Thursday, 12 October 2017

वक़्त गुज़र कर यूं चला गया...

वक़्त गुज़र कर यूं चला गया,
हम बचपन के हल्ले भूल गये
जहाँ दौड़ दौड़ कर वचपन बीता,
हम वो गली मोहल्ले भूल गये
जिनके साथ ये बचपन गुज़रा,
हमतो उनके भी चेहरे भूल गये
जिस घर में मां की ममता पायी,
हम उस घर के मंज़र भूल गये
महलों की चमक में ऐसे खोये,
अपने मिट्टी के घरोंदे भूल गये
जिस मिट्टी में लोट कर बड़े हुए,
हम उसकी सोंधी खुशबू भूल गये
भौतिक सुख में कुछ ऐसे डूबे,
हम कुदरत की छटाएं भूल गये
हम ऐसे बसे परदेस में आकर,
अपने घर के ही रस्ते भूल गये...

दराज़ो में गर्द खाती किताबे , खंडहर हुई जा रही है !!

दराज़ो में गर्द खाती किताबे , खंडहर हुई जा रही है ,
दरकते पन्नों को , “अनदेखीकी घुन खा रही है ।
धड़कते दिल अब किताबो में चेहरे छिपाते नही है ,
तोहफ़ो की फेहरिश्त से भी हटती जा रही है |

पन्ने पलटते किसी को किसी की याद आये ,
खत बेख्याली में दबा भूलने की याद आ रही है।
दराजों में गर्द खाती किताबे खंडहर हुई जा रही है ......
व्हाट्स एप पे मशरूफ रहने वालो को क्या मालूम ,
पन्नों में धड़कती साँसे अब भी सुनी जा रही है |
फेसबुक नजदीकियों ने दूर किया इन दोस्तों से ,
कागजों से अब तलक महकती उंगलियो की खुश्बू आ रही है ..|
दराजों में गर्द खाती किताबे खंडहर हुई जा रही है .....
खुद को भुला देना इन कहानियो में खोये हुए
बुजुर्गो की तरह नज़रंदाज सामान हुई जा रही है ।
देख रही तल्ले पर पड़ी नाउम्मीद नजरो से ,
हमारा वक़्त दुनियामोबाइल में गँवा रही है..|
दराजों में गर्द खाती किताबे खंडहर हुई जा रही है ......
तकिये और बिस्तर पे साथ सोते थे कभी हम ,
मोबाइल की खातिर सिरहाने से हटाई जा रही है |
सुबह तक धड़कने सुनती राते कटी थी ,
अब कमरे की स्याही में मोबाइल की रौशनी आ रही है
दराजों में गर्द खाती किताबे खंडहर हुई जा रही है ...
किताबों में सूखे गुलाब अमानत किसी की ,
ये नाज़ुक आदते बेमानी हुई जा रही है।
अब भी कागज़ी इत्र की आरज़ू में,
महकती कलियाँ उदास झड़ी जा रही है ।
दराज़ो में गर्द खाती किताबें खंडहर हुई जा रही है ...
चाचा चौधरी कंप्यूटर से तेज़ दिमाग कंप्यूटर से हारे ,
साबू की मस्ती छोड़ नन्ही उंगलियाँ टैब चला रही है ..|
एक दिन लौटेगा ज़माना उब कर कोरी भौतिकता से ,
गोदान की धनिया गोबर को समझा रही है
..दराजों में गर्द खाती किताबे खंडहर हुई जा रही है ,
दरकते पन्नो को अनदेखी की घुन खा रही है ।।



                                                                                        राजू

राजनीति और कांग्रेस

राजनीति के कोई अन्य अर्थ कभी नहीं होते, राजनीति सिर्फ राजनीति होती है- विशुद्धतः राज करने की नीति !, इसमें किसी अन्य विषय की मिलावट नहीं होती ! संसद में जो कुछ कांग्रेस पिछले साल से कर रही है, वह राजनीति ही है, अर्थात राज कैसे किया जाए? सत्ता हो तो सत्ता चलाई कैसे जाए, सत्ता न हो तो सत्ता पायी कैसे जाए- जिसे हम विपक्ष की राजनीति भी कह सकते हैं, कांग्रेस वर्तमान में विपक्ष वाली राजनीति निभा रही है, जिसमें वह सही दिशा में है, वह ये संदेश देने में पूर्णतः सफल हुई है कि चाहे 44 जैसे अल्पमत में भी हो, फिर भी इच्छाशक्ति के बल पर प्रचण्ड बहुमत, प्रचण्ड जन समर्थन की सरकार को भी निठल्ला बैठने पे मजबूर किया जा सकता है !
देश की सत्ता के लिए भाजपा एक नौसिखिया दल है, जिसकी राजनीति में राष्ट्रवाद, नैतिकता आदि विषयों की भटकन होती रहती है, मगर प्रतिपक्ष में बैठी कांग्रेस सत्ता चलाने का अथाह अनुभव रखती है, वह जानती है कि सत्तापक्ष किस स्थान पे घुटने टेक सकता है | कांग्रेस के अनुभव का प्रमाण इस बात से मिल जाता है कि खुलेआम लोकतंत्र को आपातकाल में घोंटने के मात्र 3 साल बाद ही इंदिरा गांधी इसी देश की प्रधानमंत्री बन गयीं थीं.. यही राजनीति है ! राजनीति में कोई शत्रु नहीं होता, बस विपक्षी होता है, राजनीति में किसी को मारना नहीं होता, बस अपना बनाना होता है! कांग्रेस की राजनीति राष्ट्रवाद और सिद्धांतों आदि में नहीं उलझती, वहीं भाजपा का राजनीतिक इतिहास वह रहा है जिसमें एक मत से सत्ता की बलि दे दी जाती है, मगर दूसरे रास्तेनहीं अपनाए जाते !
भाजपा में तेज नेता जरूर हैं , सत्ता पा सकते हैं , मगर सत्ता बनाए रखना कांग्रेस से सीखना चाहिए ! कांग्रेस सदन को रोकती है , खुलेआम रोकती है सभी जानते हैं ! वहीं भाजपा इसका विरोध विकास के लिए अपनी सक्रियता दिखा कर करती है, जो कि निष्प्रभावी रहता है, यदि विकास और देशनीति ही सत्ता के कारक होते तो देश को Highways व ग्रामीण सड़क देने वाले और परमाणु सम्पन्न देश घोषित करवाने वाले अटल जी कभी सत्ता से बाहर न होते ! ये बात स्वयं भाजपा भी जानती है कि उन्हें सत्ता गुजरात के विकास पर नहीं बल्कि अन्य भी कारणों से प्राप्त हुई है ! मोदी जरूर मजदूर no.1 होंगे मगर सिर्फ मेहनत करने से मजदूर मालिक नहीं बन जाता, जितनी मेहनत वह करता है उतनी और उससे करवाई जाती है , मालिक वही होता है जो मेहनत करवाना जानता है , और ये काम कांग्रेस ने खूब किया है !
कांग्रेस स्वच्छन्दतः मोदी को तानाशाह घोषित करती है जबकि अठारह साल से कांग्रेस अध्यक्ष पद पर सोनिया गांधी को चुनौती देने वाला कोई हुआ ही नहीं ! रोचक बात यह है कि इसी कांग्रेस में तिलक,मालवीय, नेताजी और पटेल जैसे नेता भी रह चुके हैं, मगर साहस नहीं जो कोई इनका नाम भी ले सके, आजमाकर देखें कि कांग्रेस का नाम सुनते ही सिर्फ सोनिया गांधी का ही चेहरा याद आता है! इतना ही नहीं फैसले सही हों या गलत , कोई भी कांग्रेस सदस्य Madam पर प्रश्न नहीं उठा सकता! 44 seats हों या शून्य हो जाएँ, मुखिया Madam थीं और Madam ही रहेंगीं ! यही है राज करने की नीति l

फेसबुक से जुड़े कुछ तथ्य ..

  • 1.      फेसबुक पर बराक ओबामा की जीत संबंधी पोस्ट 4 लाख से अधिक लाइक के साथ फेसबुक पर सबसे ज्यादा पसंद किया गया फोटो बन गया।
  • 2.      फेसबुक के 25 फीसदी से ज्यादा यूजर्स किसी भी तरह के प्राइवेसी कंट्रोल को नहीं मानते।
  • 3.      इस सोशल नेटवर्किंग साइट के जुड़े हर व्यक्ति से औसत रूप से 130 लोग जुड़े हैं।
  • 4.      फेसबुक के साथ 850 मिलियन सक्रीय मासिक यूजर्स जुड़े हुए हैं।
  • 5.      इस नेटवर्किंग वेबसाइट के कुल यूजर्स में से 21 प्रतिशत एशिया से हैं, जो इस की महाद्वीप की कुल आबादी के चार प्रतिशत से कम है।
  • 6.      488 मिलियन यूजर्स रोज मोबाइल पर फेसबुक चलाते हैं।
  • 7.      फेसबुक पर सबसे ज्यादा पोस्ट ब्राजील से किए जाते हैं। वहां से हर माह लगभग 86 हजार पोस्ट किए जाते हैं।
  • 8.      23 प्रतिशत यूजर्स रोज पांच या उससे अधिक बार अपना फेसबुक अकाउंट चेक करते हैं।
  • 9.      फेसबुक पर 10 या उससे अधिक लाइक्स वाले 42 मिलियन पेज है।
  • 10.  1 मिलियन से अधिक वेबसाइट्स अलग अलग तरह से फेसबुक से जुड़ी हुई है।
  • 11.  85 प्रतिशत महिलाएं फेसबुक पर अपने दोस्तों से परेशान हैं।
  • 12.  फेसबुक ने 2012 में रूस, दक्षिण कोरिया, जापान, भारत और ब्राजील में अपने सक्रीय यूजर्स की संख्या में 41 फीसदी का इजाफा किया है।
  • 13.  इस सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट पर रोज 250 मिलियन फोटो रोज डाले जाते हैं।
  • 14.  2012 तक फेसबुक पर 210,000 साल का संगीत बज चुका था।
  • 15.  यहां पर सेक्स से जुड़ी लिंक्स की संख्या अन्य लिंक्स की की अपेक्षा 90 प्रतिशत ज्यादा थी।
  • 16.  2012 में फेसबुक पर 17 बिलियन लोकेशन टैग्ड पोस्ट और चेक इन थे
  • 17.  फेसबुक के माध्यम से 80 प्रतिशत यूजर्स विभिन्न ब्रांड्स से जुड़े।
  • 18.  फेसबुक के 43 प्रतिशत यूजर्स पुरुष है वहीं 57 फीसदी महिलाएं।
  • 19.  अप्रैल में फेसबुक की कुल आय का 12 प्रतिशत हिस्सा जिग्ना गेम का था।
  • 20.  बीटूसी कंपनियों को 77 प्रतिशत और बीटूबी कंपनियों को 43 प्रतिशत ग्राहक फेसबुक से मिले थे।
  • 21.  सिर्फ एक दिन में ही फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग विश्व के 23 वें सबसे अमीर लोगों की लिस्ट में शामिल हो गए। 28 साल के मार्क जुकरबर्ग ने 18 मई 2012 को फेसबुक के शेयर पब्लिक के लिए निकाले थे जिससे फेसबुक को करोड़ो डॉलर की आमदनी हुई।
  • 22.  करीब 55 फीसदी अभिभावक अपने बच्चों का फेसबुक पर पीछा करते हैं.
  • 23.  रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि फेसबुक पर लोग अपने मौजूदा जीवनसाथी के बजाय पूर्व जीवनसाथी से ज्यादा जुड़े होते हैं।
  • 24.  बरसों तक इंटरनेट की दुनिया पर राज करने वाली गूगल कंपनी ने माना है कि सोशल नेटवर्किंग साइटों को नजरअंदाज करना उसकी सबसे बड़ी गलती रही। ऐसी गलती, जिसकी भरपाई अब नहीं की जा सकती है। फेसबुक का जब जन्म भी नहीं हुआ था, तब गूगल ने ऑर्कुट के तौर पर सोशल मीडिया चलाया था, जो भारत और ब्राजील के अलावा कहीं और नहीं चल पाया। इसके बाद गूगल का बज भी फेल हो गया और अब कंपनी ने अपना पूरा ध्यान गूगल़ पर लगाया है लेकिन उसकी कामयाबी भी सीमित है। गूगल ने पिछले दशक में इंटरनेट की दुनिया पर राज किया, और उसकी लोकप्रियता का यह आलम था कि गूगल को अंग्रेजी भाषा में क्रिया मान लिया गया और उसे शब्दकोषों में जगह मिल गई। एलेक्सा डॉट कॉम के मुताबिक अब भी वह पहले नंबर की वेबसाइट बनी हुई है, जबकि फेसबुक दूसरे नंबर पर है। लेकिन कभी कभी फेसबुक उससे पहला नंबर छीन लेता है।
  • 25.  फेसबुक की ताजा तिमाही रिपोर्ट में कहा गया है कि 1.18 अरब प्रयोग कर्ता में से 1.41 करोड़ फर्जी हैं।

सोशियल मीडिया का इतिहास

1994 में सबसे पहला सोशल मीडिया जीओ साइट के रूप में सामने आया। इसका उद्देश्य एक ऐसी वेबसाइट बनाना था, जिससे लोग अपने विचार और बातचीत आपस में साझा कर सकें। वर्तमान में विश्व में जो करीब 2.2 अरब लोग इंटरनेट का प्रयोग करते हैं, उनमें से फेसबुक पर एक अरब, ट्विटरर पर 20 करोड़, गूगल प्लस पर 17.5 करोड़, लिंक्ड इन पर 15 करोड़ से अधिक सदस्य हैं। सोशल साइट के प्रति लोगों की दीवानगी इससे समझी जा सकती है कि एक अध्ययन के अनुसार लोग फेसबुक पर औसतन 405 मिनट, ट्विटर पर 21 मिनट, लिंक्डइन पर 17 मिनट व गूगल प्लस पर तीन मिनट व्यतीत करते हैं।
सोशल मीडिया के लाभ/सकारात्मक प्रभाव:
  • 1.      संपर्कों का दायरा बढ़ाते हुऐ अधिकाधिक लोगों तक अपने विचारों का आदान-प्रदान कर सकते हैं।
  • 2.      अपने विचार, फोटो और वीडियो चाहें तो पूरी दुनिया या अपने दोस्तों के बीच शेयर कर सकते हैं। इन पर त्वरित प्रतिक्रिया- टू-वे कम्युनिकेशन भी प्राप्त कर पाते हैं।
  • 3.      अपने विचारों को ब्लॉग लिखकर पूरी दुनिया के सामने रख सकते हैं, और अब तो वीडियो कॉल के जरिये आमने-सामने बैठे जैसे बातें भी कर सकते हैं, जबकि यह सुविधा अन्य माध्यमों से बेहद महंगी है।
  • 4.      अपनी लिखी सामग्री को लाइब्रेरीके रूप में हमेशा के लिए सहेज कर भी रख सकते हैं, तथा इसे जब चाहे तब स्वयं भी, और चाहे तो पूरी दुनियां के लोग भी उपयोगी होने पर सर्चकर प्राप्त कर सकते हैं।
  • 5.      सोशल साइट पूर्व में छूटे दोस्तों को मिलाने और नए वर्चुअल दोस्त बनाने और दुनिया को विश्व ग्राम यानी ग्लोबल विलेजबनाने का माध्यम भी बना है।
  • 6.      अपनी बात, विचार बिना किसी रोक-टोक के रख पाते हैं।
  • 7.      सदुपयोग करें तो सोशल मीडिया ज्ञान प्राप्ति का उत्कृष्ट माध्यम बन सकता है। इसके माध्यम से मित्रों से उपयोगी पाठ्य सामग्री आसानी से प्राप्त की जा सकती है, और सूचनाओं का आदान-प्रदान किया जा सकता है।
  • 8.      अन्ना एवं रामदेव के आंदोलन में दिखी सोशियल साइट्स की ताकत: वर्ष 2013 में समाजसेवी अन्ना हजारे के आंदोलन को दिल्ली से पूरे देशव्यापी बनाने में सोशियल साइट्स की बड़ी भूमिका देखी गई। सही अर्थों में इस दौरान सोशियल साइट्स ने समाज को मानों हाथों से हाथ बांध एक सूत्र में पिरो दिया। स्वामी रामदेव के आंदोलन में भी सोशियल साइट्स की बड़ी भूमिका रही। देश में राजनीतिक परिवर्तन, आर्थिक नीतियों, धार्मिक व सांस्कृतिक मुद्दों पर भी सोशियल साइट्स पर खूब चर्चा रही। इस से संबंधित विषयों पर कई अलग ग्रुप, पेज और कॉज यानी बड़े मुद्दे तैयार कर उन पर भी लोग अलग से चर्चा होने लगी।

  • सोशियल नेटवर्किंग साइट्स के नकारात्मक प्रभाव:
  • 1.      सामाजिक मीडिया के व्यापक विस्तार के साथ-साथ इसके कई नकारात्मक पक्ष भी उभरकर सामने आ रहे हैं। पिछले वर्ष मेरठ में हुयी एक घटना ने सामाजिक मीडिया के खतरनाक पक्ष को उजागर किया था। वाकया यह हुआ था कि एक किशोर ने फेसबुक पर एक ऐसी तस्वीर अपलोड कर दी जो बेहद आपत्तिजनक थी। इस तस्वीर के अपलोड होते ही कुछ घंटे के भीतर एक समुदाय के सैकडों गुस्साये लोग सडकों पर उतार आए। जब तक प्रशासन समझ पाता कि माजरा क्या है, मेरठ में दंगे के हालात बन गए। प्रशासन ने हालात को बिगडने नहीं दिया और जल्द ही वह फोटो अपलोड करने वाले तक भी पहुच गया। लोगों का मानना है कि परंपरिक मीडिया के आपत्तिजनक व्यवहार की तुलना में नए सामाजिक मीडिया के इस युग का आपत्तिजनक व्यवहार कई मायने में अलग है। नए सामाजिक मीडिया के माध्यम से जहां गडबडी आसानी से फैलाई जा सकती है, वहीं लगभग गुमनाम रहकर भी इस कार्य को अंजाम दिया जा सकता है। हालांकि यह सच नहीं है, अगर कोशिश की जाये तो सोशल मीडिया पर ऐसे लोगों को आसानी से पकड़ा जा सकता है, और इन घटनाओं की पुनरावृति को रोका भी जा सकता है। इससे पूर्व लंदन व बैंकुवर में भी सोशल मीडिया से दंगे भड़के और दंगों में शामिल कई लोगों को वहां की पुलिस ने पकडा और उनके खिलाफ मुकदमे भी दर्ज किए। मिस्र के तहरीर चौक और ट्यूनीशिया के जैस्मिन रिवोल्यूशन में इस सामाजिक मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका को कैसे नकारा जा सकता है।     
  • 2.      विश्वसनीयता का अभाव : विश्वसनीयता का अभाव सोशल मीडिया की सबसे बड़ी कमजोरी है। यही कमजोरी सोशल मीडिया को मीडिया माध्यमकहे जाने पर भी सवाल उठा देती है। क्योंकि विश्वसनीयता’ ‘मीडिया माध्यमकी पहली और सबसे आवश्यक शर्त और विशेषता है।                    
  • 3.      अवांछित सूचनाओं की भरमार :  सोशल मीडिया की वजह से आज हमारे जीवन में सूचनाओं की भरमार हो गयी है। इसीलिए इस दौर में सूचना विस्फोट होने की बात भी कही जाती है। लेकिन यह भी सच है कि उपलब्ध सूचनाओं में अधिकाँश अवांछित होती हैं। इसीलिए कई बार हम सैकड़ों-हजारों की संख्या में आने वाली अनेक सूचनाओं को बिना पढ़े भी आगे बढ़ जाते हैं, और कई बार ऐसा करने पर वांछित और जरूरी सूचनाएँ भी बिना पढ़े निकल जाती हैं। यहां तक कहा जाने लगा है कि आज का युग सूचनाओं का युगजरूर है पर ज्ञान का नहीं। यानी सूचनाओं में ज्ञान की कमी है।                             
  • 4.      धन-समय की बर्बादी: यदि अधिकाँश सूचनाएँ अवांछित हों तो निश्चित ही नया मीडिया धन और समय की बर्बादी ही है। इसका उपभोग करने के लिए स्मार्ट फोनखरीदने से लेकर नेट पैकभरवाने में धन तो पल-पल संदेशों के आने पर मूल कार्यों को छोड़कर उनकी और ध्यान आकृष्ट करना पड़ता है। व्हाट्सएप्प पर तो अवांछित होने के बावजूद हर फोटो को डाउनलोडकरना पड़ता है, जिससे डाटाऔर फोन या कार्ड की मेमोरीकी बर्बादी होती है।                                              
  • 5.        तलब और मानसिक बीमारी का कारण : शहरी युवाओं को इंटरनेट व सोशल मीडिया की लत सी लग गई है। इसे प्रयोग करते-करते इसकी किसी नशे जैसी तलबलग जाती है। इंटरनेट के लती लोग मोबाइल को आराम देने के लिए ही सो पा रहे हैं। इस तरह यह अपने प्रयोगकर्ताओं को मानसिक रूप से बीमार भी कर रहा है। एसोसिएट चैंबर ऑफ कॉमर्श (एसोचेम) की वर्ष 2014 की देश के कई मेट्रो शहरों में कराए गए एस सर्वे की एक रिपोर्ट के अनुसार 8 से 13 वर्ष की उम्र के 73 फीसदी बच्चे फेसबुक जैसी सोशल साइटों से जुड़े हुए हैं, जबकि उन्हें इसकी इजाजत नहीं है। शोधकर्ताओं के अनुसार इन बच्चों के 82 फीसदी माता-पिताओं ने बच्चों को खुद का समय देने के बजाय उन्हें व्यस्त रखने के लिए खुद ही बच्चों के नाम से फेसबुक अकाउंट्स बनाए थे। वहीं अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ वर्जीनिया में मनोविज्ञान के प्रोफेसर टिमोथी विल्सन नकी साइंस मैगजीनमें छपी रिपोर्ट के अनुसार 67 फीसद पुरुष और 25 फीसद महिलाएं मोबाइल, टैब, कम्प्यूटर, टीवी, म्यूजिक व बुक आदि इलेक्ट्रानिक गजट के बिना 15 मिनट भी सुकून से नहीं रह पाए और विचलित हो गए, तथा उन्होंने इसकी जगह इलेक्ट्रिक शॉक लेना मंजूर कर लिया। टिमोथी के अनुसार हमारा दिमाग मल्टी टास्किंगका अभ्यस्त हो गया है, तथा हम हाइपर कनेक्टेडदुनिया में रह रहे हैं, तथा इसके बिना जीना हमें बेहद मुश्किल और कष्टदायी लगता है। आज लोग आमने-सामने की मुलाकात की जगह वर्चुअल संवादकरना अधिक पसंद कर रहे हैं। सलाह दी जा रही है कि अधिकतम दिन में दो-तीन बार 15-20 मिनट का समय ही इनके निश्चित करना चाहिए।                                                                              
  • 6.      भेड़चालः पिछले दिनों जबकि मशहूर गायक जगजीत सिंह जीवित थे, उन्हें ट्विटर पर श्रद्धांजलि दे दी गई। माइक्रो ब्लगिंग साइट ट्विटर पर 25 सितंबर 2011 को मशहूर गजल गायक जगजीत सिंह की मौत की अफवाह ने उनके चाहने वालों के होश उड़ा दिए। हर कोई उन्हें श्रद्धांजलि देने लगा। देखते ही देखते (RIP Jagjit Singh) यानी रेस्ट इन पीस जगजीत सिंह ट्वीट ट्विटर ट्रेंड्स में सबसे ऊपर आ गया। गौरतलब है कि इस दौरान जगजीत सिंह ब्रेन हेमरेज के बाद मुंबई के लीलावती अस्पताल में भर्ती थे। डाक्टरों ने बताया कि ब्रेन सर्जरी के बाद उनकी हालत स्थिर बनी हुई है। ट्विटर ट्रेंड्स में जिसने भी रेस्ट इन पीस जगजीत सिंह ट्वीट देखा, वह भेड़चाल में जगजीत सिंह को श्रद्धांजलि देने लगा। बाद में, जैसे-जैसे लोगों को अपनी गलती का एहसास हुआ, तो फिर माफी मांगने और ट्वीट डिलीट करने का सिलसिला शुरू हुआ। लेकिन, फिर भी श्रद्धांजलि देने वालों की संख्या माफी मांगने वालों के मुकाबले कहीं ज्यादा रही।     
  • 7.      मूल कार्य पर पड़ता नकारात्मक प्रभाव:  सोशल नेटवर्किंग साइटें नई पीढ़ी के लोगों को जोड़ने का अच्छा जरिया भले ही हों, मगर इसके कई नुकसान भी झेलने पड़ रहे हैं। इंडस्ट्री चैंबर एसोचौम ने दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई, इंदौर, मुंबई, पुणे, चंडीगढ़ और कानपुर में करीब 4,000 कार्पोरेट कर्मचारियों द्वारा दिए गए जवाब पर आधारित अपनी एक नई स्टडी के आधार पर बताया है कि कार्पोरेट सेक्टर के कर्मचारी दफ्तरों में हर रोज औसतन एक घंटा वक्त ट्विटर और फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटों पर बरबाद कर रहे हैं, जिससे उनकी करीब साढ़े 12 फीसदी प्रोडक्टिविटी यानी उत्पादकता पर खासा असर पड़ रहा है। इसी कारण कई आईटी कंपनियों ने इन साइटों का इस्तेमाल बंद करने के लिए अपने सिस्टम्स में साफ्टवेयर लगा दिए हैं।                                                                
  • 8.      रिश्तों में विश्वास का अभाव:  अक्सर सोशियल नेटवर्किंग साइट्स पर दोस्ती के साथ ही खासकर लड़के-लड़कियों में मित्रता के खूब रिश्ते बनते हैं। ऐसे अनेक वाकये चर्चा में भी रहते हैं कि अमुख ने फेसबुक जैसी सोशियल साइट्स के जरिये बने रिश्तों को विवाह के बंधन में तब्दील कर दिया, अथवा शादी के नाम पर धोखाधड़ी हुई। वर्चुअल मोड में बातचीत होने की वजह से कई बार बेमेल संपर्क बनने की बात भी प्रकाश में आई। लेकिन दूसरी ओर भाई-बहन जैसे रिश्तों को यहां कमोबेश नितांत अभाव ही दिखता है। एक फेसबुक मित्र के अनुसार अनेक लड़कियां उनकी वॉल पर भाई का संबोधन करती हैं, पर रक्षाबंधन के दिन मात्र एक ने उन्हें ऑनलाइन राखी का फोटो टैग किया।                               
  • 9.      फ्लर्ट का माध्यमः  सच्चाई यह है कि सोशियल साइट्स पर अधिकांश युवा खासकर आपस में फ्लर्ट ही कर रहे हैं। यहां तक कि इंटरनेट पर कई ऐसी साइट्स भी तैयार हो गई हैं जो युवाओं को सोशियल साइट्स पर फ्लर्ट करना सिखा रही हैं।                                                   
  • 10.  अश्लीलता को मिल रहा बढ़ावा:  सोशियल नेटवर्किंग साइट्स पर काफी हद तक अश्लीलता को बढ़ावा मिल रहा है। आप यहां अपनी बहन की सुंदर फोटो भी लगा दें तो उस पर थोड़ी देर में ही ऐसी-ऐसी अश्लील टिप्पणियां आ जाऐंगी, कि आपके समक्ष शर्म से उस फोटो को हटा लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहेगा।                                                                           
  • 11.  प्राइवेसी को खतरा:  सोशल नेटवर्किंग साइट्स अक्सर उपयोगकर्ता की निजी जिंदगी का आइना होती हैं। यही वजह है कि कंपनियां भी आजकल अपने कर्मचारियों की व्यक्तिगत जिंदगी के बारे में जानने के लिए ऐसी सोशियल वेबसाइट्स में घुसपैठ कर रही हैं। इस तरह कर्मचारियों की प्राइवेसी खतरे में है। कई कंपनियां अपने यहां कर्मचारियों को तैनात करने से पूर्व उनके सोशियल साइट्स के खातों को भी खंगाल रही हैं, जहां से उन्हें अपने भावी कर्मचारियों के बारे में अपेक्षाकृत सही जानकारियां हासिल हो जाती हैं। इसी तरह शादी-विवाह के रिश्तों से पूर्व भी लोग सोशियल साइट को देखने लगे हैं।
  • सोशल मीडिया के नकारात्मक प्रभावों पर सोशल मीडिया पर कुछ रोचक चुटकुले भी बेहद चर्चित हो रहे हैं :
  • 1.      पहले दो लोग झगडते थेतो तीसरा छूडवाने जाता था. आजकल तीसरा वीडियो बनाने लगता है ।
  • 2.      ट्विटर, फेसबुक और व्हाट्सएप अपने प्रचंण्ड क्रांतिकारी दौर से गुजर रहा है कि हर नौसिखीया क्रांति करना चाहता है
  • §  कोई बेडरूम में लेटे लेटे गौहत्या करने वालों को सबक सिखाने की बातें कर रहा है तो……
  • §  किसी के इरादे सोफे पर बैठे-बैठे महंगाई-बेरोजगारी या बांग्लादेशियों को उखाड फेंकने के हो रहे हैं
  • §  हफ्ते में एक दिन नहाने वाले लोग स्वच्छता अभियान की खिलाफत और समर्थन कर रहे हैं ।
  • §  अपने बिस्तर से उठकर एक गिलास पानी लेने पर नोबेल पुरस्कार की उम्मीद रखने वाले लोग बता रहे हैं कि मां बाप की सेवा कैसे करनी चाहिये ।
  • §  जिन्होंने आज तक बचपन में कंचे तक नहीं जीते वह बता रहे हैं कि भारत रत्नकिसे मिलना चाहिए ।
  • §  जिन्हें गली क्रिकेटमें इस शर्त पर खिलाया जाता था कि बॉल कोई भी मारे पर अगर नाली में गयी तो निकालना उसे ही पड़ेगा वो आज कोहली को समझाते पाये जायेंगे कि उसे कैसे खेलना है ।
  • §  देश में महिलाओं की कम जनसंख्या को देखते हुये उन्होंने नकली ID बना कर जनसंख्या को बराबर कर दिया है ।
  • §  जिन्हें यह तक नहीं पता कि हुमायूं बाबर का कौन था वह आज बता रहे हैं कि किसने कितनों को काटा था ।
  • §  कुछ दिन भर शायरियाँ ऐसे पेलेंगे जैसे गालिबके असली उस्ताद तो वे ही हैं।
  • §  जो नौजवान एक बालतोड़ हो जाने पर रो-रो कर पूरे मोहल्ले में हल्ला मचा देते हैं वह देश के लिये सर कटा लेने की बात करते दिखेंगे ।
  • §  इनके साथ किसी भी पार्टी का समर्थक होने में समस्या यह है कि बिना एक पल गंवाए भाजपासमर्थक को अंधभक्त, ‘आपसमर्थक को उल्लूऔर काँग्रेससमर्थक को बेरोजगारकरार दे देते हैं।
  • §  जिन्हें एक कप दूध पीने पर दस्त लग जाते हैं, वे हेल्थ की टिप दिए जा रहे हैं
  • §  वहीँ  समाज के असली जिम्मेदार नागरिक नजर आते हैं टैगिये’, इन्हें ऐसा लगता है कि जब तक ये गुड मॉर्निंग वाले पोस्ट पर टैग नहीं करेंगे तब तक लोगों को पता ही नही चलेगा कि सुबह हो चुकी है ।
  • §  जिनकी वजह से शादियों में गुलाब-जामुन वाले स्टॉल पर एक आदमी खड़ा रखना जरूरी होता है,वो आम बजट पर टिप्पणी करते पाये जाते हैं
  • §  कॉकरोच देखकर चिल्लाते हुये दस किलोमीटर तक भागने वाले पाकिस्तान को धमका रहे होते हैं कि-अब भी वक्त है सुधर जाओ
  • 3.      पहले लोग घर पर आते थे तो उन्हें पानीके लिए पूछने वाले बच्चे अच्छे माने जाते थे। अब आते ही मोबाईल चार्ज करने के लिए पूछने वाले बच्चे अच्छे माने जाते हैं। आगंतुक भी कहीं पहुंचते ही मोबाइल चार्जर ही पहले मांगता है।