Monday, 25 December 2023

कल जब मैं बूढ़ा हो जाऊँगा


मुझे आज एक कन्फेशन करना है। मुझे कई बार संगीत बोर कर दे रहा है आजकल। ठीक-ठाक लगने वाला गाना भी मैं 1 मिनट से ज्यादा नहीं सुन सकता। कुछ महीनों पहले तक मुझे लिखते वक्त देर रात संगीत के चलने से दिक्कत नहीं होती थी। लेकिन अब मेरा ध्यान भंग हो जाता है। फिर सोचता हूँ समाज के वर्तमान परिदृश्य को तो मेरी रूह काँपने लगती है। आज अपने समाज के हालात देख सोच रहा हूँ……..


कल जब मैं बूढ़ा हो जाऊँगा, एकदम जर्जर बूढ़ा, तब तू क्या थोड़ा मेरे पास रहेगा? मुझ पर थोड़ा धीरज तो रखेगा न? मान ले, तेरे महँगे काँच का बर्तन मेरे हाथ से अचानक गिर जाए या फिर मैं सब्ज़ी की कटोरी उलट दूँ टेबल पर, मैं तब बहुत अच्छे से नहीं देख सकूँगा न! मुझे तू चिल्लाकर डाँटना मत प्लीज़! बूढ़े लोग सब समय ख़ुद को उपेक्षित महसूस करते रहते हैं, तुझे नहीं पता?

एक दिन मुझे कान से सुनाई देना बंद हो जाएगा, एक बार में मुझे समझ में नहीं आएगा कि तू क्या कह रहा है, लेकिन इसलिए तू मुझे बहरा मत कहना! ज़रूरत पड़े तो कष्ट उठाकर एक बार फिर से वह बात कह देना या फिर लिख ही देना काग़ज़ पर। मुझे माफ़ कर देना, मैं तो कुदरत के नियम से बुढ़ा गया हूँ, मैं क्या करूँ बता?

और जब मेरे घुटने काँपने लगेंगे, दोनों पैर इस शरीर का वज़न उठाने से इनकार कर देंगे, तू थोड़ा-सा धीरज रखकर मुझे उठ खड़ा होने में मदद नहीं करेगा, बोल? जिस तरह तूने मेरे पैरों के पंजों पर खड़ा होकर पहली बार चलना सीखा था, उसी तरह?

कभी-कभी टूटे रेकॉर्ड प्लेयर की तरह मैं बकबक करता रहूँगा, तू थोड़ा कष्ट करके सुनना। मेरी खिल्ली मत उड़ाना प्लीज़। मेरी बकबक से बेचैन मत हो जाना। तुझे याद है, बचपन में तू एक गुब्बारे के लिए मेरे कान के पास कितनी देर तक भुनभुन करता रहता था, जब तक मैं तुझे वह ख़रीद न देता था, याद आ रहा है तुझे?

हो सके तो मेरे शरीर की गंध को भी माफ़ कर देना। मेरी देह में बुढ़ापे की गंध पैदा हो रही है। तब नहाने के लिए मुझसे ज़बर्दस्ती मत करना। मेरा शरीर उस समय बहुत कमज़ोर हो जाएगा, ज़रा-सा पानी लगते ही ठंड लग जाएगी। मुझे देखकर नाक मत सिकोड़ना प्लीज़! तुझे याद है, मैं तेरे पीछे दौड़ता रहता था क्योंकि तू नहाना नहीं चाहता था? तू विश्वास कर, बुड्ढों को ऐसा ही होता है। हो सकता है एक दिन तुझे यह समझ में आए, हो सकता है, एक दिन!

तेरे पास अगर समय रहे, हम लोग साथ में गप्पें लड़ाएँगे, ठीक है? भले ही कुछेक पल के लिए क्यों न हो। मैं तो दिन भर अकेला ही रहता हूँ, अकेले-अकेले मेरा समय नहीं कटता। मुझे पता है, तू अपने कामों में बहुत व्यस्त रहेगा, मेरी बुढ़ा गई बातें तुझे सुनने में अच्छी न भी लगें तो भी थोड़ा मेरे पास रहना। तुझे याद है, मैं कितनी ही बार तेरी छोटे गुड्डे की बातें सुना करता था, सुनता ही जाता था और तू बोलता ही रहता था, बोलता ही रहता था। मैं भी तुझे कितनी ही कहानियाँ सुनाया करता था, तुझे याद है?

एक दिन आएगा जब बिस्तर पर पड़ा रहूँगा, तब तू मेरी थोड़ी देखभाल करेगा? मुझे माफ़ कर देना यदि ग़लती से मैं बिस्तर गीला कर दूँ, अगर चादर गंदी कर दूँ, मेरे अंतिम समय में मुझे छोड़कर दूर मत रहना, प्लीज़!

जब समय हो जाएगा, मेरा हाथ तू अपनी मुट्ठी में भर लेना। मुझे थोड़ी हिम्मत देना ताकि मैं निर्भय होकर मृत्यु का आलिंगन कर सकूँ। चिंता मत करना, जब मुझे मेरे सृष्टा दिखाई दे जाएँगे, उनके कानों में फुसफुसाकर कहूँगा कि वे तेरा कल्याण करें। तुझे हर अमंगल से बचायें। कारण कि तू मुझसे प्यार करता था, मेरे बुढ़ापे के समय तूने मेरी देखभाल की थी।

मैं तुझसे बहुत-बहुत प्यार करता हूँ रे, तू ख़ूब अच्छे-से रहना। इसके अलावा और क्या कह सकता हूँ, क्या दे सकता हूँ भला।

समाज का असल भाव यही है, असली मकसद यही है। मन की इच्छा यही है, दिन-रात की सोच यही है। बाकी भाईचारा, कुल-खानदान, परिवार की एकता, धर्म और मजहब खतरे में है का नारा... सब झूठ, मक्कारी और पाखंड है। 

क्या मैं 'मर्दे-नादाँ' (कृपया इससे जुड़े शेर का संदर्भ लें, जो पोस्ट के नीचे लिखा है) की कतार में तो नहीं आ गया?

“फूल की पत्ती से कट सकता है हीरे का जिगर
मर्दे-नादाँ पर कलामे-नर्म-ओ-नाजुक बेअसर।” 

फोटो- मैं, Kailash Baba, Harish Nagarkoti

Sunday, 26 November 2023

गगनचुंबी छवि की तलाश-


‘चलो कहीं भरपूर विकास दिखाया जाए, सियासी मिट्टी पर सीमेंट उगाया जाए।’ कुछ इसी तरह के उदाहरणों का मिट्टी परीक्षण होता रहा है और वर्तमान सरकार ने भी निरीक्षण-परीक्षण की जिरह पैदा करते हुए, उत्तराखंड में प्रगति का मुआयना शुरू किया है। संस्थानों की डिनोटिफिकेशन के बाद यह तो साबित हो रहा है कि चुनावी जुबान ने सत्तापक्ष की दिलदारी के नक्शे पर ऐसा नुकसान कर दिया जो प्रदेश के बूते से बाहर है।


ऐसे वक़्त में जब उत्तरकाशी स्थित सिल्क्यारा की धसकी हुई सुरंग में 14 दिनों से 41 मजदूर फंसे पड़े हैं, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गगन में लड़ाकू विमान में बैठकर उड़ान भर रहे हैं। पिछले करीब एक हफ्ते से लग रहा था कि अंधेरी सुरंग में मजदूर कभी भी बाहर आ सकते हैं, लेकिन हर गुजरता दिन बेनतीजा साबित हो रहा है। इन सबसे बेपरवाह मोदीजी के उत्साह में कोई कमी नहीं आई है। एक राज्य से निकलकर दूसरे राज्य में चुनावी रैलियों को सम्बोधित करते हुए राजस्थान में गुरुवार की शाम को प्रचार अभियान थमने के तुरन्त बाद मोदी मथुरा पहुंचे जहां उन्होंने ब्रज रज उत्सव के नाम से आयोजित मीरा जन्मोत्सव में हिस्सा लिया। फिर वे शुक्रवार की अल्लसुबह कृष्णजन्मभूमि में उस स्थान पर भगवा वस्त्र धारण कर पहुंचे जहां श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। दूसरी तरफ शनिवार को सुरंग में बचाव अभियान इसलिये रुक गया क्योंकि ड्रिलिंग के दौरान ऑगर मशीन की ब्लेड सरियों से टकराकर टूट गई। अब मलबे को हाथ से हटाये जाने की तैयारी है और मजदूरों को बाहर का सूरज देखने के लिये अभी इंतज़ार करना पड़ सकता है।

मोदीजी के पास एक और डबल इंजिन वाले राज्य उत्तराखंड की सुरंग में फंसी 41 ज़िंदगियों के लिये चिंता करने का समय नहीं है। उन्हें आकाश में उड़ान भरकर पहले अपनी छवि को गगनचुंबी जो बनाना है।


वो 41 मज़दूर, अगर चंद्रयान-3 पर सवार होते तो 22 वें दिन चंद्रमा की कक्षा में पहुंच गये होते। लेकिन पिछले 16 दिनों से, वे ज़मीन के नीचे सुरंग में क़ैद हैं। उन्हें धरती की सतह पर भी वापस नहीं लाया जा सका है।

ये केवल उनके भविष्य की बात नहीं है। कल इन्हीं हिमालयी सुरंगों से होकर, बसों, कारों, रेल वगैरह में सवार, हज़ारों टूरिस्ट, तीर्थ यात्री और यहाँ के आम पहाड़ी लोग यात्राएं करेंगे। यकीन मानिये हम में से किसी के लिए भी, कोई चंद्रयान नहीं आयेगा।


साहब, युवा वोटर मांगे रोज़गार—



किसी भी देश व समाज के संतुलित विकास में उस देश के नियम व कानून बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। भारत में इन कानूनों-नियमों का शासन शास्त्र संविधान कहलाता है। शासन प्रशासन की शक्तियों का स्त्रोत हमारा भारतीय संविधान अपने आप में एक विशेष आयाम रखता है जिस आधार पर ही यह विश्व का सबसे लम्बा व विस्तृत संविधान होने का गौरव प्राप्त है। भारतीय संविधान निर्माण की गाथा ऐतिहासिक रही है।


जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की प्रक्रिया जारी है, वहां युवा नौकरियों और रोजगार का मुद्दा खूब गूंज रहा है। सिर्फ इसी आधार पर राजनीतिक दलों को कितना जनादेश प्राप्त होगा, यह कहना अनिश्चित है, लेकिन दलों के घोषणा-पत्रों में सरकारी नौकरियों को लेकर आश्वासन प्रमुख रूप से बांटे गए हैं। भाजपा या कांग्रेस के अलावा, मिजोरम की क्षेत्रीय पार्टियों को भी वायदा करना पड़ा है कि उनकी सरकार युवाओं के लिए इतनी सरकारी नौकरियां और रोजगार के अवसर पैदा करेगी। रोजगार के क्षेत्र में बड़े घोटाले सामने आ रहे हैं कि किस सरकार के दौरान कितने पेपर लीक कराए गए। अव्वल तो सरकारी नौकरियों में भर्ती की परीक्षाएं लटकाई जाती रही हैं। यदि परीक्षा हो गई, तो उनके नतीजे अनिश्चित अंधेरों में डूब जाते हैं। यदि परीक्षाओं के बाद सफल चेहरों को नियुक्ति-पत्र मिल भी गए, तो ज्वाइनिंग में आनाकानी की जाती रही है। अंतत: अदालतों में धक्के खाने पड़ते हैं और वहां भी सब कुछ अनिश्चित है। इन धांधलियों और घपलों पर युवा मतदाता सरकारी नौकरियों को लेकर पूरी तरह आश्वस्त कैसे हो सकता है? घोषित राजनीतिक आश्वासनों पर जनादेश दिए जाएंगे, सरकारें बनेंगी, उसके बाद नौकरी या रोजगार का वायदा, समयबद्ध और चरणबद्ध तरीके से, पूरा नहीं किया गया, तो युवा वोटर क्या कर सकते हैं? जनादेश तो पांच साल के लिए होता है। पांच साल के बाद राजनीतिक परिदृश्य और समीकरण क्या होंगे, पार्टियां इन चिंताओं में दुबली नहीं हुआ करतीं। अलबत्ता युवाओं के सामने आंदोलन का रास्ता जरूर खुला है।

उनसे पूर्ण न्याय कब मिला है? बहरहाल तेलंगाना में कांग्रेस ने ‘जॉब कलैंडर’ तय करने का वायदा किया है। भाजपा ने तेलंगाना लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं के मद्देनजर पारदर्शी और समयबद्ध समाधान देने का वायदा किया है। दोनों दलों को तेलंगाना में जनादेश मिलने के आसार नहीं हैं। राजस्थान में उन युवाओं को समर्थन दिया जा रहा है, जिन्होंने सरकारी नौकरियों में भर्ती की निरंतर और सिलसिलेवार देरी के खिलाफ आवाज उठाई है। तेलंगाना और राजस्थान में युवा बेरोजगारी दर क्रमश: 15.1 फीसदी और 12.5 फीसदी है, जो देश भर में सर्वाधिक हैं। कमोबेश बेरोजगारी की राष्ट्रीय दर करीब 8 फीसदी से तो ज्यादा है। राजस्थान लोक सेवा आयोग की परीक्षाएं विवादों और घोटालों में संलिप्त रही हैं। लगातार पेपर लीक, परीक्षा परिणामों में धांधलियों, कानूनी पचड़ों के कारण बीते चार साल में 8 परीक्षाएं रद्द करनी पड़ी हैं। मध्यप्रदेश में आज भी ‘व्यापम घोटाले’ की गूंज सुनाई देती है। हालांकि अब यह उतना प्रासंगिक चुनावी मुद्दा भी नहीं है। पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे 2022-23 के मुताबिक, मप्र में युवा बेरोजगारी की दर चुनावी राज्यों में सबसे कम 4.4 फीसदी है। तेलंगाना, राजस्थान और मिजोरम (11.9 फीसदी) में युवा बेरोजगारी की दर राष्ट्रीय दर से अधिक है। छत्तीसगढ़ में यह दर 7.1 फीसदी है। बेशक सरकारी नौकरियों और रोजगार के बेहतर अवसरों के आश्वासन सभी राजनीतिक दलों ने बांटे हैं, लेकिन युवा मतदाताओं की चिंताओं, प्रतिबद्धताओं और उनके सरोकारों पर ‘राजनीति’ ज्यादा की जा रही है। महिलाओं में बेरोजगारी की दर अधिक और गंभीर है। बहरहाल ये आंकड़े और संकेत चिंताजनक हैं।

Tuesday, 21 November 2023

कहां राजा भोज- कहां गंगू तेली —


बहुत दिनों से सोच रहा था आंखिर यह कहावत क्यों बनी होगी? मैंने अक्सर बचपन से लेकर आज तक हजारों बार इस कहावत को सुना था कि "कहां राजा भोज- कहां गंगू तेली" आमतौर पर यह ही पढ़ाया और बताया जाता था कि इस कहावत का अर्थ अमीर और गरीब के बीच तुलना करने के लिए है। पर गाँव से बाहर जाकर पता चला कि कहावत का दूर-दूर तक अमीरी- गरीबी से कोई संबंध नहीं है और ना ही कोई गंगू तेली से संबंध है। आज तक तो सोचता था कि किसी  गंगू नाम के तेली की तुलना राजा भोज से की जा रही है यह तो सिरे ही गलत है। बल्कि गंगू तेली नामक शख्स तो खुद राजा थे। 


जब इस बात का पता चला तो आश्चर्य की सीमा न रही साथ ही यह भी समझ आया यदि घुमक्कड़ी ध्यान से करो तो आपके ज्ञान में सिर्फ वृद्धि ही नहीं होती बल्कि आपको ऐसी बातें पता चलती है जिस तरफ किसी ने ध्यान ही नहीं दिया होता और यह सोचकर हंसी भी आती है। यह कहावत हम सब उनके लिए सबक है जो आज तक इसका इस्तेमाल अमीरी गरीबी की तुलना के लिए करते आए हैं। 

इस कहावत का संबंध मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल और उसके जिला धार से है। भोपाल का पुराना नाम भोजपाल हुआ करता था। भोजपाल नाम धार के राजा भोजपाल से मिला। समय के साथ इस नाम में से "ज" शब्द गायब हो गया और नाम भोपाल बन गया। 

अब बात कहावत की कहते हैं, कलचुरी के राजा गांगेय (अर्थात गंगू) और चालूका के राजा तेलंग (अर्थात तेली) ने एक बार राजा भोज के राज्य पर हमला कर दिया इस लड़ाई में राजा भोज ने इन दोनों राजाओं को हरा दिया उसी के बाद व्यंग्य के तौर पर यह कहावत प्रसिद्ध हुई "कहां राजा भोज-कहां गंगू तेली"।

❣️अनायास ही भूपेन हजारिका का यह गीत मुझे याद आता है--

गली के मोड़ पे.. 
सूना सा कोई दरवाजा
तरसती आंखों से रस्ता किसी का देखेगा। 
निगाह दूर तलक..  
जा के लौट आयेगी
करोगे याद तो हर बात याद आयेगी। 

कुछ क़िस्से, कुछ कहानियाँ ही इतिहास है। जिन्हें हम सब भूलते जा रहे हैं। सब समझाइए, लोगों के मन में छोटे-बड़े शहरों के प्रति मोह जगाइए, प्रेम जगाइए। पढ़ने वाले तो सब जगह पढ़ लेते हैं।

Thursday, 16 November 2023

कृत्रिम मेघा और पत्रकारिता



मेरा इकलौता सुझाव यह है कि, अपने सपने का अनुसरण करें और वहीं करें जो आपको सबसे अच्छा लगता हो। मैंने पत्रकारिता इसलिए चुना, क्योंकि मैं ऐसी जगहों पर होना चाहता था जहां इतिहास गढ़े जाते हों। 


स्वतंत्रता आंदोलन के कालखण्ड में राष्ट्र जागरण में समाचार पत्रों की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही है, इसलिए हमारे देश में पत्रकारिता व्यवसाय नही, अपितु सांस्कृतिक मूल्यों के उन्नयन और सामाजिक न्याय का आश्वासन है। सूचना और संचार की क्रान्ति के इस युग में प्रेस की स्वायत्तता और अभिव्यक्ति सुरक्षित रहे, किन्तु समाज के प्रति मीडिया की संवेदनशीलता और अधिक अपेक्षित है।  

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (कृत्रिम मेघा) आने वाले समय में पत्रकारिता में क्रांतिकारी परिवर्तन लायेगा। आने वाले भविष्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग में मीडिया नए कीर्तिमान स्थापित करेगा। यह ठीक वैसा ही वाक्या है जब देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी ने देश को कंप्यूटर व हर हाथ मोबाईल का सपना दिखाया था। जिसके अपने कुछ फ़ायदे व नुक़सान हैं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी इस क्षेत्र का एक अगला कदम है। 

बदलते समय के साथ तकनीक में बदलाव भी आवश्यक है और बदलते समय के साथ इससे अपनाना भी आवश्यक है। कृत्रिम बुद्धिमता आगामी समय की मांग है जो पत्रकारिता को आगे बड़ाने में सहायक सिद्ध होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आने वाले समय में पत्रकारिता में क्रांतिकारी परिवर्तन लायेगा। बदलते परिवेश में मीडिया की भूमिका में भी बदलाव आया है। एक सशक्त राष्ट्र निर्माण व विकास में मीडिया की अहम भूमिका है तथा लोकतंत्र में मीडिया का प्रमुख स्थान है तथा इसे लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ भी कहा जाता है।


माना जाता है कि मीडिया सरकार व प्रशासन के बीच सेतु के रूप में कार्य करता है तथा सरकार की विकासात्मक नीतियों व कार्यक्रमों को लोगों तक पहुँचाने में मीडिया की अहम भूमिका रहती है। वहीं इन योजनाओं से मिलने वाले लाभों व योजना की सफलता व कमियों के बारे में फीडबैक देने भी में मीडिया की अहम भूमिका है।

आज जहां समाज और व्यवस्था के हर अंग में नैतिक गिरावट आई है, वहां पत्रकारिता की गिरावट के लिए केवल पत्रकारों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। जहां वे पेशेवर मानकों और नैतिकता को बनाए रखने की जिम्मेदारी निभाते हैं, वहीं जनता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। 

एक जीवंत लोकतंत्र और मजबूत मीडिया पारिस्थितिकी तंत्र के लिए पत्रकारों और जनता के बीच साझेदारी की आवश्यकता होती है, जो सटीक, विश्वसनीय और सार्थक जानकारी के प्रवाह को सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम करते हैं। केवल सामूहिक प्रयासों से ही हम चुनौतियों से निपट सकते हैं और एक ऐसे भविष्य का निर्माण कर सकते हैं जहां पत्रकारिता लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और सकारात्मक बदलाव के लिए एक आवश्यक शक्ति के रूप में विकसित हो। 

लोगों के लिए हर जगह जाना असंभव है, इसलिए दुनिया के बारे में उनकी समझ मीडिया पर निर्भर करती है। प्रसारण, टेलीविज़न, प्रिंट मीडिया तथा ऑनलाइन मीडिया सभी की ज़िम्मेदारी है कि वे लोगों को अच्छी तस्वीर प्रदान करें, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें झूठी जानकारी फैलानी चाहिए या जानबूझकर तथ्यों को विकृत करना चाहिए। मीडिया सूचनाओं और विचारों को संप्रेषित करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाता है। लेकिन, व्यावसायीकरण के कारण कई मीडिया अपनी निष्पक्षता खो चुके हैं। विशेष हितों और राजनीतिक स्थितियों के अनुरूप समाचार रिपोर्टों में हेराफेरी और छेड़छाड़ की जाती है। झूठी जानकारियों के फैलने से सामाजिक भ्रम पैदा हुआ और अविश्वास बढ़ा।  
 
भविष्य में समाज चाहे कैसा भी विकसित हो, मीडिया एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। और मीडिया चाहे कोई भी मॉडल विकसित करे, पाठ, ध्वनि और चित्र मीडिया की मुख्य सामग्री होंगे। मीडिया तस्वीर और ध्वनि के माध्यम से लोगों को विभिन्न प्रकार के मनोरंजन और जानकारी प्रदान करता है। लेकिन अगर मीडिया वास्तविक जीवन के प्रतिबिंब को नजरअंदाज करते हुए और केवल झूठी सुंदरता को लोगों तक पहुंचाते हुए, आँख बंद करके उच्च रेटिंग और व्यावसायिक हितों का पीछा करता है, तो इससे लोगों को वास्तविक जीवन में और अधिक निराशा महसूस होगी। इस संबंध में न केवल मीडिया, बल्कि मुझे डर है कि फिल्में भी वही भूमिका निभाती हैं। वास्तव में, फिल्में सबसे शक्तिशाली प्रचार सामग्री हैं। सभी देशों की फिल्में अपनी कलात्मक सामग्री के माध्यम से लोगों तक विचार पहुंचाती हैं।
  
मीडिया की झूठ जानकारियों से लोग जीवन में सच्चाई का सामना करने में असमर्थ हैं, जिससे लोगों के बीच अलगाव को भी बढ़ावा मिलता है। उदाहरण के लिए, इंटरनेट पर लोग अपने सच्चे विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने के लिए अधिकतर छद्म शब्दों का प्रयोग करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोग गुमनाम ऑनलाइन वातावरण में अपनी राय अधिक खुलकर व्यक्त कर सकते हैं। लेकिन, यह गुमनामी अपने साथ झूठी, अपमानजनक और गैरजिम्मेदाराना बयानबाजी भी लाती है। आज इंटरनेट अफवाहों और दुर्भावनापूर्ण टिप्पणियों से भरा है, क्योंकि नेटिजनों को अपनी वास्तविक पहचान की ज़िम्मेदारी नहीं उठानी पड़ती है। संक्षेप में, मीडिया में फेक जानकारियों का प्रसार आधुनिक समाज में मूल्यों के असंतुलन को दर्शाता है। केवल इमानदारी संचार और पारस्परिक समझ के माध्यम से ही दुनिया को बढ़ावा मिलेगा।

लोकतंत्र के सजग प्रहरी के रूप में जन-जन की आवाज़ बनकर राष्ट्र एवं समाज को सही दिशा देने वाले सभी पत्रकार बंधुओं को राष्ट्रीय प्रेस दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ। आपकी सजग, स्वतंत्र और साहसिक पत्रकारिता राष्ट्रनिर्माण के यज्ञ में आवश्यक आहुति है।

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Friday, 27 October 2023

हां तुम बिलकुल —


अधिकांश सुन्दरी-सेवियों के जीवन में एक ऐसा समय आता है जब सुंदरियाँ उनके पास श्रद्धा-पूर्ण पत्र भेजने लगते हैं। कोई उनकी शारीरिक प्रशंसा करता है कोई उनके सद्विचारों पर मुग्ध हो जाता है। मुझ जैसे अदने से लेखक को भी कुछ दिनों पूर्व यह सौभाग्य प्राप्त है। ऐसे पत्रों को पढ़ कर हृदय कितना गद्गद हो जाता है इसे किसी मुझ जैसे भोले लड़के ही से पूछना चाहिए। अपने फटे कंबल पर बैठा हुआ वह कैसे गर्व और आत्मगौरव की लहरों में डूब जाता है। भूल जाता है कि रात को गीली लकड़ी से भोजन पकाने के कारण सिर में कितना दर्द हो रहा था खटमलों और मच्छरों ने रात भर कैसे नींद हराम कर दी थी। मैं भी कुछ हूँ यह अहंकार उसे एक क्षण के लिए उन्मत्त बना देता है। पिछले साल सावन के महीने में मुझे एक ऐसा ही पत्र मिला। उसमें मेरी मनगणत प्रसंग की दिल खोल कर दाद दी गयी थी।

पत्र-प्रेषक स्वयं एक अच्छे कवि हैं। मैं उनकी कविताएँ पत्रिकाओं में अक्सर देखा करता हूँ। कवि महोदय का पत्र, पत्र कम किसी उपहार से कहीं अधिक मर्मस्पर्शी था। प्यारे भैया ! कह कर मुझे सम्बोधित किया गया था मेरी रचनाओं की सूची और प्रकाशकों के नाम-ठिकाने पूछे गये थे। अंत में यह शुभ समाचार है कि मेरी पत्नी जी को आपके ऊपर बड़ी श्रद्धा है। वह बड़े प्रेम से आपकी रचनाओं को पढ़ती हैं। वही पूछ रही हैं कि आपका विवाह कहाँ हुआ है। आपकी संतानें कितनी हैं तथा उनकी कोई फोटो भी है हो तो कृपया भेज दीजिए। मेरी जन्म-भूमि और वंशावली का पता भी पूछा गया था। इस पत्र विशेषतः उसके अंतिम समाचार ने मुझे पुलकित कर दिया।


यह पहला ही अवसर था कि मुझे किसी महिला के मुख से चाहे वह प्रतिनिधि द्वारा ही क्यों न हो अपनी प्रशंसा सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। गरूर का नशा छा गया। धन्य है भगवान् ! अब रमणियाँ भी मेरे कृत्य की सराहना करने लगीं ! मैंने तुरंत उत्तर लिखा। जितने कर्णप्रिय शब्द मेरी स्मृति के कोष में थे सब खर्च कर दिये। मैत्री और बंधुत्व से सारा पत्र भरा हुआ था। अपनी वंशावली का वर्णन किया। कदाचित् मेरे पूर्वजों का ऐसा कीर्ति-गान किसी भाट ने भी न किया होगा। स्पष्ट से अपनी बड़ाई करना उच्छृंखलता है मगर सांकेतिक शब्दों से आप इसी काम को बड़ी आसानी से पूरा कर सकते हैं। खैर मेरा पत्र समाप्त हो गया और तत्क्षण लेटर बॉक्स के पेट में पहुँच गया। इसके बाद से आज तक कोई पत्र न आया।

अपने विवरण के पूर्ण होने के पश्चात् मुझे अनायास ही याद आया “चांद सी महबूबा हो मेरी” गाने में हीरो अपनी हिरोइन के मोटापे से दुखी है। वह उस पर उसका मज़ाक़ भी बनाता है और डर के मारे खुद के मन को भी समझाता नजर आता है। वही अधिकतर हमारे समाज की भी समस्या आन पड़ी है। तभी तो आज प्रातः भ्रमण पर सड़क का नजारा आप देख सकते हैं। इतनी सुबह-सुबह आंखिर किसको क्या चाहिए। इसी उधेड़बुन में हम लगातार भीड़ का हिस्सा बने हुए हैं। उसने हरगिज़ नही सोचा था कि महबूबा एक ही बच्चे के बाद चांद जैसी गोल मटोल हो जायेगी। अगली लाइन में पिटने से बचने के लिए बेचारा मजबूरी में बोला "हां तुम बिलकुल वैसी हो जैसा मैंने सोचा था"। यही हाल मेरे कुछ साथियों का भी है, यदि किसी के दिल पर लगे तो क्षमाप्रार्थी हूँ। वैसे मेरी नजर से तुम देखो तो फिर एक मस्त फ़साना याद आयेगा, ऐसे न देख मुझे नजर लग जायेगी, चोट जाने कहां-किधर लग जायेगी”। चल हट झूठे, बुरी नजर वाले तेरा मुँह काला। 

खैर अब तो अपनी महबूबा की तुलना भी कोई चाँद से करने में इतना कतरायेगा, जैसे विक्रम वेताल ने कोई डरावनी कहानी से रूबरू कराया हो। इस पर बहादुर शाह ज़फ़र ने क्या खूब फ़रमाया है,—
तुम ने किया न याद कभी भूल कर हमें,
हम ने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया। 

व्यक्ति में इतनी ताकत हमेशा होनी चाहिए कि अपने दुख अपने संघर्षों से अकेले जूझ सके। जिस दिन ये समझ आ गया तो उस दिन लगने लगेगा बस जीवन इसी का एक पहलू है। 

“सिंह सुवन, सत्पुरुष वचन, कदली फलै इक बार,
तिरिया तेल हमीर हठ, चढ़ै न दूजी बार.“

यानीं सिंहनी एक बार में एक ही शावक को जन्म देती है सज्जन लोग बात को एक बार ही कहता है, केला एक बार ही फलता हैं। स्त्री को एक बार ही तेल उबटन लगाया जाता हैं ऐसा ही राव हम्मीर का हठ हैं यानि हम्मीर देव चौहान ने एक बार जो ठान लिया, फिर वो अपनी भी नहीं सुनते थे, इस कारण इन्हें हठीला हम्मीर भी कहा जाता हैं। 

    

Saturday, 21 October 2023

मानसिकता की सारी गड़बड़ —



मुझे लगता है हर किसी मन में कुछ पाने की दौड़ हमेशा नचाती है। अक्सर ऐसे में वह छूट जाता है जो सामने है, जो वर्तमान क्षण है। आप जो भी पाने के लिए दौड़ेंगे, वही नहीं मिलेगा। 

अहिंसक होना चाहेंगे, हो नहीं पाएँगे। शांत होना चाहेंगे, शांत नहीं हो पाएँगे। संसार से भागना चाहेंगे, भाग नहीं पाएँगे। जो भी होना होता है। वह कभी भी आपकी चाह से नहीं होता। चाह से चीजें दूर हटती जाती हैं। चाह दरअसल बाधा है। आप जो हो बस उसी के साथ राजी हो जाएँ। यही सुखी जीवन का मूल मंत्र है। तो पूरे होश के साथ आप अपनी सजगता बनाए रखें। प्रकृति स्वयं सब सिद्ध करेगी।


कभी सोचा है आपने, यह भ्रम किसने फैलाया कि स्त्री पर हाथ नहीं उठाया जाना चाहिए? तो चलिए आज कुछ इतिहास के तथ्यों के माध्यम से समझते हैं आंखिर हम किस हद तक सही हैं? हमारा पहाड़ किस दिशा की तरफ बड़ रहा है? विचार करियेगा...

हनुमान जी ने भी दो गदा खींच के मारा था लंकिनी को, भरत जी ने अपनी माँ कैकेई को भला बुरा सुनाया था, ज़रूरत पड़ने पर लक्ष्मण जी ने सूर्पनखा का नाक काट दिया, भगवान श्री कृष्ण ने भी पूतना का वध किया था!

जब रानी चेनम्मा और रानी लक्ष्मीबाई युद्ध के मैदान में गयी तो क्या स्त्री समझ कर उन पर वार नहीं किया गया होगा? युद्ध का मैदान स्त्री पुरुष का भेद क्या जाने?

कन्या है तो हाथ मत उठाओ, आखिर क्यों भाई? गलती करेगी तो मार भी पड़ेगी जैसे बेटे को पड़ती है, सब सुविधा दो लेकिन हाथ मत उठाओ?

इसी मानसिकता ने सारी गड़बड़ की है, दो थप्पड़ बचपन में लगाओ और फिर बताओ की तुम कहीं की परी नहीं हो, गलती करोगी तो कुटाई भी होगी, तब जाकर वह एक दम सही रास्ते पे चलेगी

सारा काम मेरी गुडिया, मेरी रानी, मेरी परी करने वालों ने बिगाड़ा है, लेकिन जब उनकी बेटी लव जिहाद का शिकार हो जाती है तब उनके पास छाती पीटने के अलावा कोई उपाय नहीं बचता, एक घटना देखने को मिला है जिसमें अपनी बेटी को तो सुधार नहीं पाए लेकिन श्राद्ध जरूर किए थे तो आखिर ऐसा नौबत क्यों आया?

लड़का और लड़की दोनों को हमारा धर्म और कानून समानता का अधिकार देता है लेकिन अक्सर यह देखने को मिलता है गलती चाहे लड़की करे फिर भी ज्यादातर दोष लड़कों के ऊपर डाल दिया जाता है। 

आजकल अक्सर आपको बड़े शहरों में देखने को मिलेगा की बहुत सी लड़कियां नशा करती है, गलत रास्ते पर चलती है और इसका असर धीरे-धीरे छोटे-छोटे शहरों के साथ गांव में भी आने लगा है। इस पर हमारे देश की सिनेमा का बहुत बड़ा हाथ है। सास भी कभी बहूँ थी दिखाकर संयुक्त परिवारों का बंटाधार किया है। कौन और क्यूँ कोई सुध लेगा। जिसका सम्राट ही घर-परिवार त्याग आधुनिक महात्मा बन बैठा हो। 

आज फिर जुकरू से अकाउंट प्रतिबन्धित करवाने की तमन्ना है……..