Sunday, 31 May 2020

साबुन लाल हो या नीला उसका झाग हमेशा सफेद क्यों होता है?
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बहुत दिनों से मन में एक ख्याल रह-रह के परेशान कर रहा था आंखिर साबुन लाल हो या नीला उसका झाग हमेशा सफेद क्यों होता है? स्कूल टाईम पर कहीं पढ़ा तो था, पर ठीक से याद नही आ रहा था। चलो आज इस पर विस्तार पूर्वक वार्ता करते हैं कभी आपको भी ऐसे ही अटपटे से ख्याल आये तो ज़रूर साँझा कीजिएगा। उस पर भी चर्चा कर प्रकाश डालने की पूरी कोशिश करूँगा। चलिए अब सीधे मुद्दे पर आते हैं -
टीवी पर आने वाले साबुन के विज्ञापनों पर अगर आप ध्यान दें तो आपको पता चलेगा कि उन सब में दावे भले ही अलग-अलग रहते हों लेकिन एक चीज, एक जैसी ही रहती है. यह चीज है साबुन का झाग। साबुन की गुणवत्ता बताने के साथ टीवी विज्ञापनों को रूमानियत देने या खूबसूरत बनाने के लिए झाग उड़ाने के दृश्य जरूर दिखाए जाते हैं। इन विज्ञापनों से अलग भी हम सब अपने बचपन में मौज-मजे के लिए साबुन का झाग और गुब्बारे बनाकर खेल चुके हैं। हर साबुन-शैंपू-डिटर्जेंट के साथ यह बात भी देखी जा सकती है कि वे चाहे किसी रंग के हों, उनका झाग हमेशा सफेद ही होता है।
बचपन में ही विज्ञान की पढ़ाई के दौरान यह नियम सिखाया-समझाया जाता है कि किसी वस्तु का अपना कोई रंग नहीं होता। उस पर जब प्रकाश की किरणें पड़ती हैं तो वह बाकी रंगों को सोखकर जिस रंग को परावर्तित करती है, वही उसका रंग होता है। यही नियम कहता है कि जब कोई वस्तु सभी रंगों को सोख लेती है तो वह काली और सभी रंगों को परावर्तित करती है तो सफेद दिखती हैं।

साबुन का झाग सफेद दिखाई देने के पीछे भी यही कारण है। झाग कोई ठोस पदार्थ नहीं है। इसकी सबसे छोटी इकाई पानी, हवा और साबुन से मिलकर बनी एक पतली फिल्म होती है। यह पतली फिल्म जब गोल आकार ले लेती है, हम इसे बुलबुला कहते हैं। दरअसल साबुन का झाग बहुत सारे छोटे बुलबुलों का समूह होता है।
साबुन के एक बुलबुले में घुसते ही प्रकाश किरणें अलग-अलग दिशा में परावर्तित होने लगती हैं। यानी उसके अंदर प्रकाश किरणें किसी एक दिशा में जाने के बजाय अलग-अलग दिशा में बिखर जाती हैं। यही कारण है कि साबुन का एक बड़ा बुलबुला हमें पारदर्शी सतरंगी फिल्म जैसा दिखाई देता है। अगर ऐसे किसी बुलबुले में से प्रकाश किरणें एक ही दिशा में लौटतीं तो यह कागज की तरह सफेद दिखाई देता।
झाग बनाने वाले छोटे-छोटे बुलबुले भी इसी तरह की सतरंगी पारदर्शी फिल्मों से बने होते हैं। लेकिन ये इतने बारीक होते हैं कि अव्वल तो इनमें हम सातों रंगों को नहीं देख पाते, वहीं दूसरी ओर इनमें प्रकाश इतनी तेजी से घूमता है कि ये एक ही समय पर तकरीबन सभी रंगों को परावर्तित करते रहते हैं। इसलिए यहां पर रंगों से जुड़ा विज्ञान का वही नियम लागू होता है जिसके मुताबिक कोई वस्तु अगर सभी रंगों को परावर्तित कर दे तो उसका रंग सफेद दिखाई देगा। इस तरह साबुन का झाग हमें सफेद दिखाई देता है।

अब इस सवाल के एक दूसरे महत्वपूर्ण हिस्से की तरफ आते हैं कि साबुन का रंग झाग में क्यों नहीं दिखता? दरअसल साबुन जब पानी में घुलता है तो उसका रंग तो छूटता ही है। अगर आप कांच के किसी पारदर्शी बर्तन में पानी रखकर साबुन उसमें घोल दें तो आप पाएंगे कि उस घोल का रंग साबुन के रंग जैसा ही होता है, लेकिन मूल रंग के मुकाबले काफी हल्का हो जाता है। वहीं जब इस पानी से बुलबुला बनता है तो इसको बनाने वाली फिल्म में यह रंग इतना हल्का हो चुका होता है कि वह हमें दिखाई नहीं देता। यानी कि अब ये बुलबुले उस रंग के प्रकाश को परावर्तित नहीं करते और यही वजह है कि साबुन लाल हो या नीला उसका झाग हमें सफेद ही दिखाई देता है।

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सरकार गोरी हो या भूरी सोचने का तरीका अमूमन एक जैसा होता है।
— भारत में 11 ऐसे अकाल पड़े जिसमें हर बार लाखों लोगों की मृत्यु हुई

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महामारियों से हमारा नाता सदियों पुराना रहा है, यह तस्वीर 1943 के अकाल की है, जिस अकाल में बंगाल के लगभग 40 लाख लोगों की मौत हो गयी थी। कहा जाता है कि यह अकाल उस वक़्त के ब्रिटिश पीएम विंस्टन चर्चिल की गलत नीतियों की वजह से पड़ा था। कई इतिहासकारों ने इसे मानव जनित होलोकॉस्ट की संज्ञा दी है। यह द्वितीय विश्व युद्ध का वक़्त था। चर्चिल ने बड़े पैमाने पर भारतीय खाद्यान्न की आपूर्ति मोर्चे पर तैनात ब्रिटिश फौजियों के लिये कर दी थी। उस वक़्त चर्चिल ने कहा था, कुपोषित बंगालियों की भूख से जरूरी मजबूत यूनानियों की भूख का इंतजाम करना है। भारत से उस साल 2.7 मिलियन टन खाद्यान्न का निर्यात किया गया था।
जब भारत में अकाल पीड़ितों की मौत का आंकड़ा काफी अधिक हो गया। तब भी चर्चिल नहीं पिघला, उसने कहा, मरने वाले खुद जिम्मेदार हैं। वे खरगोश की तरह बच्चे पैदा करते हैं। चर्चिल ने कहा, यह कैसा अकाल है, जब गांधी की ही मौत नहीं हुई।
अकाल या ऐसी ही आपदाओं के वक़्त अंग्रेज सरकार का यह संवेदनहीन रवैया कोई नई बात नहीं थी। शशि थरूर की पुस्तक द डार्क एरा के मुताबिक अंग्रेजों के 200 साल के राज के दौरान भारत में 11 ऐसे अकाल पड़े जिसमें हर बार लाखों लोगों की मृत्यु हुई। अनुमानतः लगभग 3.5 करोड़ लोगों की इस दौरान मृत्यु हुई।


हर बार अंग्रेज सरकार की गलत नीतियों की वजह से ये अकाल पड़े। मगर अपनी गलती स्वीकारना और उसका निराकरण करना तो दूर। हर बार अंग्रेज सरकार ने इस दौरान पीड़ित लोगों को किसी भी किस्म का राहत देने से इनकार कर दिया। हर बार कहा जाता कि राहत अभियान चलाना स्वतंत्र बाजार के सिद्धांतों का उल्लंघन होगा, इसके अलावा यह भी कहा जाता जिस रकम का बजट में उल्लेख नहीं है उसे खर्च नहीं किया जाना चाहिये। इसके अलावा बार बार मेल्थस के उस सिद्धांत का जिक्र किया जाता, जिसके मुताबिक अधिक जनसंख्या का निराकरण प्रकृति इस तरह करती है।
1866 में ओडिशा के अकाल के दौरान जब सरकार द्वारा खाद्य पदार्थों की कीमत कम न करने के प्रयासों की आलोचना होने लगी तो बंगाल के तत्कालीन गवर्नर बीडन ने कहा कि अगर मैं ऐसा करता हूँ तो मुझे एक डाकू समझा जाना चाहिये। दिलचस्प जानकारी यह है कि उस साल जब 15 लाख लोगों की मौत हुई थी, तब 20 करोड़ पाउंड चावल ब्रिटेन को निर्यात किया गया।
इसके अलावा अंग्रेज आपदाओं में राहत अभियान चलाने के भी सख्त विरोधी थी। अकालों में जब लोगों की अत्यधिक मौत होने लगती और लंदन के बौद्धिक तबका भारत के ब्रिटिश अधिकारियों से सवाल पूछता तो वे कहते कि अगर आप बिल पे करने के लिये तैयार हैं तो मैं आपकी तरफ से राहत अभियान चला सकता हूँ। एक ब्रिटिश अधिकारी ने अपने पैसों से राहत अभियान चलाने की कोशिश की तो सरकार ने उसके खिलाफ कार्रवाई कर दी।
यह सब किस्से शशि थरूर की किताब द डार्क एरा में पढ़ रहा हूँ। पढ़ते हुए मालूम होता है कि सरकार गोरी हो या भूरी सोचने का तरीका अमूमन एक जैसा होता है। इस कोरोना और लॉक डाउन काल में मौजूदा सरकार के कई फैसलों की झलक इन ऐतिहासिक संदर्भों में नजर आती हैं।

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अदृश्य युद्ध के दौर में चुनौतियां हौसलों से ही हारा करती हैं,
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निश्चित ही यह एक अकल्पनीय समय है। वह घटित हो रहा है, जो किसी ने कभी सोचा तक नहीं था। आगे बढ़ती हुई एक सदी अचानक थम गई, बीती हुई सदी अपने तमाम जख्मों के साथ फिर प्रकट हो गई। फिर वही भूख, पलायन, गरीबी और बेबसी, बेबसों का वही रेला।

कश्मीर से कन्याकुमारी तक दुख और दर्द का समुंदर ठाठे मार रहा है। हर कोई आवाक् है, बदहवास है। क्या मजदूर, क्या मालिक, क्या शासन, क्या प्रशासन...हर पल एक नयी चुनौती सामने आती है, रूप बदल बदल कर नयी नयी मुश्किलें नुमाया होती हैं...लेकिन जंग जारी है। इनसान लड़ रहा है। जीत रहा है।
यह समय पूरी दुनिया पर कहर बनकर टूट रहा है। पूरी दुनिया में श्रम पर जिंदा रहने वाले लोग मुश्किल में हैं। भारत में भी कोरोना से उपजी परिस्थितियों ने प्रवासी श्रमिकों को सड़क पर ला दिया है। घर लौट रहे हजारों-हजार मजदूरों का रेला हर रोज एक राज्य से दूसरे राज्य दाखिल हो रहा है।
कोरोना की आहट मिलने के तुरत बाद से ही सरकार और समाजसेवी पीडि़तों को राहत पहुंचाने की कोशिश में जुटे हुए हैं। दूसरे प्रदेशों में कमाने-खाने गये मजदूरों की सुरक्षित घर वापसी के लिए ट्रेनों-बसों का इंतजाम करने, उनसे संपर्क बनाए रखने, उन्हें क्वारंटाइन करने और क्वारांटाइन की अवधि में उनकी सेहत तथा सुविधाओं का खयाल रखने में बडा़ अमला जुटा हुआ है। एक सीमा से दूसरी सीमा तक पहुंचाने के लिए वाहनों का प्रबंध करने में भी सैकडो़ लोग जिसमें ज़िला प्रशासन, स्वास्थ्य, परिवहन आदि के साथ सामाजिक संगठन लगे हुए हैं। तपती हुई दोपहरियों में, संक्रमण के तमाम खतरों के बीच, वे भी मजदूरों के पसीनों में अपना पसीना मिला रहे हैं। अपने परिवार से दूर रहकर वे भी अपनी सामाजिक जिम्मेदारियां पूरी कर रहे हैं।
कोरोना के विषाणुओं की तरह चुनौतियां भी अदृश्य हमले करती हैं। चौक-चौराहों पर अपनी संवेदनाओं की ढाल लेकर तैनात योद्धा इनसे पल-पल मुकाबिल है। इस कठिन लडा़ई में कभी कभी चुनौतियां भी भारी पड़ सकती हैं। असंख्य लोगों के भोजन और वाहनों के इंतजाम में समय की ऊंच-नीच हो सकती है। लेकिन यह समय कमी निकालने का नही बल्कि काम करने वालों को प्रोत्साहित करने और उनका हौसला बढ़ाने का है ।यह एक युद्ध है और युद्ध को युद्ध की तरह ही देखना और लड़ना होगा। चुनौतियां हौसलों से ही हारा करती हैं, हर हाल में हमें अपने योद्धाओं का हौसला बनाए रखना होगा।
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मैं जन्मजात पहाड़ी हूँ कोरोना से कम विशेषज्ञों से ज्यादा डरता हूं। आप न डरने का निर्देश देकर और भी डरा रहे हैं।
- एक कोरोना और करोड़ों बातें, हम भारतीय समय की चिंता नहीं करते,

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कोरोना महामारी है। महामारी की इस अवधि में हजारों विद्वान व विशेषज्ञ प्रकट हो गए हैं। हमारे जैसे लोग हलकान हैं। ढेर सारे विद्वान, ढेर सारे विशेषज्ञ, ढेर सारे चैनल। पुराना फिल्मी गीत याद आता है- किस किस को प्यार करूं? टीवी पर बहसे ही बहसें। एक विशेषज्ञ ने कहा कि कोरोना का विषाणु गर्मी के ताप में झुलस जायेगा। हमने अपनी मित्रमण्डली में विषय रखा। मैंने गर्मी के प्रभाव का अपना ज्ञान जोड़ा। गपशप अंतिम चरण में थी कि विषय का ज्ञान न रखने वाले एक अन्य विशेषज्ञ ने कहा कि सरकारी प्रवक्ता ने इस विचार का खण्डन कर दिया है। एक विशेषज्ञ ने बताया कि यह वायरस प्राकृतिक नहीं है। चीन की प्रयोगशाला में इसका जन्म हुआ। हम यह बात मानने को तैयार ही हो रहे थे कि चीन ने इस बात से इंकार कर दिया। मैं क्या करता? जब बाप ही अपनी औलाद को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है तो आप क्या कर लोगे? लेकिन दूसरे विशेषज्ञ ने ज्ञान जोड़ा कि चीन ने जानबूझकर यह वायरस नहीं पैदा किया। प्रयोग का उद्देश्य दूसरा था। दूसरे विशेषज्ञ ने कहा कि सही जो भी हो, बच्चा तो चीन का ही है।



अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प चीन पर गुस्सा हो गये। आपने इसकी सूचना क्यों नहीं दी? यह भी कोई बात हुई कि आपके घर नाटी ब्वाय का जन्म हुआ और आप छुपाए रहे। विशेषज्ञ इस विषय की आगे की चर्चा की जिम्मेदारी ट्रम्प पर छोडक़र आगे बढ़े। न कोरोना से जुड़े विषय कम और न विशेषज्ञ कम। फिर इसी बीमारी की दवा के रूप क्लोरोक्वीन बहस का विषय बनी। कुछ विशेषज्ञों ने अडंगा लगाया। बताया कि यह नुकसानदेह है। अगले ने कहा कि बीमारी पर इसका प्रभाव सुविदित है। विशेषज्ञ बीमार और बीमारी के पक्ष विपक्ष में लड़ते झगड़ते थकते थकते भी राय दे रहे हैं। इसी बीच कई देशों से खबर उड़ी कि इसकी दवा खोज ली गई है। इससे आशावाद बढ़ा विशेषज्ञों ने कहा इसमें कम से कम दो वर्ष लगने वाला है। फिर रोग निरोध शक्ति’’ नाम की प्राचीन भारतीय धारणा नए रूप में प्रकट हो गई। शरीर में रोगों से लडऩे की क्षमता का ज्ञान वैदिक काल से है। वैदिक ऋषि १०० वर्ष से ज्यादा लम्बी आयु के अभिलाषी थे। विशेषज्ञों ने रोग निरोधक क्षमता की बाते शुरू की तो योग विशेषज्ञ गहरी सांस लेकर मैदान में आ गए। बता रहे हैं कि इस आसन से वह अंग शक्ति पाता है और उस आसन से यह। कोरोना तो भी अजर अमर।


हम प्राचीन काल से स्वच्छता प्रेमी हैं। विशेषज्ञों ने कोरोना से बचाव के लिए हाथ धोते रहने का ज्ञान दिया। उन्होंने २० सेकेण्ड का समय जोड़ा। कैसे नापें २० सेकेंड। हम भारतीय समय की चिंता नहीं करते। लेकिन सौभाग्य से कई गुणी ज्ञानी टीवी पर पधारे। उन्होंने साबुन के झाग को प्रत्येक अंगुली में ले जाकर विधिपूर्वक हाथ धोए। बोले २० सेकेंड हो गए। यह ज्ञान उपयोगी है। एक साबुन कम्पनी को अपने साबुन के प्रचार का मौका मिला। विशेषज्ञ हाथ धोकर पीछे पड़े हैं। विशेषज्ञों के सामने ढेर सारी समस्याएं है। प्रश्नावली बड़ी है। क्या कोरोना वायरस जूतों से भी फैलता है? एक ने कहा कि जूतों पर भी कुछ समय तक रहता है। अब जूते डराने लगे। जूतों को घर के बाहर ही उतारने की भारतीय परंपरा पुरानी है। घर के हर कोने जूते चलेंगे तो परिणाम सुखद कैसे होंगे? फिर खबर उड़ी कि खबरें देकर खबरदार करने वाले अखबारों से भी कोरोना के वायरस फैल सकते हैं। विशेषज्ञ मौन रहे। सोचा होगा कि अखबार के सम्पादक बुरा मानेंगे तो विशेषज्ञों की विशेषज्ञता कैसे सिद्ध होगी। इस खबर से मैं भी डर गया। मैं न्यूनतम अखबार पढ़ता हूं। कई अखबारों में लिखता छपता भी हूं। लेकिन अखबारों में इसका खण्डन छपा। अखबार सुरक्षित हैं। इस विषय पर विशेषज्ञों का मौन ही अच्छा ज्ञान है।
परस्पर दूर रहने से बचाव का उपाय सबने माना लेकिन एक ही कमरे वाले घरों के निवासी क्या करें? लाखों मजदूरों के किराए के आवास बहुत छोटे हैं। मुम्बई का धारावी त्रासद स्थिति में है। सरकार भी परेशान है। जीवन यहां सामूहिक है। ऐसे सघन आबादी वाले नगरों में सरकार भी परस्पर दूरी का नियम कैसे लागू करें? प्रवासी मजदूर भूखे हैं। वे घर जाने के लिए तड़प रहे हैं। हजारेां मजदूर हजार डेढ़ हजार किलोमीटर दूर अपने गांवो के लिए पैदल जा रहे हैं। पुलिस इनसे अच्छा बर्ताव नहीं करती। इनमें से कुछ रास्ते में ही दम तोड़ रहे हैं। ऐसे दृश्य भावुक करते हैं। इस आस्था को प्रश्न वाचक बनाते हैं। विशेषज्ञ बेकार का ज्ञान झाड़ रहे हैं। वे ७० साल पुराने संवैधानिक तंत्र पर अर्थचिंतन नहीं करते। मैं स्वयं इसी संविधान तंत्र का हिस्सा हूं। ७० साल में भी हम सब मजदूरों को स्थानीय स्तर पर रोजगार क्यों नहीं दे सके? उत्तराखंड सरकार ने प्रवासी मजदूरों को घर लाने के अच्छे उपाय किए है। अन्य राज्य भी प्रयासरत हैं। मूलभूत प्रश्न दूसरे हैं कि श्रम बेचने के लिए मजदूर स्थानीय स्तर पर रोजगार क्यों नहीं पा सकते? और उन्हें स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार की व्यवस्था हम ७० साल के बावजूद क्यों नहीं कर सके? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इसी ध्येय पर सक्रिय हैं। यह स्वागत योग्य है।
विशेषज्ञ डरा रहे हैं। कुछ मौतों का विश्लेषण बता रहे हैं। कुछ खांसी को भी कोरोना से जोड़ रहे हैं। वे खांसने के समय दायें-बांए कंधे में मुंह छुपाने के परामर्श दे रहे हैं। छींकना अपने देश में पहले से अशुभ माना जाता है। विशेषज्ञ छींक के प्रभाव की दूरी बता रहे हैं। कुछ कमरे की सिटकिनी पर भी वायरस का अड्डा बता रहे हैं। लिफ्ट के बटन को वायरस का खतरनाक आवास बता रहे हैं। कोरोना हर जगह है। यहां, वहां, आगे, पीछे, ऊपर, नीचे। विशेषज्ञों का ज्ञान भय पैदा कर रहा है। वे कहते हैं कि डरना मना है। अजीब बात है। आप ही डरा रहे हैं। आप ही न डरने का निर्देश दे रहे हैं। आप न डरने का निर्देश देकर और भी डरा रहे हैं। मैं भी नागरिक हूँ हम बिना प्रयास ही आज अपने जीवन के आधे वर्ष पूरे कर रहे हैं। अब तक पढ़ता सुनता आया हूं कि जवानी खतरनाक होती है। जवानी में कदम डगमगाते हैं। विशेषज्ञ जवानी पर चुप हैं। कोरोना काल में बूढ़ों को भारी खतरा बता रहे हैं। सो खांसी आते ही डर जाता हूं। विशेषज्ञों की मानें तो बड़ी उम्र में रोगनिरोधक शक्ति घटती है। मेरी रोग निरोधक शक्ति ठसाठस है। मित्रों के कहने से गिलोय, तुलसी, काली मिर्च आदि का काढ़ा पी रहा हूं। विशेषज्ञ कृपया बताएं कि यह शक्ति जरूरत से ज्यादा बढ़ गई तो क्या होगा? उन्होंने पहले से ही डरा रखा है यह एक नया डर हो सकता है।



विशेषज्ञों की न डरने की सलाह ने चौकन्ना किया है। वे अन्य डरों के साथ में कह रहे हैं कि अवसाद से भी बचिए। अवसाद आदि रोगों के मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञ भी तमाम परामर्श देने को तत्पर हैं। वे अवसाद का कारण व निदान बता रहे हैं। लेकिन हमारा डर नहीं घटता। मैं जन्मजात पहाड़ी हूँ कोरोना से कम विशेषज्ञों से ज्यादा डरता हूं। क्या पता कौन विशेषज्ञ बिना पूछे ही परामर्श देने लगे कि लाकडाउन में पुस्तकें पढऩा अवसाद बढ़ाता है। वह बता सकते हैं कि इस समय ९० प्रतिशत पुस्तक पढऩे वाले लोगों में अवसाद के लक्षण देखे गए हैं कि अवसाद के लक्षण वाले ५२ प्रतिशत लोगों में कोरोना के संक्रमण की संभावना है। आंकड़े निर्मम होते हैं। कृपया डराने वाले आंकड़े न दीजिए। शराबबंदी खुलने वाले दिन उमड़ी भीड़ कहां डरी थी? सारा ज्ञान, शिष्टाचार लतियाते हुए कहीं कहीं पुलिस की लात खाते हुए भी वे दारू को ही श्रेष्ठ मानते रहे। विशेषज्ञ यहां भी नहीं चूके। उन्होंने एक दिन में ही बिकी दारू के आंकड़े बता ड़ाले। पीने के बाद हुए उत्पात के आंकड़ों की प्रतीक्षा है। सतर्कता की बात ही ठीक है। डराना सही नहीं।डर के आगे ही जीत है।
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जिंदगी हमेशा सुविधाजनक नहीं होती, नई जीवनशैली में ढलकर करनी होगी नई शुरुवात।
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लॉकडाउन-5 में ढील दिए जाने या खत्म होने के बाद जीवनशैली फिर पुराने ढर्रे पर लौटेगी? क्या हम कोविड-19 से पहले की तरह बाहर जा पाएंगे? क्या पहले ही तरह मॉल-सिनेमा जा पाएंगे, क्या कोई पार्टी होगी, क्या कोई लॉन्ग ड्राइव होगा, कोई प्रवचन, धर्मसभा या मन्दिरों के दर्शन होंगे? क्या निकट भविष्य में सडक़ों पर भीड़, खचाखच भरा सार्वजनिक परिवहन, रेलवे स्टेशन पर जबरदस्त भीड़, बस अड्डों पर लोगों की कतारें, एयरपोर्ट पर लोगों की भीड़, ऑफिस, कैंटीन्स, रेस्तरां, शॉपिंग मॉल्स, रिक्शा में बच्चे, स्कूल में बच्चे और भी कई दृश्य हैं जिनके बिना जीवन असंभव-सा लगता है। पूरे विश्व में कोविड-19 की महामारी एवं कहर ने सबकुछ बदल दिया है। जो पहले हमारी जीवन का अपरिहार्य हिस्सा था, वह सबकुछ अब एक अलग दुनिया की चीज हो गयी है। एक बड़ा प्रश्न है कि हम कब अपनी पहले वाली जीवनशैली की ओर लौटेंगे।

लेकिन हमें अभी लम्बे समय तक ऐसे ही जीवन की आदत को बरकरार रखना होगा। यह हमारे लिये परीक्षा की घडिय़ा है, बड़ी चुनौती है। कोरोना महासंकट की विजय गाथा को रचते हुए हमें इस विश्वास को जिन्दा करना होगा कि कोरोना की चुनौतियों को देखकर हम डर कर विपरीत दिशा में नहीं, बल्कि उसकी तरफ भागें। क्योंकि डरना आसान है, पर जितनी जल्दी हम चुनौतियों को अपने पैरों तले ले आयेंगे, उतनी जल्दी हम इस डर से मुक्त हो जायेंगे, जीवन के असंभव हो गये अध्यायों को संभव कर पाएंगे। अभी हमारे सामने अंधेरा ही घना है, निराशा के बादल ही मंडरा रहे हैं। क्योंकि जो भी मौजूदा संकेत हैं, उनसे यही पता चलता है कि कोविड-19 का वैक्सीन और इलाज अभी तक मिला नहीं है, उसके मिलने तक शहरी लोगों का जीवन लॉकडाउन के दौरान वाला ही होगा। भले ही चाहे प्रतिबंधों को हटा ही क्यों न दिया जाए। और कई जगह यह छह माह से एक साल तक रहने वाला है। अभी हम घर के अंदर रहने वाली दुनिया में हैं। घर से काम कर रहे हैं। जरूरी चीजों की खरीददारी के लिए भले ही चेहरा और नाक ढके घर से बाहर निकल रहे हैं। फिर भी सोशल डिस्टेसिंग एवं आत्मसंयम ही जीवन का हिस्सा बने रहने वाला है।



कोरोना महामारी एक तात्कालिक, वास्तविक और विराट त्रासदी है, एक महाप्रकोप है, जो हमारी आंखों के सामने घटित हो रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और दुनिया के स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि कोरोना महामारी जल्द खत्म होने वाली नहीं है। विशेषज्ञों तो यह भी कहना है कि इसके नियंत्रित होने या थम जाने के बाद भी हमें बदले तरीके से ही जीवन को जीना होगा। इस संकट ने कई जीवन-मानक एवं सोच के दायरे बदल दिये हैं। अपनी रोजमर्रा की खुशियों से पहले उनके जोखिम का आकलन जरूरी हो गया है। कौन वैज्ञानिक या डॉक्टर मन ही मन में किसी चमत्कार के लिए प्रार्थना नहीं कर रहा है? कौन पुजारी, तांत्रिक, धर्मगुरु हैं जो मन ही मन में विज्ञान के आगे समर्पण नहीं कर चुका है? और कोरोना वायरस के इस संक्रमण के दौरान भी कौन है जो पक्षियों के गीतों से भर उठे शहरों, चौराहों पर नृत्य करने लगे मयूरों, प्रकृति की खिलखिलाहट एवं आकाश की नीरवता पर रोमांचित नहीं है? बदल तो सब गया है। यह बदलाव ही है कि इस महामारी के कहर के दौर में एक गरीब इंसान की बीमारी एक अमीर समाज के स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर रही है। बड़े-बड़े धनाढ्य एवं महाशक्तिशाली भी घुटने टेकते हुए दिखाई दिये। कई मोटीवेशनल लोग निकट भविष्य में ज्यादा समझ एवं सहयोग वाली दुनिया की उम्मीद कर रहे हैं तो दुनिया के अधिक संकीर्ण एवं स्वार्थी होने की संभावनाएं भी व्यक्त की जा रही है। शासन-व्यवस्था एवं प्रणालियों पर भी ग्रहण लगता हुआ दिखाई दे रहा है, महाशक्तियां निस्तेज एवं धराशायी होते हुए दिखाई दे रहे हैं, तानाशाही के पनपने एवं लोकतांत्रिक मूल्यों में बिखराव के भी संकेत मिल रहे हैं।
कोरोना चुनौतियों के डर बहुत हैं। हम अपनी बंधी-बंधाई जिंदगी पर लगे घुन से परेशान और बेचैन हैं। अचानक हमारी ऊर्जा कम होने लगी है, काम करने का उत्साह घट गया है, आत्मविश्वास दरकने लगा है। साठ प्रतिशत लोग नई चुनौतियों के आगे कुछ ऐसा ही महसूस कर रहे हैं। यह अस्वाभाविक नहीं है। पर इससे बच कर भागना या हार मान जाना रास्ता नहीं है। हमें पहले से अपने को तैयार करना होगा कि हम एक ढर्रे पर ना चलें। नए की चुनौतियों को स्वीकार करें। क्योंकि वास्तव में जब वैक्सीन की खोज हो जाएगी तब भी इससे रोगियों को निरोगी करने में समय लगेगा। क्योंकि सबसे पहले हमें इसकी पर्याप्त मात्रा उपलब्ध करानी होगी। अगर कई दवा कंपनियां एकसाथ मिलकर काम करें और उसका उत्पादन करें तब भी धरती पर रहने वाले करीब 8 अरब लोगों को तुरंत इससे इम्युनिटी हासिल होना मुश्किल होगा। इसमें सालों लगेंगे। क्या कोई सरकार सबकुछ खोलने का खतरा मोल लेगी? यह संभव नहीं लगता।

अमेरिका की प्रथम महिला रही मिशेल ओबामा ने कहा भी था, ‘जिंदगी हमेशा सुविधाजनक नहीं होती। ना ही एक साथ सभी समस्याएं हल हो सकती हैं। इतिहास गवाह है कि साहस दूसरों को प्रेरित करता है और आशा जिंदगी में अपना रास्ता स्वयं तलाश लेती है।’ समस्या जितनी ही बड़ी होती है, उतनी बड़ी जगह उसे हम अपने मन में देते हैं। ये हमारी बड़ी दिक्कत है कि हमें बुरी बातें पहले दिखती हैं, अच्छी बाद में। हर विजेता के पास अपने आगे आने और चुनौतियों से निपटने की एक कहानी होती है। डर उन्हें भी लगता है। पर वे जल्दी से उसका मुकाबला करना सीख लेते हैं। हमारे सामने ऐसी स्थिति आ गई है, तो उससे भागने के बजाय अपने अंदर झांके, संयम, अनुशासन एवं परिष्कृत सोच का परिचय देते हुए समस्या के मूल को समाप्त करने की दिशा में आगे बढ़े। हर शताब्दी में एक महामारी ने इंसानी जीवन को संकट में डाला।
प्लेग का इतिहास हमारे सामने है। पन्द्रहवीं शताब्दी के मध्य में आई ब्लैक डेथ की बीमारी ने यूरोप का नक्शा ही बदल दिया, लेकिन उस समय अंधेरों के बीच रोशनी की तलाश हुई। अनेक सामाजिक-आर्थिक एवं जीवनगत बदलाव हुए, सोचने-समझने एवं शासन-व्यवस्थाओं के तरीके अधिक लोकतांत्रिक, वैज्ञानिक एवं जीवनमूल्यों पर आधारित बनाये गये। क्या हम कोरोना महामारी के सामने खड़े विश्व को बचाने के लिये एक मानवीय अर्थव्यवस्था, सादगी-संयममय जीवनशैली, प्रकृतिमय जीवन की ओर नहीं बढ़ सकते?

याद करिए 1918 के स्पैनिश फ्लू को। यह गर्मी के महीने में थम तो गया था लेकिन सर्दियों में इसका दूसरा वेव आ गया था। ऐसा ही कोरोना को लेकर संभव है, चीन में हमने देखा भी है। जापान के होक्काइदो में हमने देखा, जापान ने कोविड-19 जैसे आपात स्थिति से बेहतर तरीके से निपटा। इसने स्थिति पर अच्छे से नियंत्रण पाया और सभी प्रतिबंधों को हटा दिया। स्कूल फिर से खुल गए, रेस्तरां आम दिनों की तरह खुल गए, लेकिन कोविड-19 के दूसरे वेव ने जल्दी ही इस द्वीप पर ज्यादा ताकत से हमला किया और यहां पहले चरण की तुलना में ज्यादा सख्ती से लॉकडाउन लागू करना पड़ा।
हमारे सामने एक बड़ा सवाल है कि क्या हम ऐसी जिंदगी जी सकते हैं जो हमारे भूख का ख्याल रखे, लोलुपता का नहीं? हमारी जरूरतों का ख्याल रखे, लालच का नहीं? क्या हम शहरों में साईकल से आ-जा सकते हैं? क्या हम घरों से काम करने की पद्धति को प्रोत्साहन दे सकेंगे?

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Saturday, 4 August 2018

बागेश्वर कुंवारी गांव के ग्रामीणों के लिए आफत बनी बारिश l

बागेश्वर जिले में लगातार हो रही बारिश से जहां आम जनजीवन पूरी तहर से प्रभावित है। वहीं भूस्खलन से पूरी तहर प्रभावित कुंवारी गांव के लिए बारिश आफत बन कर टूटी है। सड़कें बंद होने के चलते गांव का संपर्क जिला मुख्यालय से पूरी तरह टूट चुका है। आज़ादी के इतने सालों बाद भी जहाँ सरकारें बड़े - बड़े दावे करती नज़र आती है, पर हालत कुछ और ही बायाँ करती नज़र आई जब आज के समय में भी कुंवारी गांव में एक गर्भवती महिला को ग्रामीण पैदल लकडी के स्टेचर पर 22 किलोमीटर दूर चमोली जनपद के थराली स्वास्थ्य केंद्र में ले जाने को मजबूर है ।इस दौरान महिला की जानपर बन आई थी।






वही पर्व विधायक ललित फ़र्स्वाण ने सरकार व क्षेत्रीय विधायक को आड़े हाथो लेते हुये कहा कि सरकार के आपदा की तैयारियों की पोल खुलती नजर आ है, कि कैसी तैयारियाँ शासन स्तर पर की गयी थी । वो सब धरातल पर नज़र आने लगा है ।



मौसम विभाग के अलर्ट के बाद जिले में लगातार बारिश हो रही है। बागेश्वर जिले का दूरस्थ गांव कुंवारी उच्च हिमालयी क्षेत्र में बसा है। इस गांव के पूर्व में भूस्खलन में आने के चलते सरकार द्वारा पूरे गांव का विस्थापन करने के बात कही गई थी। लेकिन लम्बा समय बीत जाने के बाद भी प्रशासन अब तक विस्थापन की व्यवस्था नहीं कर पाए हैं। प्रशासन की लापरवाही के चलते ग्रामीण दहशत में जिन्दगी विताने को मजबूर हैं।  ग्रामीण सड़क, पानी तथा स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हो गए हैं। वहीं कुंवारी गांव के 106 परिवार भूस्खलन की जद में हैं। अभी तक प्रशासन पूरे गांव का विस्थापन नहीं करा पाया वहीं प्रशासन की भारी लापरवाही के चलते कुंवारी गांव की एक 22 वर्षीय गर्भवती महिला अनीता देवी को ग्रामीणों द्वारा लकड़ी का स्टेचरा बना कर 22 किलोमीटर दूर थराली विधानसभा के देवाल अस्पताल पहुंचाया गया। तब जा कर महिला की जान बच पाई। गनीमत रही कि समय रहते ग्रामीण उसे अस्पताल पहुंचा पाए। अस्पताल में महिला का सुरक्षित प्रसव हुआ और जच्चा-बच्चा की जान बच पाई। वहीं गांव में अभी 6 अन्य गर्भवती महिलाएं हैं। लेकिन गांव में स्वास्थ्य से जुड़ी सुविधाएं मौजूद नहीं हैं। जिसके चलते गर्भवती महिलाओं की जान जोखिम में है। लेकिन प्रशासन इसके लिए अभी तक गम्भीर नहीं है। जब्कि स्वास्थ्य विभाग आपदा ग्रस्त क्षेत्र कुंवारी गांव की महिलाओं को कपकोट अस्पताल लाने को दावा करता  रहा है। ग्राम प्रधान किशन सिंह दानू ने बताया कि जिला प्रशासन ग्रामीण की अनदेखी कर रहा है। अभी तक ना ही प्रशासन द्वारा आपदा प्रभावित परिवारों का विस्थापन किया गया है और ना ही स्वास्थ्य, खाद्यान्न जैसी मूलभूत सुविधाओं को उपलब्ध नहीं करा पाया है। प्रशासन की अनदेखी से ग्रामीणों में भारी रोष है। वहीं पूर्व विधायक ललित फर्स्वाण के साथ ग्रामीणों का दल जिलाधिकारी से मिला। ग्रामीणों ने गांव की समस्याओं से उनको अवगत कराया। पूर्व विधायक ने बताया कि लगातार हो रहे भूस्खलन से ग्रामीण डर के साए में जीने को मजबूर हैं। गर्भवती महिलाओं के साथ प्रशासन की अनदेखी को बिलकुल भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि जल्द से जल्द ग्रामीणों को सुरक्षित स्थान पर विस्थापति किया जाए साथ ही गांव में स्वास्थ्य और खाद्यान्न जैसी मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराई जाएं।




आपदा ग्रस्त गांवों के विस्थापन और महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर सरकार भले ही लाख दावे कर ले लेकिन कुंवारी जैसे गांव सरकार के दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। शासन-प्रशासन की लापरवाही के चलते कुंवारी गांव में कभी भी माल्पा और ला-झेकला जैसा हादसा होने की सम्भावना है।

एक पुल न बनने से पिंडारी ग्लेशियर नहीं जा पा रहे हैं पर्यटक l

बागेश्वर जिले के पिंडर घाटी में वर्ष 2013 में आई आपदा के बाद से आज तक भी ग्लेशियरों के रास्ते नहीं सुधर सके हैं। ग्लेशियरों के रास्तों में पुलों का काम जहां काफी धीमी गति से चल रहा है वहीं रास्तों की दशा भी ठीक नहीं हुवी है। पिंडारी ग्लेशियर से एक पढ़ाव पहले द्वाली के पास अभी तक पुल नही बन सका है। जिसके चलते देशी—विदेशी पर्यटकों को निराश होकर आधे रास्ते से ही वापस लौटना पड़ रहा है। 


पिंडारी ग्लेशियर को देखने की चाहत से यूक्रेन से तेरह सदस्यों का एक दल यहां आया। इस दल ने हिमालया टूर आउटडोर एडवेंचर से जुड़े हिमांशु पांडे से संपर्क किया। बीते दिनों यह दल बागेश्वर से खर्किया होते हुए अंतिम गांव खाती पहुंचा। खाती से द्वाली को जब यह दल रवाना हुवा तो इन्हें टूटे रास्तों की वजह से काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। द्वाली के पास पिंडर और कफनी नदी में बने पैदल पुलों के बह जाने से दल को वापस लौटना पड़ा। वर्ष 2013 की आपदा में यहां द्वाली के पास बह गया पुल आज तक भी नहीं बन सका है। 




हांलाकि यूक्रेन के दल के सदस्यों को पिंडारी ग्लेशियर न देख पाने का मलाल तो है लेकिन वो यहां की खूबसूरत हंसीन वादियों से बहुत खुश हैं। इस दल ने खाती गांव के शीर्ष में पंखुवा बुग्याल के साथ ही धाकुड़ी के उप्पर चिल्ठा मंदिर का ट्रेक कर प्रकृति का आंनद उठाया। 




गौरतलब है कि 2013 की आपदा में पिंडर घाटी में काफी नुकसान पहुंचा था। पिंडर नदी में बने सभी पुल बाढ़ में बह गए थे। वर्तमान में तीख, रिटिंग, लेहबगड़ में पुल बन गए हैं लेकिन द्वाली में पुल अभी तक नहीं बन सका है। यहां पर कफनी और पिंडर नदी में पैदल कच्चे पुल बनाकर आना—जाना होता है। यह पैदल कच्चे पुल भी इस बार की बरसात में बह गए हैं। जिससे पर्यटक ग्लेशियरों के दीदार नहीं कर पा रहे हैं।