Sunday, 8 August 2021

कोरोनाकाल में ही नहीं अपने जीवन में फ़ेक समाचारों को पहचानिए ! कहीं आप किसी का भोजन बनने तो नहीं जा रहे हैं ?


इस कोरोनाकाल में जितने प्रयोग विषाणु पर चल रहे हैं, उतने हम-मानवों पर भी चल रहे हैं। हम-आप कैसे सोचते हैं, किस तरह की ख़बरों में बह जाते हैं और कैसे लोगों के कहे में आकर अपनी-अपनी राजनीतिक विचारधारा से चिपक जाते हैं। तो चलिए आज इस पर खुलकर बात करते हैं। समाचार व फेंक समाचार में कितना अन्तर होता है ? इसे कैसे पहचान सकते हैं ? इस पर हमें क्या करना चाहिए और क्या नही करना चाहिए ? 



1) समाचार का स्रोत देखिए। बताने वाला कौन है, उसकी  विषय-योग्यता क्या है। प्रस्तोता और विषय की जाँच से यह पहचान शुरू होती है। 

2 ) ख़बरों के केवल शीर्षकों पर न जाइए। अनेक बार लोग ख़बर को चटपटा बनाने के लिए ऊटपटांग हेडलाइन गढ़ रहे हैं।

3 ) आँफ़िशियल सह-स्रोत भी पढ़ें। एक जानकारी अनेक स्रोतों से होने पर स्पष्टतर होती है और सच-झूठ खुल जाता है।

4 ) कहीं ख़बर मज़ाक या व्यंग्य तो नहीं। अनेक बार हास-परिहास में भी बातें कह दी जा रही हैं।

5 ) आपके पूर्वाग्रह, आपके पूर्वविश्वास आपकी राय तय कर सकते हैं। आपकी राजनीतिक विचारधारा, आपकी सामाजिक स्थिति और आपके परिवार का प्रभाव भी आप पर पड़ता है।

6) विशेषज्ञों से प्रश्न भी करिए। विश्वसनीय स्रोतों से आपको सवाल करने चाहिए।

7) कुछ भी शेयर करने से पहले जानिए कि आप पैंडेमिक ही नहीं, इन्फोडेमिक से भी जूझ रहे हैं। जिम्मेदार नागरिक का कर्त्तव्य निभाइए ।

♦️फ़ेक समाचार तीन प्रकार के हो सकते हैं : 

1) पूर्णतः फ़ेक समाचार, जो एकदम कोरोनावायरस-अनजान लोगों को ठगने और गुमराह करने के लिए बनाये जाते हैं। इनके शिकार अवैज्ञानिक फंन्तासी-फ़िल्मी सोच वाले लोग होते हैं।

2) सत्य आँकड़ों और जानकारियों को आड़े-तिरछे और ग़लत ढंग से निष्कर्ष निकालकर परोसने वाले फ़ेक समाचार। इनके टारगेट पर पढ़े-लिखे, किन्तु अवैज्ञानिक सोच वाले लोग होते हैं। ध्यान रहे : डिग्री पा जाना और साइंटिफिक टेम्पर का विकास कर पाना --- दोनों एकदम अलग हैं। इस समय ढेरों सम्भ्रान्त लोग ज्ञानलिप्त फ़ेक समाचार पढ़कर उन्हें सच मान बैठे हैं।

3) यह भी हो सकता है कि समाचार प्रस्तुत करने वाला कुछ कहना चाह रहा हो और आप कुछ और समझ रहे हों‌। अगर आप डॉक्टर या वैज्ञानिक नहीं हैं, तो ऐसा होना लाज़िमी है। जिन बातों को ये लोग सालों-साल पढ़ते-समझते हैं, उन्हें आप एक लेख या पोस्ट से कैसे समझ सकते हैं ? इसलिए बार-बार पढ़िए। अनेक स्थानों से पढ़िए। किन्तु विश्वसनीय स्रोतों से पढ़िए , सनसनीखेज  स्रोतों से नहीं।

यह भी हो सकता है कि विज्ञान ही नयी जानकारी मिलने पर विषय को बेहतर समझ कर कुछ और राय देने लगे ? ध्यान रहे : इस समय दुनिया-भर की प्रयोगशालाएँ और अस्पताल शोधरत हैं और लगातार नयी जानकारियाँ पायी जा रही हैं। ऐसे में पुरानी जानकारी का परिष्करण, मण्डन और खण्डन, तीनों सम्भव हैं। विज्ञान का तरीका यही है, वह स्वयं को तार्किक ढंग से तोड़ता-फोड़ता आगे बढ़ता है।

स्वयं से प्रश्न करिए : इस पैंडेमिक की आँच में कहीं आपके मनोविज्ञान को पकाया तो नहीं जा रहा ? यदि हाँ, तो आप किसका भोजन बनने जा रहे हैं ? तो सोचिए आप कितने बुद्धिमान है ?

Saturday, 31 July 2021

शहीद उधम सिंह ने 21 साल बाद लिया था जलियांवाला बाग नरसंहार का बदला


देश आज महान शहीद ऊधम सिंह का बलिदान दिवस मना रहा है। ऊधम सिंह भारत माता के वह वीर सपूत हैं जिन्होंने अमृतसर के जलियांवाला बाग नरसंहार का बदला लेने के लिए उस समय पंजाब के लेफ्टिनेंट गर्वनर रहे माइकल ओ डायर की लंदन में जाकर गोली मारी थी। वो 26 दिसंबर का दिन था जब उन्हों्ने लंदन में डायर को गोली मारकर अपनी वर्षों पुरानी प्रतिज्ञा पूरी की थी। ऊधम सिंह को डायर की हत्या  के आरोप में 31 जुलाई, 1940 को फांसी दे दी गई थी। 


13 अप्रैल, 1919 को बैसाखी के दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक सभा रखी गई थी। शहर में कर्फ्यू लगे होने के बाद भी इसमें सैकड़ों लोग शामिल थे। बैसाखी के दिन मेला भी लगा था। बाग में भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। तभी ब्रिगेडियर जनरल माइकल ओ डायर सैनिकों को लेकर वहां पहुंचा। उसने वहां पर मौजूद निहत्थे। लोगों पर गोलियां चलाने का आदेश दे दिया। जलियांवाला बाग चारों तरफ से घिरा हुआ था भागने या जान बचाने का कोई रास्ताा नहीं था। कुछ लोग जान बचाने के लिए मैदान में मौजूद कुएं में कूद गए। देखते ही देखते वह कुआं भी लाशों से पट गया। ऊधम सिंह के जीवन पर इस नरसंहार का गहरा घाव था। तभी उन्होंने डायर से बदला लेने की ठान ली थी। 

पहचान छिपाकर पहुंचे थे लंदन

पंजाब के संगरूर जिले के गांव सुनाम में 26 दिसम्बर 1899 को पैदा हुए ऊधम सिंह जलियांवाला बाग हत्या कांड के वक्तं करीब 20 वर्ष के थे। जनरल डायर को जान से मारने के लिए उन्हेंग कई वर्षों का इंतजार करना पड़ा था। वो अपने परिवार में अकेले थे। उनके माता-पिता और भाई पहले ही दुनिया से जा चुके थे। ऐसे में उनके जीवन का केवल एक ही मकसद था, जनरल डायर की मौत। इसके लिए वो नाम बदल-बदल कर पहले दक्षिण अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका में रहे। वर्ष 1934 में वो पहचान छिपाकर अपना मकसद पूरा करने लंदन पहुंचे और वहां पर उन्होंकने एक कार और रिवॉल्वसर खरीदी। फिर, 13 मार्च, 1940 को एक सभा में हिस्सा ले रहे माइकल ओ डायर की हत्या कर दी। इसके लिए उन्हेंक 21 साल तक इंतजार करना पड़ा था।

शहीद ऊधम सिंह की अंतिम इच्छा शहादत के 34 वर्ष बाद फतेहगढ़ साहिब की धरती पर पूरी हुई थी। शहीद ऊधम सिंह को इंग्लैंड में फांसी दी गई थी। बाद में उनकी अस्थियों का कलश शहीदों की धरती फतेहगढ़ साहिब स्थित रोजा शरीफ में लाकर दफनाया गया था। इतिहासकारों अनुसार उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनका शव मुस्लिम समुदाय में मक्का का दूसरा रूप माने जाते रोजा शरीफ में दफनाया जाए। आज इस स्थान पर शहीद स्मारक बनी हुई है। हर साल शहीदी सभा के दौरान यहां आने वाले लोग देश की आजादी में अहम योगदान देने वाले इस महान योद्धा की वीरगाथा से रू-ब-रू होते हैं।

प्रेमचंद को पढ रहे हो और आपकी आँख गीली न हुई हो!



प्रेमचन्द का लगभग पूरा साहित्य गाँव और किसान के जीवन श्रम पर केन्द्रित है।उनकी रचनाओं में किसान और मध्यम वर्ग के उत्पीड़न का जो मार्मिक रेखांकन हुआ है वैसा वर्तमान में कहीं भी रचनाओं में देखने को नहीं मिलता। आज प्रेमचंद जयंती है उन्हें याद करते हुए एक किसान परिवार से होने के नाते किसानों की याद बेतहाशा आ रही है। जहां वर्तमान समय में मध्यमवर्गीय समाज के इर्द गिर्द व्यापक लेखन हो रहा है वहीं किसान हाशिए पर है ऐसा क्यों हुआ है? शोचनीय विषय है। शायद द्वितीय पंचवर्षीय योजना के बाद से किसान की माली हालत का सुधरना प्रमुख कारण हो सकता है। बेशक जवाहरलाल नेहरू की कृषि क्रांति ने न केवल देश को अन्न के मामले में आत्मनिर्भर किया बल्कि विदेशों को खाद्यान्न निर्यात भी किया। लेकिन मझौले किसान और कृषि कार्य में लगे खेतिहर किसान आज भी प्रेमचंद के किरदारों की तरह बर्बादी की कगार पर हैं। यदि आज प्रेमचंद होते तो बहुत ग़मगीन और उदासीन होते?


ऐसा कभी नहीं हुआ की प्रेमचंद को पढ़ते हुए आँख गीली न हुई हो। मेरी ही नहीं शायद उन सब की जिनको साहित्य की समझ हो ना हो पर ग़रीब और ग़रीब की पीड़ा की समझ हो। वे तात्कालिन (1907-1936) समाज की लगभग हर विद्रुपता पर लिखते हैं, पर स्वाभिमानी ग़रीब का जो जीवंत वर्णन करते हैं वो अन्य किसी भी साहित्यकार की रचना में नहीं मिलता। हिन्दी गद्य साहित्य के अमर पुरोधा मुंशी प्रेमचंद जी का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के निकट लमही गाँव में हुआ था। उनकी माता का नाम आनन्दी देवी था तथा पिता मुंशी अजायबराय लमही में डाकमुंशी थे। माता, जो उनसे बहुत स्नेह करती थीं तथा उनके और गरीबी के बीच मजबूत दीवाल की तरह थीं, उन्हें 7 वर्ष की अवस्था में ही छोड़ कर चली गयीं। बालक प्रेमचंद को माँ के विछोह से कितना गहरा दुःख हुआ ये उनकी रचनाओं में स्पष्ट देखा जा सकता। उनके अनेक पात्र मातृविहीन होते थे। चौदह वर्ष की उम्र तक पिता अजायबराय ने साथ दिया पर उसके बाद वो भी भगवान् को प्यारे हो गए। अध्ययन-अध्यापन के शौक़ीन धनपत राय (प्रारंभिक नाम ) ने कम उम्र में ही उर्दू-फ़ारसी के उपन्यासों से परिचय प्राप्त कर लिया और धनपत राय के नाम से लिखने लगे। उनकी प्रारंभिक रचनाओं में से एक 'सोजे-वतन' के लिए उन्हें सरकारी तौर पर हिदायत दी गयी और उसकी प्रतियाँ जला दी गयीं। उर्दू में प्रकाशित होने वाली ज़माना पत्रिका के सम्पादक और उनके अजीज दोस्‍त मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें प्रेमचंद नाम से लिखने की सलाह दी। 

प्रेमचंद हिन्दी गद्य इतिहास के शिखर पुरुष हैं। उन्होंने हिन्दी उपन्यासों और कहानियों की 'कर्मभूमि' ही नहीं बदली, उनका 'कायाकल्प' भी कर दिया। 1907 में उनकी पहली कहानी का प्रकाशन जमुना पत्रिका में किया गया, कहानी थी -'संसार का सबसे अनमोल रत्न' ! प्रेमचंद का हिन्दी साहित्य में आगमन गद्य को नयी दिशा के साथ साथ प्रौढ़ता भी प्रदान करता है। उपन्यास के क्षेत्र में उनके योगदान को देखकर बंगाल के विख्यात उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने उन्हें उपन्यास सम्राट कहकर संबोधित किया था। उन्होंने कहानी और उपन्यास दोनों विधाओं में सशक्त तथा गंभीर लेखन किया है। यथार्थवाद के जनक प्रेमचंद जी की साहित्यिक यात्रा को दो कालखंडों में बाँटा जाता है। पहला 1907-1925 जिसे 'आदर्शोन्मुख यथार्थवाद' कहा जाता है, तथा दूसरा 1925- 1936 'नग्न-यथार्थवाद' !

पहले के दौर की रचनाओं में यथार्थवाद तो है, पर कहानियों की परिणति आदर्शवादी मोड़ पर होती है। इस दौर की कहानियों पर भारतीय परम्पराओं तथा मान्यताओं के साथ-साथ गांधीवादी दर्शन का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। हृदय-परिवर्तन की घटना बहुतायत मात्रा में होती है। इस दौर की कहानियों में - पंच-परमेश्वर , बूढी-काकी, बड़े घर की बेटी, मन्त्र, मुक्तिपथ आदि प्रमुख हैं। 

दूसरे दौर तक आते-आते प्रेमचंद जी का आदर्शवादी मोह पूर्णतः बिखर जाता है। उनके पात्र कफन के पैसे से शराब और खाना की व्यवस्था करने लगते हैं। 'कफ़न' चरम यथार्थवादी कहानी है। और कहानियों में- 'पुष की रात ', 'सद्गति , अलग्योझा, शतरंज के खिलाडी, आदि प्रमुख हैं। 

उपन्यास के क्षेत्र में क्रन्तिकारी परिवर्तन लाने वाले मुंशी जी ने हिन्दी उपन्यास को शैशवावस्था से सीधे प्रौढ़ावस्था में पहुंचा दिया। आधुनिक युग की विचारधारा यथा 'दलित चेतना' तथा 'नारी चिंतन' के बीज प्रेमचंद जी के उपन्यासों में निहित मिलते हैं। यशपाल और नागार्जुन जैसे सफल लेखकों ने इनका अनुसरण किया। अधूरे मंगलसूत्र की रचना से पूर्व इन्होने कई कालजयी उपन्यासों  की रचना की- गोदान, गबन, प्रेमाश्रम आदि उनकी समर्थ लेखनी के परिचायक उपन्यास हैं। गोदान हिन्दी साहित्य का प्रथम महाकाव्यात्मक उपन्यास है।  रंगभूमि में प्रेमचंद एक अंधे भिखारी सूरदास को कथा का नायक बनाकर हिंदी कथा साहित्‍य में क्रांतिकारी बदलाव का सूत्रपात कर चुके थे। गोदान का हिंदी साहित्‍य ही नहीं, विश्‍व साहित्‍य में महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। इसमें प्रेमचंद की साहित्‍य संबंधी विचारधारा 'आदर्शोन्‍मुख यथार्थवाद' से 'आलोचनात्‍मक यथार्थवाद' तक की पूर्णता प्राप्‍त करती है। एक सामान्‍य किसान को पूरे उपन्‍यास का नायक बनाना भारतीय उपन्‍यास परंपरा की दिशा बदल देने जैसा था। सामंतवाद और पूंजीवाद के चक्र में फंसकर हुई कथानायक होरी की मृत्‍यु पाठकों के जहन को झकझोर कर रख जाती है। लम्बी बीमारी के बाद ८ अक्टूबर १९३६ को उनका निधन हो गया। उनका अंतिम उपन्यास मंगल सूत्र उनके पुत्र अमृत ने पूरा किया। प्रस्तुत है होरी की मृत्यु का अंश (गोदान से ):-

"धनिया ने होरी की देह छुई तो कलेजा सन से हो गया। मुख कांतिहीन हो गया था।
कांपती हुई आवाज़ से बोली - कैसा जी है तुम्हारा?
होरी ने अस्थिर आँखों से देखा और बोला -- तुम आ गये गोबर? मैंने मंगल के लिये गाय ले ली है। वह खड़ा है, देखो।
धनिया ने मौत की सूरत देखी थी। उसे पहचानती थी। उसे दबे पाँव आते भी देखा था, आँधी की तरह भी देखा था। उसके सामने सास मरी, ससुर मरा, अपने दो बालक मरे, गाँव के पचासों आदमी मरे। प्राण में एक धक्का-सा लगा। वह आधार जिस पर जीवन टिका हुआ था, जैसे खिसका जा रहा था; लेकिन नहीं यह धैर्य का समय है, उसकी शंका निर्मूल है, लू लग गयी है, उसी से अचेत हो गये हैं।
उमड़ते हुए आँसुओं को रोककर बोली -- मेरी ओर देखो, मैं हूँ, धनिया; मुझे नहीं पहचानते?
होरी की चेतना लौती। मृत्यु समीप आ गयी थी; आग दहकनेवाली थी। धुँआँ शान्त हो गया था। धनिया को दीन आँखों से देखा, दोनों कोनों से आँसू की दो बूंदें ढुलक पडीं। क्षीण स्वर में बोला -- मेरा कहा सुना माफ़ करना धनियाँ! अब जाता हूँ। गाय की लालसा मन में ही रह गयी। अब तो यहाँ के रुपए किरया-करम में जायँगे। रो मत धिनया, अब कब तक जिलायेगी? सब दुर्दशा तो हो गयी। अब मरने दे।
और उसकी आँखें फिर बंद हो गयीं। उसी वक्त हीरा और शोभा डोली लेकर पहुँच गये। होरी को उठाकर डोली में लिटाया और गाँव की ओर चले। गाँव में यह ख़बर हवा की तरह फैल गयी। सारा गाँव जमा हो गया। होरी खाट पर पड़ा शायद सब कुछ देखता था, सब कुछ समझता था; पर ज़बान बंद हो गयी थी। हाँ, उसकी आँखों से बहते हुए आँसू बतला रहे थे कि मोह का बंधन तोड़ना कितना कठिन हो रहा है। जो कुछ अपने से नहीं बन पड़ा, उसी के दु:ख का नाम तो मोह है। पाले हुए कर्तव्य और निपटाये हुए कामों का क्या मोह! मोह तो उन अनाथों को छोड़ जाने में है, जिनके साथ हम अपना कर्तव्य न निभा सके; उन अधूरे मंसूबों में है, जिन्हें हम न पूरा कर सके।

मगर सब कुछ समझकर भी धनिया आशा की मिटती हुई छाया को पकड़े हुए थी। आँखों से आँसू गिर रहे थे, मगर यंत्र की भाँति दौड़-दौड़कर कभी आम भून कर पना बनाती, कभी होरी की देह में गेहूँ की भूसी की मालिश करती। क्या करे, पैसे नहीं हैं, नहीं किसी को भेजकर डाक्टर बुलाती।

हीरा ने रोते हुए कहा -- भाभी, दिल कड़ा करो, गो-दान करा दो, दादा चले।

धनिया ने उसकी ओर तिरस्कार की आँखों से देखा। अब वह दिल को और कितना कठोर करे? अपने पति के प्रति उसका जो धर्म है, क्या वह उसको बताना पड़ेगा? जो जीवन का संगी था उसके नाम को रोना ही क्या उसका धर्म है?
और कई आवाजें आयीं -- हाँ गो-दान करा दो, अब यही समय है।
धनिया यंत्र की भांति उठी, आज जो सुतली बेची थी उसके बीस आने पैसे लायी और पति के ठंडे हाथ में रखकर सामने खड़े दातादीन से बोली -- महराज, घर में न गाय है, न बिछया, न पैसा। यही पैसे हैं, यही इनका गो-दान है। और पछाड़ खाकर गिर पडी।"

आज बदलते हुए समय के साथ कैसे किसान भूमिहीन होता जा रहा है, इस बात को समझने के लिए प्रेमचंद की कहानियों से अच्छा माध्यम शायद ही कुछ और हो सकता है। उन्होंने बताया कि कैसे लोग किसान से मजदूर बनते जा रहे हैं और कैसे लोगों में काम करने की चाहत समाप्त होती जा रही है। आदिवासियों की तरह आज किसान भूमिहीन हो रहा है। आदिवासियों और किसानों की ज़मीन पर कारपोरेट जगत की नज़र है। आज तो संपूर्ण कृषि को अधिग्रहण करने का उपक्रम जारी है।जिससे तमाम खाद्यान्न उपभोक्ता संकट में आ जाएंगे पर किसान अकेले संघर्ष कर रहे हैं। प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में किसान की जिस पीड़ा को महाजनी सभ्यता में उठाया था आज वह बदले तथा निकृष्टतम स्वरुप में सामने है। एक किसान के नाते जो बेहद कष्टदायी है।

Friday, 23 July 2021

”ज्यूनाली रात” दुनिया की सबसे खूबसूरत रात !



चांद की रौशनी कुमाऊनी में “ज्यून” कहलाती है और चांदनी रात “ज्यूनाली रात”। यदि हम थोड़ा पहले अपनी नजर घुमाए तो हमारे आस-पास ढ़ेरों लोकगीत हैं जिसमें ज्यूनाली रात का जिक्र है। जो समय के साथ-साथ बढ़ते ही रहते हैं।


आज से पहले यदि हम देखें या अपने पुराने लोगों से जानकारी लें तो मालूम पड़ता है, अक्सर पूर्णिमा की रात पहाड़ के लोग हुड़के की थाप पर कदम मिलाते अपने गीत गाते नजर आते हैं। जिनमें झोड़े, चांचरी, न्यौली जैसे लोकगीत प्रमुख थे। जैसा कि सभी जानते हैं पहाड़ में जीवन एक संघर्ष है और पूर्णिमा की रात आगे के संघर्ष के लिये फिर से उर्जा भरने वाली रात है। ऊंचे शिखरों में गाये जाने वाले हल्की धुनों के वो गीत ज्यूनाली रात को दुनिया की सबसे खूबसूरत रात में बदल देते हैं।



पहाड़ में पूर्णिमा की रात उत्सव की रात है। हमारे पहाड़ में पूर्णिमा का खूब महत्त्व है फिर इसे धर्म की आस्था से जोड़कर देखा जाय या लोकजीवन से। जरा गौर से से देख सोचो कभी कि सदियों से चांद, पहाड़ के लोगों का संघर्ष समझता होगा तभी तो पहाड़ के किसी न किसी हिस्से से झांकता हुआ उन्हीं के पीछे डूबता है। पहाड़ के हर रात की कहानी-क़िस्से, दुःख-दर्द, तीज त्योहार, प्रेम कहानियों, छोटे बच्चों के खेल व दादी-नानी के क़िस्सों-कहानियों, लोरियों में शामिल है चांद। 




फ़ोटो एड़ दिग्विजय सिंह जनौटी जी की फ़ेसबुक दिवार से साभार — तो इन तस्वीरों के जरिए आप भी लुफ़्त लीजिए पहाड़ों पर चांद के दीदार का।

Friday, 18 June 2021

गंगोत्री गर्ब्याल, सीमान्त से निकली पहली ग्रेजुएट महिला


तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के साथ गंगोत्री गर्ब्याल

उत्तराखण्ड की अथक समाजसेवी महिला, सीमांत प्रांतर पिथौरागढ़ के धारचूला में साढ़े दस हजार फीट की ऊंचाई पर बसे गर्ब्यांग गांव की गंगोत्री गर्ब्याल शिक्षा के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट सेवाओं के कारण १९६४ में राष्ट्रपति डा० सर्वपल्ली राधाकृष्णन द्वारा राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित हुई। जिसका श्रेय उन्होंने जनभावना को ही दिया था। इनका जन्म ९ दिसम्बर, १९१८ में हुआ था, गंगोत्री जी शैक्षिक संस्थाओं से जुड़ी रही, शिक्षा जगत और समाजसेवा में गंगोत्री जी की सेवायें अनुकरणीय हैं। इनका सम्पूर्ण जीवन शिक्षा के क्षेत्र में समर्पित होकर कार्य करते हुये व्यतीत हुआ। सेवानिवृत्ति से मृत्यु तक वे कैलाश नारायण आश्रम, पिथौरागढ़ में अवैतनिक व्यवस्थापक के रुप में सेवारत रहीं। गंगोत्री जी बाल्यकाल से ही कुशाग्र बुद्धि की अति मेधावी छात्रा थी, उन्होंने १९३१ में वर्नाक्यूलर लोअर मिडिल उत्तीर्ण कर लिया था। उस समय ओई०टी०सी० उत्तीर्ण को ग्रामीण पाठशाला में नौकरी मिल जाती थी। मिस ई. विलियम्स, तत्कालीन सर्वप्रथम बालिका मुख्य निरीक्षका थीं, पर्वतीय क्षेत्रों की महिलाओं को उन्होंने शिक्षा के प्रति प्रोत्साहित करने में बड़ी रुचि दिखाई, वे एंग्लो इंडियन थीं। सीमान्त क्षेत्रों से आई छात्राओं का वह विशेष ध्यान रखती थीं,उन्होंने ही छात्रावास की तत्कालीन संरक्षिका रंदा दीदी से कहा कि गंगोत्री को हाईस्कूल में प्रवेश दिलायें, छात्रवृत्ति मैं दूंगी। यदि विवाह हो भी जाये तो भी आगे पढने में क्या आपत्ति हो सकती है।
१९३५ में तीन दिन की बीमारी के पश्चात गांव में इनके मंगेतर की मृत्यु हो गई, तब गंगोत्री जी एडम्स हाई स्कूल में पढ़ रही थीं। बालमन दुःखी हुआ, १९३७ में गंगोत्री जी को श्री नारायण स्वामी के सत्संग व सानिध्य का अवसर मिला। इन्होंने  नारायण स्वामी से दीक्षा ले ली और गुरुमंत्र को जीवन का पथ माना।


श्री श्री नारायण स्वामी जी


इसी दौरान बरेली में इन्होंने ई०टी०सी० (इंग्लिश टीचर सर्टिफिकेट) में प्रवेश लिया। ई.टी.सी. उत्तीर्ण करने के बाद १९३९ में गंगोत्री जी की नियुक्ति सी०टी० ग्रेड में राजकीय कन्या हाईस्कूल, बरेली में हुई। पूरे प्रदेश में यही प्रथम हाईस्कूल था, यहां पर मिसेज एलाय प्रधानाचार्य थीं, कुछ वर्ष बाद यह इंटर कालेज हो गया। छुट्टियों में कभी ये अल्मोड़ा रंदा दीदी के पास तथा कभी मां आनन्दमयी के आश्रम देहरादून जाया करती थीं। उन्होंने इण्टर की परीक्षा निजी रुप से पास की और इसी तरह बी०ए० तथा एम०ए० भी पास किया। अध्ययनावकाश लेकर राजकीय महिला प्रशिक्षण महाविद्यालय प्रयाग से एल०टी० किया। १९४५ में राजकीय कन्या हाईस्कूल, अल्मोड़ा खुला तो यह अल्मोड़ा आ गई। पुनः रंदा दीदी के संरक्षण में रहीं। गर्मियों की छुट्टियों में शांति निकेतन से घर आई जयंती पांडे, जयंती पन्त, गौरा पाण्डे (शिवानी जी) के सानिध्य में भी रहीं।

जब समाज सेवा की धुन लगी तो गंगोत्री जी १९४८ में अस्कोट क्षेत्र से जिला परिषर, अल्मोड़ा की निर्विरोध सदस्य चुनी गई। अब वे शिक्षण कार्यों के अतिरिक्त सामाजिक कार्यों में भी रुचि लेने लगीं, लोगों की समस्यायें हल करने लगी, वे जिला परिषद, अल्मोड़ा की उपाध्यक्ष भी रहीं।

वे ग्राम पाठशालाओं का निरीक्षण कर समस्या समाधान के लिये सदैव प्रयत्नशील रहीं। स्त्री शिक्षा विरोधी रुढिवादियों को अब स्त्री शिक्षा का महत्व समझ में आने लगा, वे कन्याओं का स्कूल भेजने लगे। गंगोत्री जी मद्य निषेध पर भी बोलती थीं, अल्मोड़ा में १९४६ से १९५२ तक महिला नार्मल स्कूल में कार्यरत रहकर वे विभिन्न समाज सेवी संस्थाओं से जुड़ी रहीं। १९४९-५० में चीन ने तिब्बत पर कब्जा किया, चीनी तिब्बतियों पर आधिपत्य जमाने लगे और तिब्बती जनता को अपने ढांचे में ढालने हेतु स्कूल, अस्पताल आदि की सुविधा देने लगे। सीमान्त के भारतीय व्यापारियों पर भी चीनियों का अंकुश बढ़ने लगा, अतः सीमान्तवासियों को अपनी सुरक्षा की चिंता होने लगी। तब उन्होंने २४ फरवरी से २६ फरवरी, १९५१ में रामनगर, जिला नैनीताल में एक विराट सम्मेलन का आयोजन किया। इस हिमालय प्रांतीय सम्मेलन में लाहौल, कुल्लू-कांगड़ा, गढ़वाल, कुमाऊं के जनप्रतिनिधि सम्म्लित थे, तत्कालीन सांसद देवीदत्त पन्त तथा विधायक हर गोबिन्द पन्त भी आमंत्रित थे, व्यापारियो एवं जनता का बड़ा सराहनीय सहयोग भोजन तथा व्यवस्था के लिये था। प्रतिनिधियों और नागरिकों ने बहुत बड़ा जुलूस निकालकर सम्मेलन का प्रारम्भ किया। ’सीमान्त को बचाओ’ ’सुरक्षा की व्यवस्था हो’ ’व्यापार बचाओ’ ’सीमान्त का विकास करो’ आदि जोशीले नारे लगाये गये, स्वागताध्यक्ष कार्य गंगोत्री जी के सुपुर्द था। आगंतुक, जनप्रतिनिधियों एवं उपस्थित जनसमूह का स्वागत करते हुये सीमान्त सम्मेलन के उद्देश्यों पर उन्होंने प्रकाश डाला। तत्कालीन समस्त समस्याओं को लेकर उनकी मांगों को पूरा करवाने के लिये एक समिति का गठन किया ग्या, जिसका नाम हिमालय सीमान्त संघ रखा गया। गंगोत्री गर्ब्याल कार्यकारिणी के सात सदस्यों में एक मात्र महिला सदस्य थीं, तब यह भी निश्चय किया गया कि संघ का एक शिष्टमंडल अपनी मांगों को लेकर प्रधानमंत्री के पास दिल्ली जायेगा।


नारायण आश्रम


गंगोत्री गर्ब्याल दारमा, से शिष्टमंडल की सदस्य थीं, अपने कार्यकाल में गंगोत्री जी ने स्त्री शिक्षा के प्रचार और प्रसार के लिये समर्पित भाव से कार्य किया। जब अल्मोड़ा में छात्रावास न था, तब इन्होंने सीमान्त क्षेत्रों से आने वाली समस्त छात्राओं को अपने पास रखा और शिक्षित किया। परिवार की तरह एक ही रसोई होती थी, कुछ छात्रायें कुछ महीनों से लेकर १५ वर्ष तक इनके साथ रहीं, एक जाती, दूसरी आती, यही क्रम चलता रहा।

सीमान्त पर तैनात जवानों के लिये उन्होंने सेना सेवा समिति का गठन किया, वे हाथ से बने गरम कपड़े और डिब्बा बन्द भोजन फौजी भाइयों के लिये भेजती। जिलाधिकारी के संरक्षण में इन सब कार्यों में उत्साहपूर्वक भाग लेने वाली वहां की कुछ अन्य शिक्षिकायें माया खर्कवाल, जानकी जोशी, विभा मासीवाल तथा सुशीला उप्रेती भी थीं। राजकीय इन्टर कालेज में नियुक्त सुश्री गंगोत्री १९६१ में लोक सेवा आयोग द्वारा चयनित होकर प्रधानाध्यापिका के पद पर उत्तरकाशी गई। तब कक्षा दस में मात्र दो छात्रायें थीं, गंगोत्री जी के सतत प्रयास से उनमें वृद्धि होती चली गई। १९६२ में चीन आक्रमण के समय राष्ट्रीय सुरक्षा कोष  में धन संचय हेतु गंगोत्री जी की पहल और प्रेरणा से छात्राओं ने एक सांस्कृतिक कार्यक्रम तैयार कर मकर संक्रान्ति के पर्व पर प्रस्तुत किया तथा उस कार्यक्रम से २००० रुपये की राशि एकत्र कर राष्ट्रीय सुरक्षा कोष में दी, इससे तत्कालीन मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी बहुत प्रसन्न हुईं। गंगोत्री जी सेवानिवृत्ति के बाद भी उसी गति और भावना से समाज सेवा में संलग्न रहीं। दिनांक २० अगस्त, १९९९ को इनका देहावसान हो गया। इनकी स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देने की भावना को अक्षुण्ण रखने के लिये जनपद पिथौरागढ़ के राजकीय बालिका इण्टर कालेज का नाम गंगोत्री गर्ब्याल राजकीय बालिका इण्टर कालेज रखा गया है। सीमान्त से निकली पहली ग्रेजुएट महिला का गौरव भी गंगोत्री गर्ब्याल के ही नाम है।

[धार द्वारा प्रकाशित 'ग्रंथ आयोजन: एक' से साभार]

Thursday, 10 June 2021

PM मोदी को दाढ़ी बनाने के लिए 100 रुपए का मनी ऑर्डर भेजा एक चायवाले ने



“कोरोना और लॉकडाउन की वजह से लोगों का काम ठप हो गया है और इससे दुखी अनिल मोरे ने कहा है कि पीएम मोदी को कुछ बढ़ाना ही है तो देश में लोगों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने चाहिए।“

प्रधानमंत्री के मन की बात व देश के नाम सम्बोधन के बाद एक चयवाले ने उनके मन की बात को समझते हुये अपने मन की बात पत्र और मनी ऑर्डर के माध्यम से व्यक्त की है। आपको बताते चलें कि महाराष्ट्र के बारामती निवासी एक चायवाले ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 100 रुपए का मनी ऑर्डर भेजा है और इस पैसे से अपनी बड़ी हुई दाढ़ी बनाने के लिए कहा है। पीएम मोदी को दाढ़ी बनाने के लिए 100 रुपए का मनी ऑर्डर भेजने वाले इस चाय विक्रेता का नाम है अनिल मोरे। कोरोना और लॉकडाउन की वजह से लोगों का काम ठप हो गया है और इससे दुखी अनिल मोरे ने कहा है कि पीएम मोदी को कुछ बढ़ाना ही है तो देश में लोगों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने चाहिए। 


महाराष्ट्र के लोकल मराठी मीडिया 'लोकमत' की रिपोर्ट के हवाले से न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा कि इंदारपुर रोड पर स्थित एक प्राइवेट अस्पताल के विपरित चाय की दुकान लगाने वाले अनिल मोरे कहते हैं, 'पीएम मोदी ने दाढ़ी बढ़ा ली है। अगर उन्हें कुछ बढ़ाना चाहिए, तो वह इस देश के लोगों के लिए रोजगार के अवसर होने चाहिए। आबादी के लिए टीकाकरण में तेजी लाने के प्रयास किए जाने चाहिए और मौजूदा चिकित्सा सुविधाओं को बढ़ाने के प्रयास होने चाहिए। पीएम को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि लोग अपने दुखों से छुटकारा पाएं जो पिछले दो लॉकडाउन के कारण हुए हैं। 
इसके अलावा, उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री का पद देश में सर्वोच्च है। उन्होंने कहा, 'मेरे मन में हमारे प्रधानमंत्री के लिए अत्यंत सम्मान और आदर है। मैं उन्हें अपनी बचत में से 100 रुपये भेज रहा हूं ताकि वह अपनी दाढ़ी मुंडवा लें। वह सर्वोच्च नेता हैं और मेरा उन्हें चोट पहुंचाने का कोई इरादा नहीं है। लेकिन जिस तरह से महामारी के कारण गरीबों की समस्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है, यह उनका ध्यान आकर्षित करने का एक तरीका है।'

पीएम को लिखे पत्र में मोरे ने अपने मनी ऑर्डर के साथ एक पत्र भेजा है। उन्होंने कोरोना से जान गंवाने वाले हर शख्स के परिवार को पांच लाख रुपए की मदद देने और आगे लॉकडाउन बढ़ने पर हर परिवार को 30 हजार रुपए की मदद देने की भी मांग की है। बता दें कि पिछले डेढ़ सालों में कोरोना वायरस और लॉकडाउन की वजह से असंगठित क्षेत्र को काफी नुकसान हुआ है। जिसकी सबसे अधिक मार निम्न आय वर्ग, मध्यम आय वर्ग व मजदूर को पड़ी है, जिनका रोजगार छिन चुका है। 


राजकुमार सिंह
rajkumarsinghbgr@gmail.com

मास्क कितना जरूरी इसका फैसला होगा 15 जून को





भारत मे एक आरटीआई आवेदन में कोविड महामारी के दौरान मास्क के प्रभाव से संबंधित जानकारी मांगी गई थी, जिस पर स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोई जवाब नहीं दिया। केंद्रीय सूचना आयोग ने इस आवेदन को व्यापक जनहित वाला बताते हुए कहा कि मंत्रालय के अधिकारियों ने इसे एक से दूसरी जगह सिर्फ ट्रांसफर करके पोस्ट ऑफिस वाला काम किया है। मास्क संबंधी आरटीआई पर जानकारी न देने पर सीआईसी ने लगाई फटकार, कहा- घोर लापरवाही है।


पूरे देश वासी पिछले लॉकडाऊन से सुनते आ रहे हैं कि कोरोना से बचाव के लिए आम इंसान को मास्क पहनना अनिवार्य है जिसके लिए आम जन पर जुर्माना भी लगाया जा रहा है। परन्तु इस पर उस वक्त चौकाने वाला वाक्या सामने आया है जब इस विषय पर एक आरटीआई कार्यकर्ता ने आरटीआई लगाई। आपको जाकर हैरानी होगी जब देश कि राजधानी नई दिल्ली मे केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने कोरोना महामारी में मास्क के इस्तेमाल से संबंधित एक सूचना का अधिकार (आरटीआई) आवेदन पर जवाब न देने और इसे एक विभाग से दूसरे विभाग में ट्रांसफर करते रहने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को कड़ी फटकार लगाई है। आयोग ने मंत्रालय के आरटीआई सेल के अधिकारियों पर गहरी नाराजगी जताते हुए कहा कि उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में घोर लापरवाही बरती है। 

26 मई 2020 को मैथ्यू थॉमस नामक एक व्यक्ति ने एक आरटीआई आवेदन दायर कर कोरोना महामारी के संदर्भ में पूछा था कि किस आधार पर पूरे भारत के लोगों के लिए मास्क अनिवार्य करने का निर्णय लिया गया है।  उन्होंने इस संबंध में स्वास्थ्य विशेषज्ञों द्वारा दिए गए सलाह, ऐसे दस्तावेज या मिनट्स ऑफ मीटिंग जो ये दर्शाते हो कि मास्क को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा दिए गए सुझावों पर विचार किया गया था, ऐसा कोई दस्तावेज या बैठक का मिनट्स जो ये दर्शाता हो कि केवल मेडिकल मास्क से सार्वजनिक स्थानों पर लोगों की रक्षा हो सकती है और इसकी जगह पर स्कार्फ या रूमाल से बचाव नहीं होगा बल्कि संक्रमण का खतरा भी होगा, इत्यादि की प्रति भी थॉमस द्वारा मांगी गयी थी। 

“थॉमस ने मंत्रालय से यह भी पूछा था कि ये निर्णय लेते वक्त क्या इस बिंदु पर विचार किया था कि भारत की आबादी के करीब 40 करोड़ गरीब लोग कैसे मेडिकल मास्क खरीद पाएंगे ?”

हालांकि स्वास्थ्य मंत्रालय से कोई जवाब नहीं मिलने पर आवेदनकर्ता ने तीन सिंतबर 2020 को प्रथम अपील दायर की, लेकिन यहां से भी कोई उत्तर न मिलने पर उन्हें सीआईसी का रुख करना पड़ा। बीते 25 मई 2021 को आयोग में हुई सुनवाई के दौरान मंत्रालय के विभिन्न अधिकारियों ने दलील दी कि चूंकि ये जानकारी उनके पास नहीं थी, इसलिए उन्हें अन्य विभाग को ट्रांसफर करना पड़ा था। जिसमे थोड़ा समय लग गया जानकारी आने तक। 
इसे लेकर मुख्य सूचना आयुक्त वाईके सिन्हा ने कहा कि आरटीआई आवेदन को ‘बहुत लापरवाही’ के साथ डील गया है और ‘अधिकारी इसे एक विभाग से दूसरे विभाग में ट्रांसफर ही करते रह गए’ और आवेदनकर्ता को पूरी जानकारी नहीं दी गई। उन्होंने कहा, ‘अपीलकर्ता द्वारा आरटीआई आवेदन में व्यापक जनहित से संबंधित बहुत प्रासंगिक मुद्दे उठाए गए हैं।’
सिन्हा ने अपने आदेश में आयोग स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के आरटीआई सेल के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गहरी नाराजगी व्यक्त करतें हुए कहा है कि, जिन्होंने आरटीआई आवेदन को सिर्फ एक विभाग से दूसरे विभाग में ट्रांसफर करने के लिए पोस्ट ऑफिस की तरह काम किया है। उन्होंने कहा कि आरटीआई आवेदन को ट्रांसफर करने पर यह नहीं कहा जा सकता है कि ट्रांसफर करने वाला अधिकारी, सीपीआईओ के रूप में अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों से पूरी तरह से मुक्त हो चुका है। 
मामले की सुनवाई के दौरान आवेदनकर्ता मैथ्यू थॉमस ने कहा कि अभी भी स्वास्थ्य मंत्रालय की वेबसाइट पर ये लिखा है कि ‘जिन लोगों को कोरोना के लक्षण नहीं है वे मास्क न पहनें और मेडिकल मास्क की जगह पर स्कार्फ एवं रुमाल नहीं लगाया जाना चाहिए क्योंकि ये हानिकारक साबित हो सकता है।’

थॉमस ने मांग की कि स्वास्थ्य मंत्रालय व्यापक जनहित से जुड़ी जानकारी स्वत: अपने वेबसाइट पर निरंतर प्रकाशित करे। इस पर सहमति जताते हुए वाइके सिन्हा ने कहा कि ‘आरटीआई अधिनियम, 2005 की धारा 4(1) (सी) और (डी) के अनुसार सार्वजनिक पटल पर सही और सटीक जानकारी प्रकाशिक की जानी चाहिए ताकि लोगों को आरटीआई आवेदन दायर करने की जरूरत न पड़े।’

आयोग ने कहा कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की वेबसाइट पर कोविड-19 के प्रसार को रोकने के लिए कई मानक संचालन प्रक्रियाएं (एसओपी) हैं, लेकिन इसमें कहीं भी विभिन्न प्रकार के मास्क की उपयोगिता और इनके लाभ के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं है। 
इस प्रकार सिन्हा ने स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के नोडल सीपीआईओ को अपीलकर्ता द्वारा उठाए गए बिंदुओं पर उपलब्ध सही और सटीक जानकारी प्रदान करने का निर्देश दिया।  उन्होंने कहा कि अधिकारी द्वारा संबंधित पीआईओ से जानकारी प्राप्त की जानी चाहिए और फिर इसे मंत्रालय की वेबसाइट पर स्वतः ही प्रकाशित किया जाए। आयोग ने अपील का निस्तारण करते हुए 15 जून तक अपने आदेश का अनुपालन करने का भी निर्देश दिया।
जरा सोचिए बिना जानकारी के कैसा नियम ? बिना शासनादेश के कैसे लागू ? जब शासनादेश कि ही जानकारी नहीं तो जुर्माना किस आधार पर लगाया जा रहा है ? टीवी पर लम्बे-लम्बे भाषणों के साथ मास्क पहनने की अपील कितनी सही होगी? आखिर क्यों देश कि भोली जनता को डर के माहौल मे जीने को मजबूर किया जा रहा है? 
सरकार महज दावों के सहारे यह दिखाने की कोशिश में लगी है कि वह कोरोना के खिलाफ कारगर लड़ाई लड़ रही है। जबकि जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती नजर आ रही है। इससे अधिक विडम्बना हम भारतीयों के लिए और क्या हो सकती है। देश के किसी भी मेन स्ट्रीम कि मीडिया मे आपको यह खबर नजर नहीं आयेगी। क्योंकि यह सरकार की नाकामियों को उजागर करती है। गौरव विवेक भटनागर की इस खबर को विस्तृत तरीके से  आपके सम्मुख प्रस्तुत किया गया है ...





राजकुमार सिंह
rajkumarsinghbgr@gmail.com