ठंड में दांत किटकिटाने लगते हैं मेरे। तो डर लगता है कहीं जम न जाऊँ तुम्हारे उस रूप के दीदार के बाद पहाड़ों की उस चोटी पर। 

खैर, और कहो! 
कैसा है तुम्हारे बागनाथ मन्दिर का वातावरण! बैजनाथ का हाल। वहां की मछलियां कैसी है? भांग के घोटे का प्रसाद अब भी तो बंटता होगा शिवरात्रि पर! 
कैसी है महर्षि मार्कण्डेय की तपस्थली त्रिवेणी के उस संगम पर? दुर्गा पूजा की तैयारियां भी चलने वाली होंगी अब कुछ दिनों में। जैसे कावड़ यात्रियों को बीच रस्ते से लौटा दिया गया था, वैसे ही दुर्गा पूजा और रामलीला भी तो नहीं रोक दी जायेगी। 

शिखर-भनार, कोट माई, सनेती, लीती, भराड़ी, बागेश्वर व बदियाकोट में अब भी लगते होंगे मेले।

पिंडारी के नजारे तो भला क्या बदले होंगे!... 

बस नजरें बदल गई हैं।

इधर महीने भर से तुम्हारे बारे में कुछ ठीक-ठीक खबरें नहीं मिल पा रहीं। परसों कोई बता रहा था कि सिपाही कुछ ज्यादती करते हैं तुम्हारे लोगों पर। मगर यह तुम्हारे लोगों के लिए कोई नई बात तो नहीं। माफ कर देना उनको। बेचारे वे भी तो हमारे बच्चे हैं। खेती-बाड़ी बेच कर अपने मां-बाप की आंखों में तैरते सपनों को जीते हुए किसी और की हुकूमउदूली करते हैं। वे अपने मन की कब कुछ कह या कर पाए हैं। 

फिक्र उन लोगों की हो रही है, जो साल भर से ज्यादा हुआ, अपने घरों में बंद रहे हैं। 

कोरोना काल के चलते पिछले दो सालों से बंद रोज़गार के अब उनके घरों में पता नहीं कितना अनाज बचा होगा। कैसे खाते-पीते होंगे उनके बच्चे।

पता नहीं कितने जा पाते होंगे अपने धान के खेतों में। अपनी बगानो में। यह तो धान की फसल तैयार होने का मौसम है। उनकी रखवाली कौन करता होगा।

जिनका गुजारा सैलानियों के सहारे होता था- वे घोड़े वाले, गाड़ी वाले, होटल वाले, हलवा-पूड़ी, भुट्टे, चाय और पकौड़े बेचने वाले। उनके बच्चे सलामत तो हैं न मेरे भाई! 

पहाड़ों से जो गए थे मैदानों में या मैदानों से जो गए थे पहाड़ों पर, रोजगार की तलाश में। जो सड़कें बनाते थे, होटलों, रेस्तरां, सैलानी झोपड़ियों में बर्तन मांजते, झाड़ू-बुहारी करते खाना पकाते-परोसते थे। किराए के एक कमरे में दस-दस जन ठुंसे रह कर पैसे जमा कर अपने गांव लौट कोई बेहतर ठीया बनाने का सपना देखा करते थे। पता नहीं, अब उनके क्या समाचार हैं। पता नहीं, उनमें से कितने वापस लौट पाए, कितने वहीं रह गये होंगे। 

हो सके, तो अपनी कुछ खोज-खबर देना, मेरे भाई।

अपनी 25 साल की आयु पूर्ण कर 26 वें बसंत की दहलीज़ पर कदम रखा तो तुमने, पर जरा संभलकर चलना मेरे भाई, समय बहुत कठिन है आज….

डबडबातीं अखियों से शुभ प्रभात 🙏🏻
तुम्हारा एक अदना सा दोस्त राजकुमार…..