Saturday, 28 November 2020

ज़िंदगी ऐसी ही बेसबब है!



अक्सर लोगों को कहते सुना है ज़िन्दगी इम्तिहान लेती है, हर पल, हर मोड़ पर, फिर कौन जाने ये दिन भी एक परीक्षा हों, कि देखें कौन पहले टूटता है। किसके अंदर की सजावट और तरतीब पहले तितर-बितर होती है। किसका ज़ेहन पहले कुंद होता है। क्या पता कि ये एक आज़माइश हो!

तब ईश्वर ने जिनको दुलार से पाला, जिनके मन का ही हरदम हुआ, वो इससे फ़ौरन हताश होंगे। हारकर पूछ बैठेंगे कि यह सब क्यूँ हो रहा है, जैसे कि ज़िंदगी एक आरामगाह थी, जिसमें मेज़ पर हमेशा उनकी पसंद के फूलों ने रहना था! 



पर ईश्वर के सौतेले इसमें देर तक टिकेंगे, शायद वो आख़िर तलक अडोल रहें!

वो जिनको बुरी ख़बरों ने पोसा, अकेलेपन ने अंगुली पकड़ चलना सिखाया, जिनकी बुद्धि ने उनमें निस्संगता भर दी। पतंग के काग़ज़ जैसे पारदर्शी जिनके लिए जीवन के सारे प्रतिमान हो गए। किंतु वो ऐसे नाशुक्रे हैं कि इस बढ़त पर छाती न फुलाएंगे, जीत का कोई दावा पेश ना करेंगे। 

जब सब पहले जैसा हो जाएगा और लोग अपनी पुरानी आदतों में लौट जाएंगे तो ज़रूर वो मन ही मन सोचेंगे कि ये फिर वही भूल दोहराते हैं, इन्होंने अभी सबक़ सीखा नहीं! कि यहाँ कोई संगी नहीं है, सब अकेले हैं। ये जलसा झूठ है, भरम है। इन बेपता दिनों ने जिस सच को उघाड़ दिया था, उसको अब गांठ बांधकर रखना। इस खोखलेपन को भूलना नहीं, ये ज़िंदगी ऐसी ही बेसबब है!

पर आदत के बतौर वो तब भी चुप रहेंगे, यह बात भी किसी से बांटेंगे नहीं! बस दौरे-जहाँ की फ़ितरत को देख मुँह ही मुँह मुस्काएंगे! खैर जैसी भी हो ज़िन्दगी उसे खुल के आज़ाद तरीक़े से बिन्दास जीयो, यही हाल-ए-ख़ुशी का नायाब तरीका है।

Wednesday, 18 November 2020

एक रोज मेरी मनोस्थिति -



फूल बेचने वाले लड़के को भला क्या मालूम था। उसने भूल से कह दिया- एक गुलाब ले लीजिए, भगवान आपकी जोड़ी सलामत रखेगा। वो लड़की सच में ही मेरे इतने क़रीब खड़ी थी कि किसी को भी वहम हो जाए, साथ में है।


असमंजस की स्थिति बन गई। मैं मुस्करा दिया। वो भी शायद झेंपकर मुस्कराई होगी। मैंने देखा तो नहीं, पर उसकी परछाई देखकर कल्पना बांधी। अपराह्न के चार बजे होंगे और धरती पर हम दोनों की लम्बी-सी परछाई गिर रही थी। परछाई में सच में ही जुड़े कंधों वाली इतनी क़ुरबत मालूम होती, जैसे हाथ थामे खड़े हों। मुझे लगा मैं अपनी परछाई से दोयम हो गया हूं। उससे हार गया हूं। मेरा हाड़-मांस का होना अकारथ था। मुझे एक बेआवाज़ अंधेरे के वृत्त में धरती पर गिर पड़ना था, एक युगल आकृति में- जैसे चित्रकार बनाते हैं तिमिरचित्र।

मैंने फूल ले लिया। मुझे उसकी कोई ज़रूरत नहीं थी, फिर भी रख लिया। किताब में सहेज लिया। फूल बेचने वाले को कहने का मन हुआ कि दोस्त, तुम्हें तो तुम्हारे फूल के दाम मिल गए, लेकिन तुम्हारी दुआ बेकार जाएगी। ना कोई जोड़ी है, ना किसी को सलामत रहना है। ये तो बस यों ही अफ़रातफ़री में जुड़ गया एक साथ है। यहां इतनी भीड़ है कि भ्रम होता है, अलग-अलग नहीं हैं।

वो दिल्ली थी। मैं वैशाली मेट्रो स्टेशन पर था। फूल को किताब में रखकर आगे बढ़ चला। वो भी साथ ही चली। हमने साथ में ही क़तार में लगकर टोकन लिया। साथ ही प्लेटफ़ॉर्म पर पहुंचे। साथ ही मेट्रो का इंतज़ार किया। साथ ही गाड़ी में घुसे। साथ-साथ बैठे।

मैंने मन ही मन सोचा- उम्रभर का नहीं, चंद मिनटों का तो साथ रहेगा। बीस रुपए का गुलाब था। अपने हिस्से की दुआ पूरी करके ही मुरझाना चाहता था। उस फूल की ये ख़ुदमुख़्तारी मुझे रुच गई, यों तो दुनिया में कुछ चीज़ें पूरे जीवन की पूंजी लगाकर ना मिलें, इतनी अमोल होती हैं।

मेट्रो चलती रही। एक-एक कर स्टेशन आते रहे। मुसाफ़िर उतरते-चढ़ते रहे। मैं हर स्टेशन पर सोचता, शायद यहीं तक का साथ हो, किंतु दरवाज़ा खुलकर बंद हो जाता और वो अपनी जगह पर बनी रहती। मैं ख़ुद को चंद और मिनटों की क़ुरबत की मुबारक़बाद देता। कौशाम्बी आया और गया। आनंद विहार आकर निकल गया। यमुना बैंक पर तो लगा, अब वो उतर जाएगी, लेकिन पर्स टटोलकर ही स्थिर हो गई। प्रगति मैदान पर भी नहीं उतरी।

मैंने कनखियों से देखा, उसके कान में मिट्‌ठू के पिंजरे के जैसा एक नन्हा-सा झुमका था, जो पूरे समय झूल रहा था, जैसे नीमबेहोशी में कोई हिंडोला लहराता हो। बालों की एक लट चेहरे पर चली आई थी। गाल पर बरसों पुरानी एक खरोंच का निशान था। बड़ी तीखी नाक। उसका फ़ोन बजा। मुस्कराकर वो बात करती रही। मैंने अब देखा, उसके एक क्रुकेड टुथ था। ऊपर की दंतपंक्ति में एक दांत अपनी जगह पर हलका-सा तिर्यक।

वो कौन थी, क्या पता। कहां से आई, कहां को उसे जाना था। ना जान, ना पहचान। लेकिन एक लापरवाह भूल से कही गई वो बात थी- भगवान आपकी जोड़ी सलामत रखेगा। वो बात भले झूठी हो, लेकिन सुंदर थी। उसकी कल्पना में रस था। मेरा-उसका उस एक झूठे आरोप का नाता बन गया था, जैसे कहने भर से ही कुछ जुड़ गया। जैसे कि कुछ भी कहना इस संसार में हवा का एक बगूला भर ना हो, कहने से उसका एक ठोस आकार बन जाता हो, नियति बंध जाती हो। गुलाब की कली बेचने के मक़सद से बोला गया वो एक ब्यौपारी झूठ ही तो था। किसी को अनजाने में भी ऐसी बातें नहीं कहना चाहिए, जो हमें वैसी माया में बिसरा दें।

मंडीहाउस स्टेशन आया। अब तो मुझे ही उतरना था। मैं ग्रीनपार्क जा रहा था, मंडीहाउस पर मेट्रो की लाइन बदलना होती थी। संयोग कि वह भी यहीं उतरी। किंतु उसे और आगे नहीं जाना था। उसकी मंज़िल मंडीहाउस ही थी। इतना भर ही संग-साथ था। कौन जाने, एनएसडी की स्टूडेंट हो। क्या पता, त्रिवेणी कैफ़े पर किसी के साथ चाय पीने का वादा हो। या शायद सांझढले घर ही जा रही हो। मंडीहाउस के बाहर ऑटो-रिक्शा वालों के इसरार की ज़िद में उसे खो जाना हो, दिल्ली की गलियों में कहीं गुम जाना हो। ऐसे विलीन हो जाना हो, जैसे भोर का सपना। फिर खोजे से ना मिलना हो।

मैं उसे दूर तक देखता रहा, जब तक कि आंख से ओझल ना हो गई। मैं उम्मीद कर रहा था कि वो शायद एक बार मुड़कर देखेगी, किंतु सच तो यही है कि लड़कियां अगर ऐसे वाक़यों पर पलटकर देखने लगें तो जीवन दु:ख से भर जाए उनका। मन का तो काम ही है तृष्णा करना और दु:ख देना। लेकिन जीवन को तो बांधकर चलना होता है।

उसकी पीठ सुदूर जाकर धुंधला गई। मैंने उससे मन ही मन कहा, ये आख़िरी है, ज़िंदगी में अब मिलना ना होगा। तुम्हें विदा। दुनिया बहुत बड़ी है, इसलिए नहीं कि यहां ख़ूब सारे नदी-पहाड़ हैं, बल्कि इसलिए कि उसमें दो के बीच अंतरिक्ष जितनी असम्भव दूरियां होती हैं। मैंने किताब खोली और फूल को देखा। ये तुम्हारा घर है- मैंने उससे कहा- पूरा जीवन अब तुम्हें इस किताब के भीतर रहना है।

सहसा मुझे ममता कालिया की कहानी दूसरा देवदास की याद हो आई। उसमें भी ऐसा ही होता है। हर की पौड़ी पर एक तरुण एक पुजारी से कलावा बंधवा रहा होता है कि एक लड़की पास आकर खड़ी हो जाती है। पुजारी उससे संकल्प पढ़वाने को कहता है। लड़की कहती है- नहीं, हम कल आरती की बेला आएंगे। हम शब्द सुनकर पुजारी को भ्रम होता है कि वो लड़के के साथ है। सुखी रहो, फूलो-फलो का आशीष दे बैठता है। लड़का लड़की झेंप जाते हैं। उनके असमंजस की इस वर्णमाला को मैं कहानी पढ़ते समय निजी अनुभव से तुरंत पहचान गया था।

कहानी में फिर ऐसा होता है कि बाद उसके लड़के को कुछ और होश नहीं रहता। वो उस फूलो-फलो के आशीष से तादात्म्य बना लेता है। अगले दिन फिर उसी लड़की की टोह में उसे ढूंढता फिरता है, जिसने कल आरती की बेला आने का वचन दिया था। वो उसे फिर मनसा देवी की झूलागाड़ी में मिल ही जाती है।

वो कहानी पढ़ते समय मैं अपने को त्रासदी के लिए तैयार कर रहा था। मैं जानता था कि कहानी के अंत में लड़की उस लड़के से हमेशा के लिए खो जाएगी। ऐसा ही तो कहानियों में होता है। किंतु उस कहानी में ऐसा हुआ नहीं। दोनों आख़िर मिल ही गए। लेखिका ने उसको दूसरा देवदास इसलिए नहीं कहा था, क्योंकि वो दुर्भागा था। बल्कि इसलिए कहा था कि लड़की का नाम पारो था।

मुझे निराशा हुई। मुझे लगा, जैसे लेखिका की कहानी का नायक मेरी कहानी के नायक से जीत गया था। उसने दूसरी बार उस लड़की को खोज लिया था। मैंने इस शिक़ायत को चुपचाप अपने मन में रख लिया। कहानी के नायक का नाम सम्भव था। मेरी कहानी की तरह सबकुछ उसके लिए इतना असम्भव नहीं था।

Sunday, 8 November 2020

कुछ चिट्ठीयाँ लिखनी है तुम्हें...

नमस्कार 🙏🏻

अगर आप साथ हैं तो चलो कुछ नया सा करते हैं मगर पुरानी चीजों को साथ लेकर। मुझे कुछ चिट्ठियाँ लिखनी हैं तुम्हें! तुम्हारे उस पते पर जहाँ तुम अभी तक शिफ़्ट ही नही हुए! वो सब बातें लिखनी हैं जो होती हैं तुम्हारे बग़ैर तुम्हारे बारे में! तुमसे जुड़ी हुई।

चिट्ठियाँ जिसमें तुम होगे, तुम्हारा अक़्स होगा और होंगे सारे लम्हे। चिट्ठियों में जान होती है। वो जो काग़ज़ होता है न, स्पर्श सा होता है और वो स्याही! तुम्हारी महक हो जैसे। तुम्हारे उलझे हुए बालों सी मेरी गंदी सी राईटिंग(जिसके कारण आजतक सेकेंड डिविज़न ही पास हुआ हूँ!) मैं लिखे अल्फ़ाज़ जिसमें होंगी भावनाएँ। पूर्ण विराम होगा तुम्हारा गले लग जाना और कॉमा होगा तुम्हारे माथे को चूम लेना। तो जितनी बार पूर्ण विराम और कॉमा आए तो तुम में उपस्थिति महसूस कर लेना! 


तुमको चिट्ठियाँ इस लिए भी भेजनी है क्यूँकि मेरे पास तुम्हारे लिए कभी कोई कारण नही होता है। जैसे साँसे लेना अनवरत या पलकों का झपकना बेवजह। वैसे ही तुम्हारी याद आना और और तुम्हारी कही गयी बातों को ज़हन में लेके मुसकाने पे मेरा कोई ज़ोर नही है। 

हालाँकि तुमसे कोई उम्मीद नही है अब मुझको क्यूँकि उस उम्मीद के फ़ेज़ से बहुत आगे निकल आया हूँ मैं। मालूम है तुमसे उम्मीद करना वैसा ही है जैसा चाँद को पतंग के माँझे से पकड़ के खींच लेना। ख़ैर...

सुनो, बहुत सी चिट्ठियाँ लिखनी है। क्यूँकि तुमको बताना है वो सब जो कभी हुआ ही नही और जो सोचा था कि कभी होगा। आइये एक नये दौर में आज स्थापना दिवस के मौक़े पर उन सभी शहीदों को नमन करते हुए आन्दोलनकारियों को प्रणाम कर मेरे उत्तराखंड के दर्द को अपने शब्दों के माध्यम से चिट्ठी के रूप में आप भेजिए जरुर सांझा करेंगे, आपका दर्द, आपकी सोच, आपके विचार। चिट्ठियाँ सच्ची होती हैं। तुम्हारी मुर्दी आँखो जितनी सच्ची। जिसमें मुझे सारा जहाँ दिखता है अब। सिवाए अपने चेहरे के........



उत्तराखंड राज्य स्थापना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ
कुछ चिट्ठीयाँ लिखनी है तुम्हें...
#बेरोज़गार_उत्तराखंडी®️✍🏻

Sunday, 4 October 2020

बस और नही, अब रण होगा !!

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धृतराष्ट्र नहीं, 
अब हम सबको भीमसेन बनना होगा,
हर इक दुर्योधन की जंघा पर भीषण प्रहार करना होगा। 

इतिहास तुम्हें न क्षमा करेगा,
जो तुम सभा में मौन रहे,
हर द्रौपदी की लाज की, रक्षा का ज़िम्मा अब लेना होगा।


हर आंख जिसमें हो हवस भरी, 
वह न फिर कुछ देख सके,
बन के वीर अर्जुन अब तुमको गांडीव भी धरना होगा।

घात लगा कर, हर मोड़ पे, इंतज़ार में कौरव दल...
न परवाह कर, अभिमन्यु बनहर चक्रव्यूह तोड़ना होगा।

कब तक समाज की बहू बेटियां डर-डर कर हर सांस भरें,
खुद को ही अवतरित करके, चिर अभयदान देना होगा।

कलयुग के इस कुरुक्षेत्र में हो तुम किसके साथ खड़े,
अन्याय सहो या बदला लो, यह निर्णय अब करना होगा। 

न गीता का उपदेश, न ही खुद भगवान तेरा रथ खीचेंगे,
इस युग में अपने रक्त से ही नव महाग्रंथ रचना होगा।

#HathrasHorrorShocksIndia

Saturday, 3 October 2020

नारी अत्याचार को चरित्रार्थ करती…. पुष्यमित्र उपाध्याय की कविता


नारी अत्याचार को चरित्रार्थ करती….
            पुष्यमित्र उपाध्याय की कविता

सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयंगे |

छोडो मेहँदी खडक संभालो
खुद ही अपना चीर बचा लो
द्यूत बिछाये बैठे शकुनि,
मस्तक सब बिक जायेंगे
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयेंगे|

कब तक आस लगाओगी तुम,
बिक़े हुए अखबारों से,
कैसी रक्षा मांग रही हो
दुशासन दरबारों से|

स्वयं जो लज्जा हीन पड़े हैं
वे क्या लाज बचायेंगे
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो अब गोविंद ना आयंगे|

कल तक केवल अँधा राजा,
अब गूंगा बहरा भी है
होठ सी दिए हैं जनता के,
कानों पर पहरा भी है|

तुम ही कहो ये अश्रु तुम्हारे,
किसको क्या समझायेंगे?
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयंगे|

                       -पुष्यमित्र उपाध्याय

Sunday, 27 September 2020

(दास्तान-ए-कोरोना - VI) पुरानी काट की क़िलेबंदी का नया अनुभव दे रहा कोरोना



''हरेक चीज़ है अपनी जगह ठिकाने पे, 
कई दिनों से शिक़ायत नहीं ज़माने से!' 
दु:ख वैसा ही गर्वीला होता है, वह वैसे ही अपने लिए हाशिये बांधता है, कहता है पहले तुम चंगे हो जाओ, तब मैं अडोल मन से अपना दु:ख मनाऊं। 



कोरोना चूंकि नया वायरस है, इसलिए इसका सामना करने के मनुष्य के अभी तक के तमाम तरीक़े रक्षात्मक रहे हैं। उसके पास केवल प्लान-ए है और वह डिफ़ेंसिव प्लान है। प्लान-बी है ही नहीं। उसकी खोज की जा रही है। किंतु अभी के लिए मनुष्य ने एक साधारण-से तर्क का इस्तेमाल किया है, और वो यह है कि जब तक हममें इस विषाणु का संक्रमण नहीं होगा, हम सुरक्षित रहेंगे।
शुरू में उन्होंने कहा, हाथ धोइये और चेहरे को नहीं छुइये। एक-दूसरे से दूरी बनाकर रखिये। फिर जब मालूम हुआ कि इससे काम नहीं चलेगा तो तालाबंदी की नीति अपनाई गई। ना हम बाहर निकलेंगे, ना यह विषाणु हमें ग्रसेगा। 
एक लतीफ़ा चला कि कोरोना बहुत घमंडी है। वह अपने से आपके घर नहीं आएगा। आप स्वयं जाकर भेंट करेंगे तभी वह हाथ मिलाने बढ़ेगा। जब प्लान-बी न हो तो गरदन नीची करके प्लान-ए पर राज़ी होना पड़ता है। जब आक्रमण की गुंजाइश न हो तो क़िलेबंदी से काम चलाना पड़ता है। पुराने वक़्तों में लम्बे-लम्बे लॉकडाउन होते थे। दुश्मन की फ़ौजें बाहर सीमा पर डेरा डाले होती थीं और नगरवासी क़िले के परकोटे में समा जाते थे। महीनों तक यह स्थिति बनी रहती थी। पहले किसकी रसद चुकती है, पहले किसका धैर्य जवाब देता है, इसी पर सब कुछ निर्भर करता था। यह कहना बिलकुल भी अनुचित नही होगा, आधुनिक मनुष्य के लिए यह लॉकडाउन पुरानी काट की क़िलेबंदी का नया अनुभव था। 


किंतु रक्षात्मक होने पर इतना ज़ोर है कि परिप्रेक्ष्य हमारे सामने धुंधला गए हैं। हम कह रहे हैं, हम इनफ़ेक्टेड ही नहीं होंगे तो कुछ नहीं होगा। इसमें हम यह पूछना भूल रहे हैं कि अगर हम इनफ़ेक्टेड हो गए, तब भी क्या होगा? एक वर्ल्डोमीटर्स डॉट इनफ़ो करके वेबसाइट है, जो कोरोना वायरस के रीयल टाइम अपडेट्स देती है। कोरोना के आंकड़ों का वर्गीकरण दो तरह से किया जाता है- क्लोज़्ड केसेस और एक्टिव केसेस। क्लोज़्ड केसेस यानी मृतकों और रिकवर्ड लोगों के आंकड़े।

इसके क्या कारण हो सकते हैं? खुली दुनिया से सम्पर्क, जो विकसित देशों में ज़्यादा रहता है? या वहां की जीवनशैली सम्बंधी चुनौतियां? प्रदूषण, धूम्रपान, मधुमेह, मोटापा- जो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को दुर्बल बनाकर हमें विषाणु के समक्ष निष्कवच कर देते हैं। तो क्या कोरोना वायरस पश्चिमी जीवनशैली में निहित बुराइयों पर एक निर्णायक टिप्पणी है? क्या यह जंक-फ़ूड, शुगर ड्रिंक्स, फ़ैक्टरी फ़ॉर्मिंग, मीट इंडस्ट्री के अंत की घोषणा कर रहा है? क्या इससे सभ्यतागत परिवर्तन होंगे? क्या अब इसके बाद सादा जीवनशैली, शाकाहार, शारीरिक श्रम-प्रधान दैनन्दिनी, प्राकृतिक उपचार, योग-व्यायाम-उपवास आदि का महत्व बढ़ने जा रहा है? 

बागेश्वर जिला प्रशासन, शासन स्तर या सामाजिक स्तर पर अभी क्या बदलाव किए जाने चाहिए इस सम्बंध में आप लोगों ने अपने सुझाव मुझे प्रेषित करे, जो बेहद रोचक रहा। आंखिर कोरोना पॉजिटिव व्यक्ति व उसके परिवार की हिम्मत की कैसे बढ़ाया जा सके। साथ ही किसी को टूटने से या किसी का घर,परिवार,दुनिया बर्बाद होने कैसे हम बचा सकते हैं। क्यूँकि यह कोरोना नामक बीमारी हमारे समाज में मानसिक रूप से लोगों को अधिक बिमार कर रही है। दूसरी महामारियों की तरह कोरोना भी पहले से बंटे हुए समाजों को और बांटेगा। ग़रीबी और अमीरी की खाई और चौड़ी होगी। ‘ग़रीब’ शब्द के बहुत गहरे और प्रभावी राजनीतिक मायने सामने आएंगे। दलितों के मुद्दे महत्वपूर्ण तो रहेंगे, लेकिन मुमकिन है कि बहुत हद तक वे ‘ग़रीब’ और ‘ग़रीबी’ में जज़्ब होकर रह जाएं।

इसके कारण भारतीय समाज में इंसान और इंसान के रूप में सोशल डिस्टेंसिंग की सामाजिक आदत पैदा हो सकती है। बहुत मुमकिन है कि यह आपदा जाति और जाति के बीच छूआछूत को कम कर आदमी और आदमी के बीच सामाजिक दूरी को लंबे समय के लिए आदत में बदल दे।

कोरोना संक्रमित होने पर जहां आज हमारा समाज अपनी ही एक महत्वपूर्ण कड़ी का साथ छोड़ देता है, यह गलत है। समाज को पूर्व की महामारियों से सबक लेते हुए एक साथ आगे बढ़ना चाहिए। मेरे कुछ महत्वपूर्ण सुझाव जो मैं आपसे सांझा कर रहा हूँ उस पर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें—

🔹सर्वप्रथम समाज में व्याप्त कोरोना के भय को कम करने के लिए जिला प्रशासन ने जन-जागरूकता अभियान निरन्तर चलाना चाहिए। जिससे लोगों का भ्रम दूर किया जा सके। 

🔹 जिला प्रशासन एक कोविड कॉल सेण्टर संचालित कर संक्रमित व्यक्ति को एक ही बार फोन कर विस्तृत विवरण लेना चाहिए। न कि अलग-अलग करके एक दर्जन से अधिक फोन। जिससे मानसिक अवसाद की स्थिति पैदा हो सकती है। 

🔹संक्रमित के परिवार से जहां समाज दूरी बना रहा है वह भी किसी अवसाद से कम नही है। शासन प्रशासन को इस ओर ध्यान देते हुए जागरूकता फैलाने की आवश्यकता है। तांकी वह परिवार इस दुःख की घड़ी में स्वयं को अकेला व लज्जावान न समझ बैठे। 

🔹ग्राम-प्रहरी, प्रधान, आशा, आगनवाड़ी के माध्यम से सरकार व प्रशासन उस परिवार की निगरानी भी सुनिश्चित करे । तांकी उस परिवार को समाज द्वारा अनावश्यक तौर पर फैलाए गए भ्रम से बचाया जा सके।

🔹कई जगहों पर सामाजिक बहिष्कार जैसी चीजें सामने आ रही है ऐसे समाज के उपद्रवी तत्वों पर पुलिस प्रशासन द्वारा दण्डात्मक कार्यवाही भी अतिआवश्यक है। 

🔹लोगों को एक दूसरे का सहारा बन अपने समाज के सभी वर्ग के सभी सदस्यों को बचाने के लिए समान प्रयत्न करने होंगे। 

🔹समाज में हमसभी को आगे बढ़कर संक्रमित व्यक्ति या उस परिवार की हिम्मत बढ़ाने में सहयोग करना होगा। तभी वह इस कोरोना की लड़ाई को जीत सकता है। यदि उसके दिमाग ने अपने समाज की बहिष्कृत रवैए को सच मान धारणा बना ली तो दुनिया की कोई शक्ति उसे नही बचा सकती है। 

🔹हमारे समाज व हम सब को मिलकर सोचना होगा कि हमें किस दिशा की ओर आगे बढ़ना है। हम पश्चिमी सभ्यता की तरह ही पश्चिमी संस्कृति की ओर तो नही बड़ रहे है। 

🔹 कोरोना महामारी पश्चिमी संस्कृति की तरह ही कहीं हमारे भारतीय समाज की संयुक्त परिवार व सामाजिक जीवन की अवधारणा को पूरी तरह से समाप्त न कर दे।आने वाले समय में हमें  व हमारी सरकारों को इस ओर भी सोचने व निर्णय लेने की आवश्यकता है। 

🔹 आइसोलेशन पर रहने वाले व्यक्ति से समय- समय पर वार्तालाप होना आवश्यक है, उसे इस संकट से उबारने के लिए। समाज में अधिकतर देखने में आ रहा है कि संक्रमित होने के बाद उसके दोस्त भी उससे दूरी बना ले रहे हैं जो बहुत ही ग़लत है। यदि हम किसी की तकलीफ़ में सहारा नही बन सके तो हम उसके दोस्त कहलाने के लायक नही हैं। ठीक वैसे ही जब हम अपने ही समाज के एक व्यक्ति को बचाने  के लिए आगे नही बाड़ सकते हैं तो हमें सामाजिक कहलाने का कोई अधिकार नही। 

🔹 आइसोलेशन में रह रहे व्यक्ति के लिए मोटिवेशनल साहित्य या लेक्चर की व्यवस्था होनी आवश्यक है। क्यूँकि उस वक्त व्यक्ति कुछ सोच-समझ वाली स्थिति में नही खुद को रख पा रहा है। 

🔹कोरोना के साथ ही साथ मानसिक तनाव से संक्रमित व्यक्ति को बाहर निकालने के लिए यदि जिला प्रशासन सहमति प्रदान करता हैं तो मैं व मेरे जैसे अन्य साथी जो कोरोना पर विजय पाकर वापस अपने घर पहुँच चुके हैं एक टीम बनाकर संक्रमित लोगों को मोटिवेट कर मानसिक अवसाद से बचाने में अपनी निशुल्क सहभागिता करना चाहता हूँ। 

🔹अपने समाज के लिए इस विकट घड़ी में हमारे साथ हमारे जंप्रतिनिधियों को भी आगे आकर लोगों का सहारा बनने की ज़रूरत है। परन्तु हमारे बागेश्वर शहर का दुर्भाग्य है ऐसा कोई जनप्रतिनिधि नही। जिसने एक बार भी अपने क्षेत्र के कोरोना संक्रमित की फोन में कुशलक्षेप पूछी हो और उसके परिवार को ढाढ़स बधाया हो। 


♦️ वैसे मुझे यह कहते हुए कोई डर या झिझक नही है कि मेरे ग्राम प्रधान के अलावा मेरे क्षेत्र के किसी भी जनप्रतिनिधि का इन सत्रह दिनों में कोई कॉल या संदेश मुझे प्राप्त नही हुआ, जो क्षेत्र के प्रति मेरे जंप्रतिनिधियों की गम्भीरता को दर्शाता है। प्राप्त जानकारी के अनुसार बागेश्वर जनपद में लगभग सभी क्षेत्रों का यही हाल है। वैसे भी हम पहाड़ियों के लिए एक फ़्लू ही तो है कोरोना कुछ और नही। जीवन आनन्द के लिए है इसे डर में व्यतीत करने से बेहतर है उस मुसीबत के समय में भी अपने हिस्से की खुशी ढूड़ ली जाए। हर हाल में खुश रहना ही जीवन है। 



“कोई इलज़ाम उठाओ कोई साज़िश तो बुनो
कोई अफ़साना सुनाओ जरा कुछ तो बोलो
कौन मिस्सार हुआ उस की कहानी कह दो 
सर उठाओ कि जमाने को भी कुछ हासिल हो 
हम सरे-ए-दार खुद आ बैठे हैं इल्ज़ाम गढ़ो 
तेग को धार दो खंजर को रवानी दो जरा 
वरना खामोशी के असबाब बताओ तो जरा !!”




नोट- जिन्हें वाक़ई यह पागलपन लगता है, वे यहाँ बहस करके वक्त ज़ाया न करें। जो सहमत हैं, उनका स्वागत है। आगे का रास्ता सुझायें। घर में चुप बैठकर सत्य का जाप करने से कुछ नहीं होगा। सत्य को शक्तिमान बनाने के लिए दैनिक प्रभात फेरियों की ज़रूरत है।

धन्यवाद!!

Friday, 25 September 2020

(दास्तान-ए-कोरोना - V) कोरोना से विजय पाने में आपकी इच्छाशक्ति ही आपका इलाज है, घर वापसी बढ़ाती है हमारा मनोबल


अगली सुबह वही पिछले दिनो की तरह ही काड़े की आवाज़ के साथ मेरी सुबह हुई। आज घर जाने की खुशी में समय से पहले ही हम नहा- धोकर तैंयार बैठे थे। कुछ समय बाद फिर अजब दा नाश्ता ले आए। फिर हम दोनो ने इस कोरोना इलाज के दौरान आज आँखिरी सुबह का नाश्ता साथ किया, एक दूसरे को घर वापसी की बधाई दी, भविष्य में मिलते रहने की बात कहते हुए अपना-अपना सामान समेटने लगे। क्यूँकि आज मेरा व मेरे रूम पाटनर डॉ निर्मल बसेड़ा होम आइसोलेशन भी यहीं पर रहते हुए समाप्त होने वाला था।  खुशी इतनी थी कि शब्दों में बयां करना नामुमकिन है। 

फिर मैं एक बार ड्यूटी में तैनात डाक्टर साहब के सामने पहुँचा, कि हम कब तक अपने घर रवाना हो सकते हैं यह जानने। फिर उन्होंने मुझे कुछ पेपर दिए उसे भरने को कहा, हम दोनो ने वह वापस जाकर डाक्टर साहब को दिए तो वह बोले हमारे पास तो अभी कोई वाहन उपलब्ध नही है आप अपनी गाड़ी मंगाइये और जा सकते हैं। फिर मैंने पूछा वैसे आप हमें कौन सी गाड़ी में वापस घर भेजने वाले थे, इस पर उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया जिसकी सवारी कर आप यहाँ तक पधारे हैं, मुझे हंसी छूट गई और जरा ज़ोर से बोला नही उसमें नही जाना है अब। फिर वापस हम कमरें में आ गए तब तक 10:30 का समय हो गया था सूरज भी चढ़ आया था। आज गर्मी भी काफ़ी लग रही थी। 

फिर मैंने बड़े भाई साहब को फोन कर गाड़ी भेजने को कहा तो तुरन्त ही गाड़ी पहुँच गई। फिर हम दोनो कमरें की लाईट, पंखे वग़ैरह बंद कर बाहर निकले डाक्टर साहब को धन्यवाद कहते हुए सीड़ियों की तरफ़ बड़े तो अजब दा आ रहे थे उन्हें धन्यवाद कह नमस्कार करते हुए आगे बड़े। नीचे गेट पर पहुँचे तो वहाँ मौजूद गार्ड ने कहा कि अपने-अपने नाम के आगे हस्थाक्षर कर दीजिए। काफ़ी देखने के बाद पता लगा मेरा नाम ही वहाँ पर दर्ज नही है। ये काफ़ी चौकने वाला विषय था मेरे लिए, क्यूँकि जहां मैं अपने जीवन के अतिमहत्वपूर्ण 17दिन बिता आया उसके गेट पर दर्ज होने वाली विवर्णीका में मेरा नाम ही दर्ज नही है। खैर इन सब बातों को नजरअन्दाज़ करते हुए मैं फिर आगे बड़ा बाहर गेट पर गाड़ी इंतज़ार कर रही थी। अपना सामान गाड़ी में रख पहले खुले आसमान के नीचे, खुली हवा में बाहे फैलाते हुए अपनी आज़ादी को गले लगाया और ऊपर आसमान की तरफ देख ईश्वर का शुक्रिया अदा किया। फिर हम दोनो गाड़ी की पिछली सीट पर बैठ गए। कुछ आगे आकर  बसेड़ा जी के स्टॉप पर उन्हें अल्विदा कहते हुए फिर गाड़ी में बैठ गया। फिर गाड़ी धीरे-धीरे आगे बड़ चली, बाज़ार में काफ़ी चहल-पहल भी नज़र आ रही थी। आज बहुत दिनो के बाद बाहर निकला हूँ तो शहर बड़ा अच्छा सा लग रहा था। बीस मिनट के सफर में कई तरह के ख़याल मन में आ रहे थे। दिमाग में लोगों व उनकी बातों को लेकर उथल-पुथल चल रही थी।
इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि घर वापसी ने मेरा खुद मनोबल बढ़ाया होगा। इलाज के दौरान जब भी खाली वक्त या यूँ कहें बोर सा होता था तो अपनी पसंदीदा कोई भी मोटिवेशनल वीडियो फुटेज देखना पसंद करता था। 

आज मुझ जैसे मेरे जनपद के सैकड़ों लोग एक फाइटर हैं और खुद को प्रेरित करने के लिए मेरा यह टाइम पास का जरिया एक अच्छा विकल्प था, ऐसा मुझे लगता है। पर इससे जुड़ा एक मनोवैज्ञानिक पहलू भी है, जो कहता है कि अपनी जीवन की खेली गई पुरानी पारियों को लेकर जरूरत से ज्यादा संजीदा नहीं होना चाहिए। हमें हर वक्त यह नहीं सोचना चाहिए कि क्या हम दोबारा उसी तरह की ज़िन्दगी कब जी पाएंगे। इस मनोवैज्ञानिक सोच के पीछे तर्क बहुत सीधा है। इस तरह लगातार अपनी पिछली ज़िन्दगी को देखकर हम खुद पर एक ऐसा मानसिक दबाव बना लेंगे जो आने वाले दिनों में हमें परेशान कर सकता है या मानसिक बीमार कर सकता है, जिसे आधुनिक भाषा में हम डिप्रेशन कहते हैं। 
मन में ख्याल आ रहे थे कि अब मुझे भी उन छोटी-मोटी चुनौतियों का सामना करना है, जिसके लिए दिमागी तौर पर बेहद मजबूत होने की काफी जरूरत है। 
फिर मैंने इन ख़्यालों से बचने व खुद को समझाते समझाने के लिए अपनी आँखें बन्द कर एक गहरी साँस ली और सोचा ऐसे में मेरी प्राथमिकता सिर्फ इतनी होनी चाहिए कि सबसे पहले एक सेहतमंद इंसान बनें। एक रोग मुक्त व्यक्ति की तरह सामान्य जिंदगी में वापस लौटें और कोरोना की बीमारी व उसके इलाज की इस 17दिवसीय लंबी प्रक्रिया ने मेरे शरीर व दिमाग पर जो नकारात्मक असर डाले हैं, उससे अपने शरीर को पूरी तरह निजात दिलाकर आगे बढ़ने का प्रयत्न करुं।

अंग्रेजी में एक कहावत कही जाती है कि “देयर इज नो प्लेस लाइक होम” मैं उसी होम में वापस आ गया हूँ। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि घर वापसी ने मेरा मनोबल बढ़ाया होगा।


घर जाने के रास्ते में गाड़ी रुकने पर मेरी तंद्रा टूटी। फिर चालक को मुझे छोड़ने के लिए धन्यवाद कह विदा कर मैं आगे अपने घर की तरफ़ बढ़ गया। रास्ते में गाँव की ही एक ताई जी  व उनकी बहू जो रिस्ते में मेरी भाभी लगती हैं मिले, वो खेत से आकर रास्ते की छाँव में बैठे आराम कर रहे थे। पास जाते-जाते मेरे दिमाग ने मुझसे कई सवाल कर डाले, मुझे वो दोस्तों की बातें भी याद आ रही थी। खैर जैसे ही मैं उनके पास पहुँचा तो उन्होंने मेरा हालचाल पूछा, मैंने कहा सब ठीक है। कोई परेशानी नही थी बस रिपोर्ट पॉज़िटिव आ गई थी । तो ताई जी बोले जो भी है ठीक होकरघर आ गया अच्छी बात है, इस कोरोना ने तो बेटा सबको डराकर रख दिया है। उनकी बातें सुन मन को तसल्ली हुई। 

फिर उनसे विदा लेकर में आगे बढ़ा तो घर के आँगन में पहुँचा तो देखा मेरी माँ खिड़की से बाहर को झांक मेरा इंतज़ार कर रही है। 
माँ बाहर आ गई, 
मेरा हाल पूछा तो मैंने बताया सब ठीक है कोई परेशानी नही..
माँ ने कहा ठीक है बेटा 
तेरे लिए नाश्ता क्या बनाऊँ, तूने खाया नही होगा अभी कुछ 
मैंने कहा मैं नाश्ता करआया हूँ तो माँ चुप हो गई 
पर इससब में उसकी आंखों में भरा पानी मैं देख सकता था
फिर मैंने स्थिति को सम्भालते हुए अपने कमरे की चाबी देने को कहा, तो पता लगा खुला ही है 
मैंने कपड़े बदले 
फिर तब तक माँ मेरी पसंदीदा चाय बना लाई 
मैंने चाई ली, जो मैं आज काफ़ी दिनों बाद अपनी माँ के हाथों से बनी तरसता रहा 
अभी भी मैं माँ से उचित दूरी बनाकर खड़ा था और माँ कमरें  बाहर दरवाज़े पर 
फिर माँ ने पूछा, अभी भी तुझे अलग ही रहना है क्या? लोगों में भी नही जाना होगा 
मैंने चाय की चुस्की लेते हुए हाँ में अपना सर हिलाया 
माँ  ने कहा लोगों से सुना तू हल्द्वानी था बल, तूने बताया नही मुझे बहुत चिन्ता हो रही थी 
मैंने माँ को समझाते हुए कहा कि मैं बागेश्वर ही था इतने पूरे 17 दिनों तक आपको फोन पर हर रोज बता तो रहा था, वैसे माँ को लगता है ये अपनी कोई परेशानी मुझे बताता नही है, जो सच भी है, क्यूँकि मैं माँ को दुःखी नही देख पाता हूँ।
माँ बोली मैंने ठीक से सुना नही फोन पर और हंस दी।
फिर माँ चली गई अन्दर को, मैं भी कमरें में आराम करने लगा। 
दोपहर को माँ ने दाल चावल बनाया तो मुझे मेरे कमरें में ही अलग दिया, शाम को भी यही सब अगले तीन दिनों तक एहतियातन चलता रहा।
क्यूँकि माँ का स्वास्थ्य अक्सर ख़राब रहता है तो मैं इस बीमारी से उन्हें बचाना चाहता हूँ। क्यूँकि .......

मैंने कोरोना का रोना देखा है!
और उम्मीदों का खोना देखा है!!
लाचार मजदूरों को रोते देखा है!
गिरते पड़ते चलते और सोते देखा है!
पिता को सूनी आंखों से तड़पते देखा है!!
तो मां की गोद में बच्चे को मरते देखा है!
गरीबों का खुलेआम रोष देखा है!!
तो मध्यमवर्ग का मौन आक्रोश देखा है!
गरीबों को अस्पतालों में लुटते देखा है! !
तो निर्दोषों को बेवजह पिटते देखा है!
अल्लाह भगवान की दुकानों का बंद भी होना देखा है!
तो रोना रोती सरकारों का अंत भी होना देखा है!!
आंखिर में खुद कोरोना का दंश भी झेला है।  

जब मैं कुछ दिनो के बाद लोगों के बीच गया तो सबने मुझे वही पुराना प्यार व स्नेह दिया, किसी ने कोई भेदभाव मेरे साथ नही दिखाया। वही ये कहते भी मुझे लोग मिले की अब तो यह सबको ही होना है, किसी को पहले तो किसी को बाद में, बचना किसी ने नही है। 
मुझे अपने गाँव, समाज में यह सब देख बड़ा अच्छा लगा, जैसा अभी तक मैंने दूसरे जगहों से लोगों के अनुभव आपके साथ सांझा किए थे मेरे साथ इसका ठीक उल्टा हो रहा था। मैं सोचने लगा कि कितना नकारात्मक विचार आया था मेरे मन में पर हमारा समाज बेहद जागरूक समाज है। 

कोरोना से लड़कर आज मैं पहले की तरह सामान्य हूँ, अपनो के साथ और अपनो के बीच हूँ, किसी को किसी तरह की कोई परेशानी मुझसे नही है, न ही मुझे किसी से कोई परेशानी है। मुझे गर्व महसूस होता है कि मैं एक अच्छें गाँव, एक अच्छे समाज, अच्छे पड़ोस के बीच रहता हूँ, जो समाज में फैली भ्रान्तियों को दरकिनार करते हुए सभ्य समाज की परिकल्पना को पूर्ण करते हैं। 


♦️ एक समय मेरे सामने ऐसा भी आया कि मैं घर वापसी की छोड़ चुका था उम्मीद...
पहले मौसम बदलने के चलते कभी-कभी वायरल के कारण मेरी तबितय खराब जरूरी हो जाती थी, वो आज भी होती ही है। लेकिन मुझे इस बात का कतई अंदाजा नहीं था कि मैं कोरोना पॉजिटिव भी हो सकता हूँ। कोरोना जांच की आई पॉजिटिव रिपोर्ट ने मेरे पैरों तले जमीन खिसका दी थी। पॉजिटिव निकला तो एकपल को लगा कि अब सबकुछ खत्म हो गया। पर मैंने हिम्मत नहीं हारी। डॉक्टरों की मेहनत के अलावा ईश्वर की कृपा मुझ पर रही, जिसके चलते अपने परिवार के पास सही सलामत लौट पाया। हमारे परिवार से बड़ी मुसीबत टली है। आज मैं सही सलामत आपके सामने हूँ। इससे बढ़कर मेरे लिए खुशी की बात क्या हो सकती है।इतनी बड़ी बीमारी से बचकर आये हैं तो स्वाभाविक है हमारे समाज में फैली तरह-तरह की भ्रान्तियों के चलते सभी लोग कुछ डरे जरूर हैं, लेकिन जल्द ही सब सामान्य हो जाएगा। सकारात्मक सोच रखिए सफलता जरुर मिलेगी। 

आप लोगों से मेरा निवेदन है की आप भी अपने समाज व आस पास जागरूकता फैलाएँ, लोगों में भ्रम की स्थिति न बनने दें। यह स्वयं के लिए ही नुक़सानदेय है। आप सभी अपना व अपनो का ध्या रखें .....।





नोट— आप सभी ने अभी तक का पूरा घटनाक्रम पढ़ा व समझा, साथ ही मुझे अपने विचार सांझा करने के लिए सराहा भी। मैं आप सभी का दिल से धन्यवाद करते हुए आभार व्यक्त करता हूँ। अब आप जिला प्रशासन, शासन स्तर या सामाजिक स्तर पर अभी क्या बदलाव किए जाने चाहिए इस सम्बंध में अपने सुझाव मुझे प्रेषित करे तांकी रविवार को अगले फ़ाइनल अंक में उन्हें भी सम्मिलित कर सकूं।आंखिर कोरोना पॉजिटिव व्यक्ति व उसके परिवार की हिम्मत की कैसे बढ़ाया जा सके। साथ ही किसी को टूटने से या किसी का घर,परिवार,दुनिया बर्बाद होने कैसे हम बचा सकते हैं। क्यूँकि अब तक तो आप समझ ही गए होंगे यह कोरोना नामक बीमारी हमारे समाज में मानसिक रूप से लोगों को अधिक बिमार कर रही है।  





क्रमशः जारी —— ❣