Wednesday, 17 January 2024

नदी का किनारा और उस पर बहता मन

नदी का किनारा और उस पर बहता मन 
******************************

क्या हम उन चीज़ों को खो सकते हैं, जो महत्वपूर्ण हैं? मुझे लगता है कभी नहीं। महत्वपूर्ण चीजें हमेशा बनी रहती हैं। हम खोते केवल उन चीज़ों को हैं जो हमें लगता था कि महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वास्तव में बेकार थी, जैसे कि नकली ताकत जिसका इस्तेमाल हम प्यार की ऊर्जा पर काबू करने के लिए करते हैं।


क्यों, ओह, वह मुझसे बात क्यों नहीं करेगी? वह परेशान लग रही है। यह क्या हो सकता है? मैंने क्या कहा? मैंने क्या किया? मुझे किसी से पूछना चाहिए, लेकिन किससे? मैं अपना सिर खुजा रहा हूं, याद करने की कोशिश कर रहा हूं,

या शायद भूलने की बीमारी और आत्मसमर्पण का दिखावा करें? एक ऐसी घटना थी जिसने शायद उसे परेशान कर दिया होगा। मैंने सच्चा होने की कोशिश की, लेकिन मैं बेहतर कर सकता था। यही सब तो होता है जब हमारा दिमाग उधेड़बुन करता है। 

नदी किनारे बैठने से जैसे जमीन से रिश्ता टूट जाता है। घण्टों चुप बैठने के बाद सोचूँ कि इतनी देर क्या सोचा तो समझ नही आता। खुले आसमां के नीचे मन उड़ता-उड़ता गुजरे वक्त में पहुँच जाता है। मेरे कितने प्रिय लोगों के साथ कितना कुछ अप्रिय गुजर गया। कैसे बताऊँ कि उन संग क्या हुआ ? 

मेरे कितने अपने लोग इस दुनिया से हमेशा के लिए चले गए फिर भी मैं अपने मोबाइल से बरसों बाद भी, अब जब उनके मोबाइल नम्बर सर्विस में नही है, उनके नम्बर डिलीट नही कर पाया। कांटेक्ट लिस्ट में बेमतलब हो चुका उनका नाम उनके भौतिक अस्तित्व की खुरचन के रूप में मेरे पास है। 

मेरा मन गुजर चुके लोगों के लिए कम, उनके पीछे अकेले छूटे लोगों के लिए ज्यादा रोता है। किसी को अपना जीवन आधार बना लेना, उसके लिए दिन-रात व्याकुल रहना, अपनी हर खुशी में उसे ऐसे ढूँढना जैसे अंधेरे कमरे की दीवार में कोई स्वीच बोर्ड टटोले। 

कल्पना करिए उस कमरे में स्वीच बोर्ड ही ना हो। प्रेम साथ है तो रौशनी है। मगर बिछड़ जाए तो ? पीछे छूटे लोग जिनका जीने का सलीका हमेशा के लिए बदल गया के प्रति विकलता अधिक महसूस होती है। उनके लिए अब होली बदरंग हो गई, दिवाली मद्धम हो गई, पूरी दुनिया मरघट सी वीरान हो गयी। हर जश्न बेमतलब, हर कामयाबी बेमानी हो गई। स्मृतियों के प्रवाह में नदी किनारे बैठे उम्र का पानी उल्टी दिशा में बहने लगा । नदियाँ हजार परतों में छिपाकर रखा खालीपन बाहर ले आती है। एक ख्वाहिश है कि बागेश्वर का सरयू घाट (बगड़) हो और मैं लहरों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलूं और हाथ में मेरे भोले बाबा जी हाथ हो। हकीकत मे गर नही हो सकता तो ख्वाबों में ही एक मुलाकात हो। बहता पानी भीतर जाने क्या अवरुद्ध करता है ? नदी के पास कौन सी आदिम भाषा है जो वो हर बार अंतस को पुकार लेती है ? 

“घट गया क्या क़ुबूल करने में, 
मैं भी अव्वल हूँ भूल करने में।
जी भी कर सकते थे पर लगे हैं हम, 
ज़िंदगी को फ़ज़ूल करने में॥”

Tuesday, 16 January 2024

राम यत्र-तत्र, सर्वत्र हैं..


भारत में सबके अपने-अपने राम है। गांधी के राम अलग हैं, लोहिया के राम अलग, बाल्मीकि और तुलसी के राम में भी फर्क है। कबीर ने राम को जाना, तुलसी ने माना, निराला ने बखाना। राम एक है, पर राम के बारे में द्दष्टि सबकी अलग है। त्रेता युग के श्रीराम त्याग, शुचिता, मर्यादा, संबंधों और इन संबंधों से ऊपर मानवीय आदर्शों की वे प्रतिमूर्ति है, जिनका दृष्टांत आधुनिक युग में भी अनुकरण करने के लिए दिया जाता है। 


ऐसे ही अतीत की एक घटना अक्सर मुझे याद आती है। जितना मैं राम को पढ़ पाया उस आधार पर, राम रावण युद्ध अनवरत जारी था। एक दिन युद्ध भूमि में राम का रण कौशल क्षीण हो रहा था। वो जो भी बाण चलाते वह अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाता। भगवान राम को लगा कि अब पराजित हो जाऊंगा। 

तब भगवान राम युद्ध भूमि में दिव्य दृष्टि से देखे की वास्तव में आज क्या कारण है कि आज युद्ध में मेरा प्रभाव क्षीण हो रहा है। तो उन्होंने देखा कि ओह आज तो साक्षात मां दुर्गा (शक्ति) रावण के रथ पर आरूढ़ है। तब राम किसी भी तरह युद्ध की आचार संहिता अर्थात् सूर्यास्त तक इंतजार किए।

 युद्ध से लौटकर जब उस दिन राम रात्रि विश्राम के समय अपने सेना नायकों के साथ शिला पट्टा पर बैठे थे तो पहली बार उनके नेत्र से आंसू गिरे। इस घटना से आहत होकर जामवंत ने पूछा प्रभु क्या बात है आज आपके नेत्र से आँसू? इस पर राम ने मात्र इतना ही बोला कि अब ये युद्ध मैं जीत नहीं पाऊंगा।

भगवान राम ने कहा कि जब पूरी सृष्टि जानती है कि मैं सत्य की रक्षा के लिए युद्धरत हूँ तो फिर शक्ति को मेरे साथ होना चाहिए। आज दुर्गा अन्यायी के साथ है। “जिधर अन्याय शक्ति उधर” यही मेरे आत्मीय कष्ट का कारण है। भगवान राम ने देवी की स्तुति की और उन्हें अंततः त्याग और समर्पण से अपने पक्ष में कर लिया।

कालांतर में यह कहानी फिर से दोहराई जा रही है इस बार भी रावण के साथ शक्ति है। रावण ने भगवान राम से कहा कि मैं तुम्हे बंद कर दूंगा। राम घबरा गए है कि मैं तो हर मनुष्य में हूं, यह मुझे दीवारों के बीच बंद करने की साजिश रच रहा है। 

भगवान राम फिर से उदास है फिर से आंखें बह रही हैं। युद्ध में राम एक बार फिर पराजित होते दिख रहे हैं लेकिन यकीन मानिए भगवान राम ही अंततः जीतेंगे रावण शक्तिहीन होगा।

जय श्री राम 🙏🏻

घुघुती

सदियों से हमारे कुमाऊं क्षेत्र में एक विशेष तरीके से मनाया जाने वाला उत्सव जो मौसम के बदलाव और प्रवासी पक्षियों की वापसी का संकेत देता है। इसे काले कौवा (काले कौवे) या घुघुती (एक अन्य स्थानीय पक्षी का नाम) का त्योहार कहा जाता है। लोग आटे, गन्ने की चीनी और घी से डीप-फ्राइड व्यंजन बनाते हैं। मीठे आटे को अनार, ड्रम, ढाल और तलवार के आकार में बनाया जाता है। एक बार जब वे पक जाते हैं, तो आकृतियों को हार बनाने के लिए पिरोया जाता है जिसे घुघुती (पक्षी का समान नाम) कहा जाता है, जिसके बीच-बीच में एक नारंगी (छोटा संतरा) भी पिरोया होता है। बच्चे सुबह उठकर इन्हें पहनते हैं। 


बच्चे बाहर जाते हैं और कौवों को ज़मीन पर लौटने का निमंत्रण देते हैं— 
“काले काले, भूल बाटे अइले!" 
(काले, काले, अब घर आओ!) 

बच्चे पक्षियों को अपने हार से भोजन देते हैं और बदले में आशीर्वाद मांगते हैं। पक्षियों को प्रसाद चढ़ाने के बाद, बच्चों को दिन भर उनके हार पहनने को मिलते हैं और वे जब चाहें तब भोजन खाते हैं। मजाल है इस दिन कौवा लाख बुलाने पर भी आ जाये। तब से हमारे यहां एक कहावत प्रसिद्ध है, “घुघुतियक जै काव कस अकड़ रो”। पर आज पक्षियों का वह निमंत्रण तुरन्त बिन बुलाए मेहमान बंदर स्वीकार कर बच्चों को डरा उनकी माला ही लपक ले रहे हैं। 

मीठे आटे से यह पकवान जिसे 'घुघुत' नाम दिया गया है। सदियों से चली आ रही परम्परा के अनुरूप आज भी इसकी माला बनाकर बच्चे मकर संक्रांति के दिन अपने गले में डालकर कौवे को बुलाते हैं और कहते हैं -
 
'काले कौवा काले घुघुति माला खा ले'।
'लै कौवा भात में कै दे सुनक थात'।
'लै कौवा लगड़ में कै दे भैबनों दगड़'।
'लै कौवा बौड़ मेंकै दे सुनौक घ्वड़'।
'लै कौवा क्वे मेंकै दे भली भली ज्वे'।

पारम्परिक पर्वों का अद्भुत अनुभव लेने एक बार आप भी देवभूमि अवश्य आइए। यहां के स्नान, ध्यान, ज्ञान व पकवान आपको अभिभूत कर देंगे। यहां कि समृद्ध संस्कृति व विरासत आपको अभिभूत कर देगी। 

#HapppyGhughuti2024 
#uttarayani #makarsankranti2024

Friday, 5 January 2024

मैं अभी सतह पर हूँ



तुम कहते हो के पढ़ लेते हो चेहरा मेरा, कितना हसीन झूठ है, मग़र कहते रहो। जैसे तुम्हें भ्रम है वैसे मुझे भी हमेशा भ्रम रहा है कि मैं चेहरे पढ़ लेता हूँ। लोगों की आँखों में देख कर उनके एहसास जान लेता हूँ, उनके दुखों को टटोल कर पता कर लेता हूँ कि अभी पके हैं या नहीं। 


लेकिन यह भ्रम टूट रहा है, मैं अभी सतह पर हूँ। लोगों के चेहरों पर कई परतें हैं। पहले एक हँसी का मुखौटा है, फिर एक मेकअप की तह है, मेकअप के नीचे उसका फाउंडेशन है जो झूठ को पकड़ कर रखता है। फाउंडेशन के नीचे त्वचा है, त्वचा के नीचे मौसम भरे हुए हैं - झूमता हुआ सावन है, सिसकता हुआ पतझड़ है, गीली सी बारिशें हैं और इन मौसमों से गुज़रते हुए रिश्ते हैं, उम्मीदें हैं, अपेक्षायें हैं, तोड़े हुए वायदे हैं। इन सबके बीच जहाँ तहाँ सुख और दुःख के फिंगर प्रिंट्स हैं, ये प्रमाण एक दूसरे से उलझे हुए हैं, गुँथे हुए हैं। इनको अलग करना मेरे उँगलियों के बस की बात नहीं है। 

मैं इन सब परतों के नीचे जाकर सच्चाई तलाश करूँ तो शायद ख़ुद दब जाऊँगा एहसासों के मलबे में। मैंने तय किया है कि मैं अब सतह की लकीरों को छूकर बस अपने मन की बात कह दूँगा। बस इतना कह दूँगा कि हम सब मुखौटे हैं, कह दूँगा कि जो तुम्हारे साथ हुआ है वह किसी और के साथ भी हुआ है, कह दूँगा कि सब सवालों के जवाब नहीं मिलेंगे, कह दूँगा कि जीवन यूँ ही चलता रहेगा। और जो यह सब नहीं कह पाया तो लिखूँगा कविताएँ जो सोख ली जाएँगी इन सारी परतों में और मेरे नहीं होने के बाद भी साथ चलेगी इन चेहरों के, चेहरे जो कह नहीं पाते सच्चाई, चेहरे जो बुतों में जान नहीं डालते। चेहरे जो मुझसे कुछ ख़ास अलग नहीं हैं। इस जहां में दोस्त रोता वही है जिसने सच्चे रिश्ते को महसूस किया हो, वरना मतलब का रिश्ता रखने वालों की आंखों में न शर्म होती है और न पानी। 


Monday, 25 December 2023

कल जब मैं बूढ़ा हो जाऊँगा


मुझे आज एक कन्फेशन करना है। मुझे कई बार संगीत बोर कर दे रहा है आजकल। ठीक-ठाक लगने वाला गाना भी मैं 1 मिनट से ज्यादा नहीं सुन सकता। कुछ महीनों पहले तक मुझे लिखते वक्त देर रात संगीत के चलने से दिक्कत नहीं होती थी। लेकिन अब मेरा ध्यान भंग हो जाता है। फिर सोचता हूँ समाज के वर्तमान परिदृश्य को तो मेरी रूह काँपने लगती है। आज अपने समाज के हालात देख सोच रहा हूँ……..


कल जब मैं बूढ़ा हो जाऊँगा, एकदम जर्जर बूढ़ा, तब तू क्या थोड़ा मेरे पास रहेगा? मुझ पर थोड़ा धीरज तो रखेगा न? मान ले, तेरे महँगे काँच का बर्तन मेरे हाथ से अचानक गिर जाए या फिर मैं सब्ज़ी की कटोरी उलट दूँ टेबल पर, मैं तब बहुत अच्छे से नहीं देख सकूँगा न! मुझे तू चिल्लाकर डाँटना मत प्लीज़! बूढ़े लोग सब समय ख़ुद को उपेक्षित महसूस करते रहते हैं, तुझे नहीं पता?

एक दिन मुझे कान से सुनाई देना बंद हो जाएगा, एक बार में मुझे समझ में नहीं आएगा कि तू क्या कह रहा है, लेकिन इसलिए तू मुझे बहरा मत कहना! ज़रूरत पड़े तो कष्ट उठाकर एक बार फिर से वह बात कह देना या फिर लिख ही देना काग़ज़ पर। मुझे माफ़ कर देना, मैं तो कुदरत के नियम से बुढ़ा गया हूँ, मैं क्या करूँ बता?

और जब मेरे घुटने काँपने लगेंगे, दोनों पैर इस शरीर का वज़न उठाने से इनकार कर देंगे, तू थोड़ा-सा धीरज रखकर मुझे उठ खड़ा होने में मदद नहीं करेगा, बोल? जिस तरह तूने मेरे पैरों के पंजों पर खड़ा होकर पहली बार चलना सीखा था, उसी तरह?

कभी-कभी टूटे रेकॉर्ड प्लेयर की तरह मैं बकबक करता रहूँगा, तू थोड़ा कष्ट करके सुनना। मेरी खिल्ली मत उड़ाना प्लीज़। मेरी बकबक से बेचैन मत हो जाना। तुझे याद है, बचपन में तू एक गुब्बारे के लिए मेरे कान के पास कितनी देर तक भुनभुन करता रहता था, जब तक मैं तुझे वह ख़रीद न देता था, याद आ रहा है तुझे?

हो सके तो मेरे शरीर की गंध को भी माफ़ कर देना। मेरी देह में बुढ़ापे की गंध पैदा हो रही है। तब नहाने के लिए मुझसे ज़बर्दस्ती मत करना। मेरा शरीर उस समय बहुत कमज़ोर हो जाएगा, ज़रा-सा पानी लगते ही ठंड लग जाएगी। मुझे देखकर नाक मत सिकोड़ना प्लीज़! तुझे याद है, मैं तेरे पीछे दौड़ता रहता था क्योंकि तू नहाना नहीं चाहता था? तू विश्वास कर, बुड्ढों को ऐसा ही होता है। हो सकता है एक दिन तुझे यह समझ में आए, हो सकता है, एक दिन!

तेरे पास अगर समय रहे, हम लोग साथ में गप्पें लड़ाएँगे, ठीक है? भले ही कुछेक पल के लिए क्यों न हो। मैं तो दिन भर अकेला ही रहता हूँ, अकेले-अकेले मेरा समय नहीं कटता। मुझे पता है, तू अपने कामों में बहुत व्यस्त रहेगा, मेरी बुढ़ा गई बातें तुझे सुनने में अच्छी न भी लगें तो भी थोड़ा मेरे पास रहना। तुझे याद है, मैं कितनी ही बार तेरी छोटे गुड्डे की बातें सुना करता था, सुनता ही जाता था और तू बोलता ही रहता था, बोलता ही रहता था। मैं भी तुझे कितनी ही कहानियाँ सुनाया करता था, तुझे याद है?

एक दिन आएगा जब बिस्तर पर पड़ा रहूँगा, तब तू मेरी थोड़ी देखभाल करेगा? मुझे माफ़ कर देना यदि ग़लती से मैं बिस्तर गीला कर दूँ, अगर चादर गंदी कर दूँ, मेरे अंतिम समय में मुझे छोड़कर दूर मत रहना, प्लीज़!

जब समय हो जाएगा, मेरा हाथ तू अपनी मुट्ठी में भर लेना। मुझे थोड़ी हिम्मत देना ताकि मैं निर्भय होकर मृत्यु का आलिंगन कर सकूँ। चिंता मत करना, जब मुझे मेरे सृष्टा दिखाई दे जाएँगे, उनके कानों में फुसफुसाकर कहूँगा कि वे तेरा कल्याण करें। तुझे हर अमंगल से बचायें। कारण कि तू मुझसे प्यार करता था, मेरे बुढ़ापे के समय तूने मेरी देखभाल की थी।

मैं तुझसे बहुत-बहुत प्यार करता हूँ रे, तू ख़ूब अच्छे-से रहना। इसके अलावा और क्या कह सकता हूँ, क्या दे सकता हूँ भला।

समाज का असल भाव यही है, असली मकसद यही है। मन की इच्छा यही है, दिन-रात की सोच यही है। बाकी भाईचारा, कुल-खानदान, परिवार की एकता, धर्म और मजहब खतरे में है का नारा... सब झूठ, मक्कारी और पाखंड है। 

क्या मैं 'मर्दे-नादाँ' (कृपया इससे जुड़े शेर का संदर्भ लें, जो पोस्ट के नीचे लिखा है) की कतार में तो नहीं आ गया?

“फूल की पत्ती से कट सकता है हीरे का जिगर
मर्दे-नादाँ पर कलामे-नर्म-ओ-नाजुक बेअसर।” 

फोटो- मैं, Kailash Baba, Harish Nagarkoti

Sunday, 26 November 2023

गगनचुंबी छवि की तलाश-


‘चलो कहीं भरपूर विकास दिखाया जाए, सियासी मिट्टी पर सीमेंट उगाया जाए।’ कुछ इसी तरह के उदाहरणों का मिट्टी परीक्षण होता रहा है और वर्तमान सरकार ने भी निरीक्षण-परीक्षण की जिरह पैदा करते हुए, उत्तराखंड में प्रगति का मुआयना शुरू किया है। संस्थानों की डिनोटिफिकेशन के बाद यह तो साबित हो रहा है कि चुनावी जुबान ने सत्तापक्ष की दिलदारी के नक्शे पर ऐसा नुकसान कर दिया जो प्रदेश के बूते से बाहर है।


ऐसे वक़्त में जब उत्तरकाशी स्थित सिल्क्यारा की धसकी हुई सुरंग में 14 दिनों से 41 मजदूर फंसे पड़े हैं, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गगन में लड़ाकू विमान में बैठकर उड़ान भर रहे हैं। पिछले करीब एक हफ्ते से लग रहा था कि अंधेरी सुरंग में मजदूर कभी भी बाहर आ सकते हैं, लेकिन हर गुजरता दिन बेनतीजा साबित हो रहा है। इन सबसे बेपरवाह मोदीजी के उत्साह में कोई कमी नहीं आई है। एक राज्य से निकलकर दूसरे राज्य में चुनावी रैलियों को सम्बोधित करते हुए राजस्थान में गुरुवार की शाम को प्रचार अभियान थमने के तुरन्त बाद मोदी मथुरा पहुंचे जहां उन्होंने ब्रज रज उत्सव के नाम से आयोजित मीरा जन्मोत्सव में हिस्सा लिया। फिर वे शुक्रवार की अल्लसुबह कृष्णजन्मभूमि में उस स्थान पर भगवा वस्त्र धारण कर पहुंचे जहां श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। दूसरी तरफ शनिवार को सुरंग में बचाव अभियान इसलिये रुक गया क्योंकि ड्रिलिंग के दौरान ऑगर मशीन की ब्लेड सरियों से टकराकर टूट गई। अब मलबे को हाथ से हटाये जाने की तैयारी है और मजदूरों को बाहर का सूरज देखने के लिये अभी इंतज़ार करना पड़ सकता है।

मोदीजी के पास एक और डबल इंजिन वाले राज्य उत्तराखंड की सुरंग में फंसी 41 ज़िंदगियों के लिये चिंता करने का समय नहीं है। उन्हें आकाश में उड़ान भरकर पहले अपनी छवि को गगनचुंबी जो बनाना है।


वो 41 मज़दूर, अगर चंद्रयान-3 पर सवार होते तो 22 वें दिन चंद्रमा की कक्षा में पहुंच गये होते। लेकिन पिछले 16 दिनों से, वे ज़मीन के नीचे सुरंग में क़ैद हैं। उन्हें धरती की सतह पर भी वापस नहीं लाया जा सका है।

ये केवल उनके भविष्य की बात नहीं है। कल इन्हीं हिमालयी सुरंगों से होकर, बसों, कारों, रेल वगैरह में सवार, हज़ारों टूरिस्ट, तीर्थ यात्री और यहाँ के आम पहाड़ी लोग यात्राएं करेंगे। यकीन मानिये हम में से किसी के लिए भी, कोई चंद्रयान नहीं आयेगा।


साहब, युवा वोटर मांगे रोज़गार—



किसी भी देश व समाज के संतुलित विकास में उस देश के नियम व कानून बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। भारत में इन कानूनों-नियमों का शासन शास्त्र संविधान कहलाता है। शासन प्रशासन की शक्तियों का स्त्रोत हमारा भारतीय संविधान अपने आप में एक विशेष आयाम रखता है जिस आधार पर ही यह विश्व का सबसे लम्बा व विस्तृत संविधान होने का गौरव प्राप्त है। भारतीय संविधान निर्माण की गाथा ऐतिहासिक रही है।


जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की प्रक्रिया जारी है, वहां युवा नौकरियों और रोजगार का मुद्दा खूब गूंज रहा है। सिर्फ इसी आधार पर राजनीतिक दलों को कितना जनादेश प्राप्त होगा, यह कहना अनिश्चित है, लेकिन दलों के घोषणा-पत्रों में सरकारी नौकरियों को लेकर आश्वासन प्रमुख रूप से बांटे गए हैं। भाजपा या कांग्रेस के अलावा, मिजोरम की क्षेत्रीय पार्टियों को भी वायदा करना पड़ा है कि उनकी सरकार युवाओं के लिए इतनी सरकारी नौकरियां और रोजगार के अवसर पैदा करेगी। रोजगार के क्षेत्र में बड़े घोटाले सामने आ रहे हैं कि किस सरकार के दौरान कितने पेपर लीक कराए गए। अव्वल तो सरकारी नौकरियों में भर्ती की परीक्षाएं लटकाई जाती रही हैं। यदि परीक्षा हो गई, तो उनके नतीजे अनिश्चित अंधेरों में डूब जाते हैं। यदि परीक्षाओं के बाद सफल चेहरों को नियुक्ति-पत्र मिल भी गए, तो ज्वाइनिंग में आनाकानी की जाती रही है। अंतत: अदालतों में धक्के खाने पड़ते हैं और वहां भी सब कुछ अनिश्चित है। इन धांधलियों और घपलों पर युवा मतदाता सरकारी नौकरियों को लेकर पूरी तरह आश्वस्त कैसे हो सकता है? घोषित राजनीतिक आश्वासनों पर जनादेश दिए जाएंगे, सरकारें बनेंगी, उसके बाद नौकरी या रोजगार का वायदा, समयबद्ध और चरणबद्ध तरीके से, पूरा नहीं किया गया, तो युवा वोटर क्या कर सकते हैं? जनादेश तो पांच साल के लिए होता है। पांच साल के बाद राजनीतिक परिदृश्य और समीकरण क्या होंगे, पार्टियां इन चिंताओं में दुबली नहीं हुआ करतीं। अलबत्ता युवाओं के सामने आंदोलन का रास्ता जरूर खुला है।

उनसे पूर्ण न्याय कब मिला है? बहरहाल तेलंगाना में कांग्रेस ने ‘जॉब कलैंडर’ तय करने का वायदा किया है। भाजपा ने तेलंगाना लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं के मद्देनजर पारदर्शी और समयबद्ध समाधान देने का वायदा किया है। दोनों दलों को तेलंगाना में जनादेश मिलने के आसार नहीं हैं। राजस्थान में उन युवाओं को समर्थन दिया जा रहा है, जिन्होंने सरकारी नौकरियों में भर्ती की निरंतर और सिलसिलेवार देरी के खिलाफ आवाज उठाई है। तेलंगाना और राजस्थान में युवा बेरोजगारी दर क्रमश: 15.1 फीसदी और 12.5 फीसदी है, जो देश भर में सर्वाधिक हैं। कमोबेश बेरोजगारी की राष्ट्रीय दर करीब 8 फीसदी से तो ज्यादा है। राजस्थान लोक सेवा आयोग की परीक्षाएं विवादों और घोटालों में संलिप्त रही हैं। लगातार पेपर लीक, परीक्षा परिणामों में धांधलियों, कानूनी पचड़ों के कारण बीते चार साल में 8 परीक्षाएं रद्द करनी पड़ी हैं। मध्यप्रदेश में आज भी ‘व्यापम घोटाले’ की गूंज सुनाई देती है। हालांकि अब यह उतना प्रासंगिक चुनावी मुद्दा भी नहीं है। पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे 2022-23 के मुताबिक, मप्र में युवा बेरोजगारी की दर चुनावी राज्यों में सबसे कम 4.4 फीसदी है। तेलंगाना, राजस्थान और मिजोरम (11.9 फीसदी) में युवा बेरोजगारी की दर राष्ट्रीय दर से अधिक है। छत्तीसगढ़ में यह दर 7.1 फीसदी है। बेशक सरकारी नौकरियों और रोजगार के बेहतर अवसरों के आश्वासन सभी राजनीतिक दलों ने बांटे हैं, लेकिन युवा मतदाताओं की चिंताओं, प्रतिबद्धताओं और उनके सरोकारों पर ‘राजनीति’ ज्यादा की जा रही है। महिलाओं में बेरोजगारी की दर अधिक और गंभीर है। बहरहाल ये आंकड़े और संकेत चिंताजनक हैं।